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बृज दुग्गल
Wednesday, December 19, 2012 at 10 : 23

मेरी बिटिया हम शर्मिंदा हैं...


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मैं दिल्ली में रहता हूं और यकीनन इस शर्मनाक हरकत ने मुझे ये सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर कब तक सहेंगी लड़कियां। वो कोई भी हो सकती हैं, आपकी मेरी बहन, मां, बेटी, पत्नी, कोई भी। कल उस लड़की के साथ हुआ और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दिल्ली में कोई भी लड़की सुरक्षित है। मुझे बताइए कि दिल्ली में रहने वाला वो कौन सा बाप होगा जो इस वक्त अपनी बेटी को लेकर चिंतिंत नहीं होगा, जिसे ये बात परेशान नहीं करती होगी कि उसकी बेटी अभी तक घर नहीं पहुंची। वो कौन सी मां होगी जिसे अपनी बेटी के घर पहुंचने से पहले नींद आ जाती होगी। दिल्ली में रहने वाले हर मां बाप के मन में हर वक्त एक अनजाना सा भय बना रहता है, कहीं उनकी बेटी के साथ कुछ हो न जाए...हर वक्त उनका मन एक ही प्रार्थना करता रहता है कि उनकी बेटी सही सलामत घर पहुंच जाए।

सवाल ये है कि आखिर ऐसा माहौल क्यों बना? चलती बस में दिल्ली में एक लड़की के साथ रेप की घिनौनी वारदात होना इसलिए भी हैरान और परेशान करता है कि देश की सबसे बेहतरीन माने जाने वाली पुलिस यहां मौजूद है। सिर्फ डेढ़ करोड़ की जनता की हिफाजत के लिए दिल्ली पुलिस के पास 70 हजार से ज्यादा का पुलिस बल है...ये वो पुलिस है जिसे स्वायत्ता देने के नाम पर राज्य सरकार के नियंत्रण से मुक्त रखा गया है और जिसका मुखिया यानी कमिश्नर सीधे केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करता है। यहीं देश की सबसे शक्तिशाली महिला सोनिया गांधी रहती हैं, यहीं विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज निवास करती हैं और यहीं पर लोकसभा अध्यक्ष भी रहती हैं। कहने का लब्बोलुआब ये कि दिल्ली में तो लड़कियों के लिए स्वर्ग जैसा माहौल होना चाहिए।

लेकिन शर्म की बात है कि दिल्ली लड़कियों के लिए नर्क बन चुकी है। इस वक्त एक लड़की के साथ बेहद ही घिनौनी वारदात हुई है। संसद से लेकर टीवी चैनल्स के स्टूडियो तक चारों तरफ शोर मचा हुआ है। सब एक सुर में इसकी निंदा कर रहे हैं। सब बलात्कारियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं। बिल्कुल सही बात है, बलात्कारियों को सचमुच ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि जिसे सुनकर ही बलात्कारियों के मन में खौफ पैदा हो। वो ऐसी कोई भी हरकत करने से पहले 100 बार सोचें। लेकिन क्या हममें से किसी को भी लगता है कि दिल्ली में अपराधियों या रेपिस्ट के मन में किसी का खौफ रहता है। अगर ऐसा होता तो कम से कम सड़कों पर चलती बस में यूं सरेआम रेप न होते। अगर 2011 में पूरे देश में लड़कियों के खिलाफ हैवानियत या यूं कहें कि बलात्कार के कुल मामलों की बात करें दिल्ली में 572 मामले दर्ज हुए, यानी रोज एक से ज्यादा लड़कियों के लिए बलात्कार (NCRB) कोई भी सभ्य समाज ऐसी जगह को देश की राजधानी कहेगा या बलात्कार की राजधानी।

