प्रकाश झा की फिल्म चक्रव्यूह देखी। दोस्तों मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं लेकिन एक चीज दिमाग में अच्छी तरह से घुस गई। सारे राजनीतिक दल अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक और दलित-दलित का ढिंढोरा पीटते हैं। क्या इन्हें आदिवासी नहीं दिखते। ठीक है कि जहां आदिवासी रहते हैं वहां खनिज हैं। उससे देश की तरक्की होगी लेकिन बड़े कॉर्पोरेट घरानों को खनिज निकाल वापस लौटने को क्यों नहीं कहा जाता। वो खनिज भी निकालते हैं और आदिवासियों को भी। ऊपर से वहीं डेरा डंडा यानी फैक्ट्री लगाकर बैठ जाते हैं। बेहतर ये होता कि खनिज निकालो और शहर में अपनी फैक्ट्री बनाकर वहां ले जाओ फिर जो बनाना है बनाओ। अगर आदिवासियों को तरक्की नहीं दे सकते तो उनको बेघर तो न करो। नक्सलवाद पनपने का खुद ही मौका क्यों देते हो।
असल दलित तो बेचारे आदिवासी हैं। भारत के मूल निवासी जो बाहर से आए कॉर्रपोरेट आर्यन और नक्सलियों के बीच पिस रहे हैं लेकिन सरकार की डिक्शनरी में बेचारे शेड्यूल ट्राइब के नाम से दर्ज हैं। उनको मिलने वाला आरक्षण दूसरे ले जाते हैं? लगता तो यही है कि बेचारे आदिवासियों को बस रिकॉर्ड में ST का दर्जा दे दिया गया और बाकी सुविधाएं लगता है कि इनके लिए बनी ही नहीं। समाजवाद का झंडा बुलंद कर वोट मांगनेवालों को शायद ये सब नहीं दिखता। अगर आदिवासियों को वोटर आईडी मिल भी जाता है तो उन्हें लालच देकर उनका वोट खरीदने के आरोप लगते हैं लेकिन दोष बेचारे आदिवासियों का भी नहीं। उन्हें न तो राजनीति से मतलब होता है न ही वोट से।
गरीब को सिर्फ एक चीज दिखती है वो है भूख। दो रोटी की भूख। अफसोस कि देश में दलितों अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की बात करने वाले बहुत हैं। लेकिन गरीब आदिवासियों की कोई फिक्र नहीं। झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जगह कोई भी हो। देश के नक्शे पर तो है लेकिन वहां के आदिवासियों को इस नक्शे का हिस्सा क्यों नहीं माना जाता। हर आदिवासी नक्सली नहीं होता। सच जानने के लिए टीवी की अपनी पहली नौकरी में मैंने उड़ीसा के कलिंगनगर में आदिवासियों और पुलिस के बीच खूनी झड़प जानने का सच जानने की ठानी। ये भिड़ंत 2 जनवरी 2006 को हुई थी।
मामला आदिवासियों की जमीन से ही जुड़ा था। मैं सबसे पहले जाजपुर इलाके में पहुंचा फिर वहां से कलिंगनगर। साथ में उड़ीसा के ही रहनेवाले एक सीनियर कैमरापर्सन भी थे। काफी डरे हुए थे लेकिन मेरे अंदर जवान खून था। लिहाजा मैं गाड़ी में शांत बैठा हुआ था लेकिन जैसे ही कलिंगनगर थाने के पास पहुंचा। हालात देखकर थोड़ा डर मेरे अंदर भी समा गया। पुलिसवाले खुद डरे हुए थे। गेट बंद पड़ा था और वहां से थाने की बिल्डिंग काफी अंदर थी। बाहर से हमने आवाज लगाई तो एक जवान धीरे धीरे रायफल लेकर हमारे पास पहुंचा।
अंदर जाकर बात की तो पता चला कि आदिवासियों ने कलिंगनगर की तरफ आनेवाला दूसरा रास्ता काट दिया है। ये वो रास्ता था जहां से तमाम जरुरी चीजें ट्रकों के जरिए जाजपुर की फैक्ट्रियों में पहुंचाई जातीं थीं। आखिर में हमने आदिवासियों के बीच जाने का फैसला किया। हम गए भी, सिर्फ कलिंगनगर में ही नहीं बल्कि उड़ीसा के हर उस हिस्से में जहां आदिवासियों का बसेरा है। अगले हिस्से में आपको सच के साथ सरकारी खेल के बारे में भी बताऊंगा। ये भी बताउंगा कि कैसे कालाहांडी की गरीबी को सरकार ने पत्रकारों के लिए चतुराई से नक्शे से ही गायब कर दिया।








एसोसिएट प्रोड्यूसर, IBN7






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