पीयूष पांडे
Thursday , February 21, 2013 at 16 : 58

इंडोनेशिया: आधी आबादी का सहारा सोशल मीडिया


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क्या दुनिया के छोटे मुल्कों में सोशल मीडिया के मंच महिलाओं के हाथ में अपने हक की लड़ाई के हथियार साबित हो सकते हैं? दक्षिण एशिया के छोटे से देश इंडोनेशिया में कम से कम इस बात के संकेत मिलने लगे हैं। सोशल मीडिया को लेकर जुनूनी इस मुल्क में महिलाओं ने अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए फेसबुक, ट्विटर जैसे मंचों को गले लगा लिया है।

इस संदर्भ में दो घटनाएं उल्लेखनीय हैं। पहली, एक लड़की को एसएमएस के जरिए तलाक देने से जुड़ी है। यह मामला पश्चिम जावा प्रांत के गारूत ज़िले के प्रमुख फिकरी से जुड़ा था, जिसने जुलाई में 17 वर्षीय एक लड़की को अपनी दूसरी पत्नी बनाया और शादी के सिर्फ चार दिन बाद एसएमएस के जरिए तलाक दे डाला। वजह बताई कि लड़की कुंआरी नहीं थी। हालांकि, लड़की ने इस बात को गलत करार दिया। फिकरी और उसकी नाबालिग पत्नी की तस्वीर इंटरनेट पर रेंगनी शुरू हुई तो धीरे-धीरे महिलाओं में आक्रोश उबाल लेने लगा। फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर लोगों ने जमकर नाराजगी दर्ज कराई। सोशल मीडिया के जरिए लोग एकजुट हुए और दिसंबर में हज़ारों छात्र और महिलाएं फिकरी के इस्तीफे की मांग को लेकर गारूत की सड़क पर उतर आए। नतीजा राष्ट्रपति सुसीलो बैम्बैंग ने सार्वजनिक तौर पर फिकरी की दूसरी गैरकानूनी शादी की आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति से फिकरी को बर्खास्त करने को कह डाला और अब फिकरी को बर्खास्त किए जाने के बाबत गेंद राष्ट्रपति के पाले में है।

सोशल मीडिया पर ही महिलाओँ का गुस्सा जनवरी में भी फूटा, जब न्यायाधीश मुहम्मद दामिंग सुनुसी की सुप्रीम कोर्ट के नियुक्ति पैनल के समक्ष इंटरव्यू में महिलाओं के लिए एक भद्दी टिप्पणी सार्वजनिक हो गई। सुनुसी ने एक सवाल के जवाब में कहा था, "बलात्कार के दोषी को मृत्युदंड देना चूक हो सकती है क्योंकि हो सकता है कि बलात्कार के दौरान बलात्कारी और लड़की दोनों ने आनंद लिया हो।" हालांकि बाद में सुनुसी ने अपनी टिप्पणी को मजाक बताया लेकिन सोशल मीडिया पर महिलाओं का गुस्सा अब उनकी नौकरी ले सकता है। इसी महीने 14 फरवरी को इंडोनेशिया में सैकड़ों महिलाओं ने 'रेप इज नेवर फन' की टी-शर्ट पहनकर प्रदर्शन किया।

दिलचस्प संयोग है कि जिस वक्त दिल्ली दुष्कर्म पीड़िता को न्याय की मांग को लेकर हजारों युवा दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे, लगभग उसी वक्त इंडोनेशिया की महिलाएं भी बलात्कार और महिला सम्मान के मुद्दे पर हजारों युवाओं के साथ सड़क पर थीं। दोनों ही आंदोलनों को परवान चढ़ाने में सोशल मीडिया ने भूमिका निभाई। वैसे, सोशल मीडिया के इस्तेमाल में इंडोनेशिया अग्रणी देशों में है। 24 करोड़ की आबादी वाले देश में करीब चार करोड़ अस्सी लाख लोग फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं। यह आंकड़ा उपयोक्ताओं के लिहाज से इंडोनेशिया को अमेरिका,ब्राजील और भारत के बाद चौथे नंबर पर रखता है। माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर के उपयोक्ताओं के मामले में इंडोनेशिया पांचवें नंबर पर है। पेरिस की शोध फर्म सेमिकॉस्ट के मुताबिक जकार्ता से दुनिया भर में सबसे ज्यादा ट्वीट किए जाते हैं। इंडोनेशियाई लोगों के ट्विटर प्रेम का आलम यह है कि जकार्ता ट्विटर राजधानी के रूप में मशहूर है और हाल में इसी ट्विटर प्रेम पर आधारित फिल्म #रिपब्लिकट्विटर खासी चर्चित हुई। यह हाल तब है जब इंडोनेशिया की 25 फीसदी से भी कम आबादी के पास इंटरनेट उपलब्ध है।