चलती बस में हुए रेप कांड से पूरा देश शर्मिंदा है। पर सवाल ये है कि क्या हम कुछ ऐसा कर सकते हैं कि लड़कियां कम से कम देश की राजधानी में तो खुद को सुरक्षित महसूस करें। एक मांग बड़ी तेजी से उठ रही है कि क्यों न ऐसे बलात्कारियों को फांसी की सजा दे दी जाए, बिल्कुल सही बात है कि ऐसे हैवानों को जीने का कोई हक नहीं है और उनका मर जाना ही समाज के लिए अच्छा है। लेकिन यहां मेरा एक सवाल है जब बलात्कार का शिकार एक लड़की उस हैवानियत के बाद रोज मरती है तो भला रेपिस्ट को इतनी आसान मौत क्यों दी जाए। मेरा कहना है कि क्यों नहीं हम कोई ऐसा कानून बना सकते कि ऐसे जघन्य अपराध के लिए रेपिस्ट को नपुसंक बना दिया जाए ताकि उसका वो हाल देखकर समाज में एक मैसेज भी जाए कि अगर लड़कियों को भोग की वस्तु समझोगे तो तुम्हारा ऐसा हाल होगा। हो सकता है कि कुछ लोगों को ये बात पसंद न आए लेकिन कई बार ऐसे कड़े कदम उठाने पड़ते हैं।

वो तो भला हो प्रेस और मीडिया का जिसने ये माहौल बनाया कि देश में कम से कम नए सिरे से बलात्कार के दोषियों को सजा देने को लेकर एक बहस शुरू हुई वर्ना तो ये मामला कहां दफन हो जाता किसे पता है। वैसे यहां एक बात मुझे पुलिस से भी कहनी है -ऐसे मामलों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर खुद की पीठ थपथपाने से कुछ नहीं होगा। समाज ने आपको ये जिम्मेदारी इसलिए दी है कि मुजरिमों में आपका खौफ हो। कम से कम देश की राजधानी की सुरक्षा का जिम्मा संभालने के नाते तो आपसे ये अपेक्षा की ही जाती है लेकिन आप ऐसे मामलों में फ्लॉप रहते हैं -ये बात सही है कि किसी के माथे पर नहीं लिखा होता कि वो कब क्या करेगा -लेकिन जब दिल्ली की सड़कों पर चलती बस में रेप होता है तो ये दिल्ली पुलिस के मुंह पर करारा तमाचा है जिसे पुलिस को महसूस करना चाहिए। इसका सीधा साधा अर्थ ये है कि दिल्ली की कानून व्यवस्था एकदम निचले स्तर पर पहुंच चुकी है।

एक बात और क्या पुलिस कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकती कि जब भी रेप की कोई कॉल आए तो उसे कम से कम मीडिया से दूर रखा जाए। इन्वेस्टिगेशन हो लेकिन उसका प्रचार न हो ताकि बलात्कार की पीड़ित लड़की और उसका परिवार मेंटल ट्रामा से बच जाए।

अपराध हर जगह होते हैं और कई बार उन्हें रोकना नामुकिन होता है लेकिन ऐसा हिंदुस्तान में दिल्ली के सिवाय ही कहीं होता हो कि मुजरिम किसी लड़की और उसके दोस्त को धोखे से बस में बैठाएं, उनसे छेडखानी करें और फिर देश की सबसे स्मार्ट कही जाने वाली दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे, सड़कों पर रेप करते हुए लगातार बस दौड़ाते रहें। इस दर्दनाक घटनाक्रम के बाद दिल्ली के हर नागरिक को शर्म आती है और यही अपेक्षा दिल्ली का हर नागरिक दिल्ली पुलिस से भी करता है । ये कहने की जरूरत नहीं है लेकिन ये किसी से छुपा नहीं है कि दिल्ली पुलिस छेड़खानी जैसे मामलों को किस तरह नजरअंदाज करती है जबकि वो लम्हा किसी भी लड़की के लिए नर्क के समान होता है।

और आखिर में एक बात और, अब इस बात पर एक बार फिर राजनीति शुरू होने वाली है कि क्यों न दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अंडर दे दिया जाए, लेकिन ये कोई विकल्प नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो दिल्ली की कानून व्यवस्था फिर से बिगड़ेगी। यक्ष प्रश्न वही है कि क्या हम अपनी मां, बहन, बेटियों को एक ऐसा मौहाल दे सकते हैं कि वो खुद को सुरक्षित महसूस करें। क्या किसी के पास इसका कोई जवाब है?

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