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पीयूष पांडे
Thursday , February 07, 2013 at 14 : 24

‘फेसबुकिया साहित्य’को खारिज मत कीजिए


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सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक बीती चार फरवरी को नौ वर्ष की हो गई। इस वर्ष चार फरवरी को ही दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला शुरू हुआ। निश्चित ही फेसबुक और विश्व पुस्तक मेले के आयोजन की कोई कड़ी आपस में नहीं जुड़ती। सिवाय इसके कि दोनों का साहित्य के प्रचार-प्रसार में अहम योगदान है। इस संबंध में फेसबुक या यूं कहें कि सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों की भूमिका अधिक उल्लेखनीय है क्योंकि यहां लोग साहित्य रच भी रहे हैं।

'फेसबुकिया साहित्य' नए युग का साहित्य है, जिसकी भाषा, शिल्प, शास्त्र और विषयों को पारंपरिक साहित्य की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। लेकिन, सवाल यह भी है कि क्या इसे साहित्य माना जा सकता है? यह बहस का विषय है, जिस पर आने वाले दिनों में गंभीर चर्चा होगी। इस बाबत गंभीर विमर्श की शुरुआत आगरा में आयोजित पहले ताज साहित्यिक समारोह के आखिरी दिन यानी तीन फरवरी को हो गई। इस समारोह में दो सत्र सोशल मीडिया और साहित्य से जुड़े थे। पहला, 'साहित्य की कसौटी पर सोशल मीडिया के मंचों की लिखत-पढ़त' और दूसरा 'सोशल मीडिया की भाषा, सरोकार और उपयोगिता के आयाम।'

इन विषयों पर बहस के बीच एक बात साफ रेखांकित हुई कि फेसबुक,ट्विटर और तमाम दूसरे सोशल मीडिया के मंचों पर लिखे जा रहे साहित्य को खारिज नहीं किया जा सकता। यदि इन मंचों पर लिखा-कहा सब कुछ सार्थक नहीं है तो पूरी तरह बेमानी भी नहीं है। नए बिंब, नए विषय और अलग संवेदनाएं यहां आकार ले रही हैं। बहस के दौरान एक बात बड़े जोर-शोर से कही गई कि सभी भाषाओं की साहित्यिक दुनिया के मठाधीश नए मंचों के साहित्य को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन लेखक को इस बात के लिए चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। फेसबुक-ट्विटर जैसे मंचों ने साहित्य का लोकतांत्रिकरण किया है। ये मंच रचनात्मक प्रयोग की गुंजाइश उत्पन्न कर रहे हैं और यह भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।

दरअसल, इस बहस में एक बड़ा सवाल बहस के केंद्र में नहीं आ पाया कि आखिर मुख्यधारा के साहित्य अथवा विशुद्ध साहित्य से सोशल मीडिया पर गढ़े जा रहे नए किस्म के आधुनिक साहित्य की तुलना की आवश्यकता ही क्या है? किताबों से बाहर भी साहित्य की एक दुनिया हो सकती है, जिसे तकनीक ने सहज संभव बना दिया है। दिलचस्प है कि भारत में जहां अब सोशल मीडिया के साहित्य को लेकर बहस शुरू हो रही है,वहीं पश्चिमी देशों में इस नए साहित्य को अलग पहचान दिलाने की कोशिश शुरू हो गई है। पश्चिमी देशों में इंटरनेट पर लिखे गए साहित्य के लिए अलग पुरस्कारों की व्यवस्था हो रही है। वहां ट्विटरेचर, ट्विलर, ट्विक्शन और फेसबुक फिक्शन जैसे शब्द धीरे-धीरे आम हो रहे हैं और इनसे जुड़े नए प्रयोग लगातार हो रहे हैं। साल 2009 में एलेक्जेंडर एकीमैन और एमेट रेनसिन ने 'ट्विटरेचर : द वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट बुक्स रीटोल्ड थ्रू ट्विटर' लिखकर साहित्य को नई दिशा देने की बड़ी पहल की थी। उनकी इस पुस्तक में शेक्सपीयर से लेकर दांते तक की कई किताबों के कंटेंट को ट्वीट्स यानी 140 अक्षरों के संदेश की शक्ल में पेश किया गया।

इसके बाद दुनिया के कई मुल्कों में सोशल मीडिया पर साहित्य लिखने का सिलसिला तेजी से शुरू हुआ। भारत में भी कई प्रयोग हुए। तकनीकी लेखक राकेश रमन ने ट्वीट के रूप में 'द सैंड प्लेनेट' नाम का उपन्यास लिखा, जो बाद में प्रकाशित हुआ। ब्रिटेन में बसे भारतीय मूल के शिक्षक चिंदू श्रीधरन ने महाभारत को भीम के दृष्टिकोण से ट्विटर पर लिखा। अर्जुन बसु तो ट्विटर पर 140 अक्षरों की लघु कहानी नियमित लिखते हैं। उनके ट्विस्टर को पढ़ने वाले पाठकों की संख्या लाखों में है। हाल में ट्विटर पर हिंदी में 140 अक्षरों की कहानियों की प्रतियोगिता भी संचालित की गई।

सोशल मीडिया के मंच नए किस्म के साहित्यकारों की एक जमात तैयार कर रहे हैं। लेकिन, यह मंच सिर्फ माध्यम है। आखिर, ठेठ साहित्य की परिभाषा में आने वाला हर साहित्य भी उपयोगी-सरोकारी हो यह आवश्यक नहीं। मशहूर मीडिया सिद्धांतकार मार्शल मैक्लूहान ने कहा था कि किताबों का भविष्य उनकी भूमिका में है और सोशल मीडिया के मंचों पर गढ़ा जा रहा साहित्य एक लिहाज से इसी बात को सच कर रहा है। इतना ही नहीं, कई नामचीन लेखकों के लिए तो सोशल मीडिया अपनी कृति के प्रचार का जरिया भी है।

निश्चित रुप से सोशल मीडिया पर रचा जा रहा साहित्य अभी शैशवावस्था में है, लेकिन अभिव्यक्ति के मुखर मंचों की लोकप्रियता के साथ इनकी लोकप्रियता भी बढ़ना तय है। आज की तारीख में आप कुछ भी रचनात्मक लिखते हैं, और आपके पास मंच नहीं हैं तो फौरन फेसबुक और ट्विटर का दरवाजा खटखटाइए। इन मंचों पर आपको प्रशंसक भी मिलेंगे और पहचान भी। हाल में कई ब्लॉग लेखकों ने अपनी ब्लॉग पोस्ट को किताबों की शक्ल में बाजार में उतारा है, जिन्हें पारंपरिक साहित्य के पाठक भी पसंद कर रहे हैं। यानी सवाल गुणवत्ता का है, मंच का नहीं।

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पीयूष पांडे के बारे में कुछ और

प्रिंट मीडिया में कुछ साल बिताने के बाद 2001 में पीयूष पांडे नवभारत टाइम्स.कॉम की लांचिंग टीम के सदस्य रहे। बाद में उन्होंने न्यूज चैनल 'आज तक' और 'सहारा समय' में महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। मूलत: सोशल मीडिया विशेषज्ञ के रूप में पहचान। शौकिया व्यंग्य लेखन और एक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित। फिलहाल, आईबीएन-7 से जुड़े हैं।
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