इंडोनेशिया की करीब 87 फीसदी आबादी मुस्लिम है, और इस लिहाज से सोशल मीडिया के मंचों का व्यापक इस्तेमाल कई सोशल मीडिया जानकारों को आश्चर्यचकित भी करता है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इंडोनेशिया में फेसबुक उपयोक्ताओं के बीच पुरुष-स्त्री अनुपात 59-41 का है, जो भारत जैसे मुल्कों से भी बेहतर है। लेकिन, सवाल फेसबुक-ट्विटर जैसे मंचों के इस्तेमाल का नहीं सार्थक इस्तेमाल का है। इंडोनेशिया में अभी तक सोशल मीडिया के मंचों का इस्तेमाल मनोरंजन, सेलेब्रिटी से जुड़ने के मंच और सूचनाओं को पाने तक सीमित था। लेकिन, अब वक्त बदल रहा है। हालांकि, इक्का दुक्का मामले पहले भी सोशल मीडिया की ताकत वहां दिखाते रहे हैं। खासकर मध्यवर्गीय घरेलू महिला प्रिता बनाम ओमनी अंतरराष्ट्रीय अस्पताल का मामला। 2008 के मध्य में प्रिता ने अस्पताल में इलाज में लापरवाही के संबंध में एक ई-मेल अपने कुछ मित्रों को लिखी थी। प्रिता ने एक मित्र ने इस मेल को सोशल मीडिया के मंचों पर सार्वजनिक कर दिया। नतीजा अस्पताल ने प्रिता के खिलाफ मानहानि का मुकदमा कर डाला। करीब ढाई-तीन साल चली अदालती लड़ाई में फैसले कई बार पलटे गए और अंतत: अदालत ने प्रिता को एक साल की जेल और करीब 22 हजार अमेरिकी डॉलर के जुर्माने की सजा सुनाई। आक्रोशित ब्लॉगर समुदाय ने प्रिता के पक्ष में जबरदस्त अभियान चलाया। ऑनलाइन याचिकाओं पर लाखों लोगों ने हस्ताक्षर किए। नतीजा प्रिता को जेल से रिहा कर दिया गया। लेकिन, आर्थिक जुर्माने की सजा बरकरार रही। प्रिता के पक्ष में उठे लोगों ने अब सोशल मीडिया के जरिए जुर्माने की रकम जुटाना शुरू किया। फेसबुक-ट्विटर-ब्लॉग और यूट्यूब समेत सभी मंचों के जरिए दान की अपील की गई। और महज सात दिन के भीतर 90,000 डॉलर जुटा डाले। यानी जुर्माने की रकम से कहीं अधिक। दिलचस्प है कि शेष राशि का इस्तेमाल एक फाउंडेशन स्थापित करने में किया गया, जो अब इंडोनेशिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मसलों के समर्थन में काम करता है।

इंडोनेशिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और वहां इस्लाम का आधुनिक चेहरा दिखायी देता है। लिहाजा सवाल सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी नहीं है। सवाल है नीतिगत परिवर्तन में सोशल मीडिया की भूमिका का। इंडोनेशिया में सोशल मीडिया का इस्तेमाल अब इस दिशा में होता दिख रहा है। सबसे बड़ी बात कि महिलाओं ने अपने हक की लडाई को इन मंचों के जरिए छेड़ने की पहल की है।

इंडोनेशिया में पुरुष को पत्नी की स्वीकृति से दूसरा विवाह करने की इजाजत है। अमूमन पहली पत्नी इस बात के लिए राजी नहीं होती, लिहाजा गैरमान्य तरीके से शादी की जाती है। बिना प्रमाणपत्र के लड़की को कानूनी अधिकार नहीं मिल पाते। लेकिन, सोशल मीडिया के जरिए परवान चढ़े आंदोलन के बाद अब इंडोनेशिया के 1974 के शादी संबंधी कानूनों में बदलाव की मांग शुरू हो गई है। कई जानकारों का मानना है कि महिलाओं में फिकरी मामले की खासी चर्चा का एक लाभ यह भी हुआ है कि गैरमान्यता प्राप्त विवाह को लेकर एक समझ बनने की शुरुआत हुई है। इसी तरह,दामिंग सुनुसी मामले के सोशल मीडिया पर सुनामी की तरह छाने के बाद उच्च पदों पर बैठे लोगों को सोच-समझकर बोलने की हिदायत मिली है।

निश्चित तौर पर दो घटनाओं को इंडोनेशिया में सोशल मीडिया ने व्यापक फलक दिया, जिसके बाद वहां महिलाओं से जुड़े कई कानूनों में बदलाव का मुद्दा उठ गया है। क्या यह कम अहम बात है? हां, देखना यह है कि क्या इंडोनेशिया से बहती हवा दक्षिण एशिया के दूसरे छोटे देशों में भी बहेगी?

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पीयूष पांडे के बारे में कुछ और

प्रिंट मीडिया में कुछ साल बिताने के बाद 2001 में पीयूष पांडे नवभारत टाइम्स.कॉम की लांचिंग टीम के सदस्य रहे। बाद में उन्होंने न्यूज चैनल 'आज तक' और 'सहारा समय' में महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। मूलत: सोशल मीडिया विशेषज्ञ के रूप में पहचान। शौकिया व्यंग्य लेखन और एक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित। आईबीएन-7 से भी जुड़े रहे हैं।
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