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अफसर अहमद
Wednesday, August 19, 2009 at 20 : 16

जिन्ना के नाम से इतना क्यों बिदकते हो भाई?


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जिन्ना विवाद के चलते जसवंत बीजेपी से विदा हो चुके हैं। वे निकाल जरूर दिए गए लेकिन जाते-जाते वे अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गए। मसलन किसी की तारीफ या आलोचना क्या इतनी भयानक है कि पार्टी इसे आत्म सम्मान का मुद्दा बना ले। बीजेपी में यकायक ये स्फूर्ति कहां से आई। जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि संघ बीजेपी के लिए संजीवनी की तरह है पर यह संजीवनी बीजेपी को मुफ्त में नहीं मिलती। कभी-कभी बीजीपी को चाहे अनचाहे उसकी दी हुई कुछ कड़वी गोलियां भी लेनी पड़ती हैं। इस बार जो गोली मिली, उसकी प्रतिक्रिया में जसवंत की विदाई हो गई।

जाते-जाते जसवंत एक किताबी बात कह गए जो शायद किसी खबर की हैडलाइन न बने लेकिन ये जरूर इशारा करती है कि चिंतन को मारना खतरे से खाली नहीं है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक पार्टियों में चिंतन, मनन और लेखन की परंपरा अगर खत्म हो गई तो यह भारत के लिए खतरे की बात है। बात सीधी और साधारण सी दिखती है पर ये इतनी सरल है नहीं।

सवाल उठता है कि क्या बीजेपी का ब्रेन संघ है और वह धड़ है। थोड़ा सा अजीब लग रहा है लेकिन जसवंत का जाना काफी हद तक कुछ ऐसा ही है। विचारधारा पर सोचो मत.. इसके लिए इतना लंबा चौड़ा संघ है न... आप सिर्फ काम से काम रखो...जसवंत की विदाई ने बीजेपी में छिड़ी इसी खदबदाहट को बहुत ही भद्दे अंदाज में सामने ला दिया है। शायदा संघ नहीं चाहता कि कोई ज्यादा सोचे। इसलिए आडवाणी जिन्ना पर कहकर फंसे लेकिन वो राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं, प्रहार झेलकर भी मैदान में बने हुए हैं।

मेरे पास संघ को लेकर लंबी जानकारी नहीं है लेकिन जितना मुझे समझ में आता है उसके मुताबिक, ये इस देश की बदनसीबी है कि देश की दो बड़ी पार्टियां अपने घुटनों के बल नहीं खड़ी हैं, खड़ा होने के लिए उन्हें संघ और गांधी परिवार का सहारा चाहिए होता है। कमोबेश इस मामले में कांग्रेस और बीजेपी एक ही नाव में सवार हैं। अभी आप किसी बीजेपी के आदमी से पूछिए कि क्या संघ बीजेपी पर हावी है क्या वही इसे चला रहा है तो यकीन मानिए, आपको गोलमोल जवाब सुनने को मिलेगा-मसलन ऐसा नहीं है हम तो उससे प्रेरणा लेते हैं बस, उधर किसी कांग्रेसी से पूछिए क्यों भाई गांधी परिवार ही क्यों पार्टी पर हावी रहता है तो वह जवाब देगा कि भाई वो तो सिर्फ मार्गदर्शक की भूमिका में हैं।

बीजेपी में आम चुनाव से कुछ समय पहले तक मतभेद की एक पतली रेखा नजर आ रही थी जो समय के साथ गहरी होती जा रही है। बीजेपी जब चुनाव हारी तब यह बात तेजी से उठने लगी कि बीजेपी को किस विचारधारा पर चलना चाहिए। संघ की उधार ली हुई विचारधारा या फिर अपनी इस इक्कीसवीं सदी की विचारधारा। बहस तेज हुई। खेमेबंदी भी शुरू हुई। कभी राजनाथ का बयान आता तो कभी जेटली की नाराजगी सामने आती।

दुखद ये कि बीजेपी इस झकझोरने वाले 'सच का सामना' नहीं कर सकी और इसके अधिकतर क्षत्रप संघ को मजबूती से पकड़ने की वकालत करने लगे। जसवंत की विदाई इसी का परिणाम है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि अटल ने अपने शासनकाल में आम आदमी के अंदर जो भरोसा पैदा किया था क्या बीजीपी ऐसा कुछ दोबारा कर पाएगी। हाल फिलहाल इसकी उम्मीद नजर नहीं आती।

विचारधारा के दौराहे पर खड़ी बीजेपी के परेशानी सिर्फ बीजेपी की अकेली परेशानी नहीं बल्कि पूरे भारत की परेशानी है। बहुत से लोगों को यह पढ़कर अजीब लगे लेकिन सच है। अमूमन सत्ता की दौड़ में किसी भी देश की दो ही पार्टियां होती हैं। ये देखी हुई बात है। आज इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि कांग्रेस के बाद बीजेपी ही वो दूसरी पार्टी है जो सत्ता में आ सकती है। सवाल उठता है कि क्या संघ के रिमोट से संचालित बीजेपी देश का भला कर पाएगी या फिर राजनीतिक रूप से एक स्वतंत्र पार्टी देश के लिए हितकर रहेगी।

सब जानते हैं संघ एक ही धर्म के हितों की बात करता है। मेरा सवाल है कि क्या इस देश में और धर्मों के लोग नहीं रहते हैं। क्या हम ऐसी किसी विचारधारा को अंगीकार कर सकते हैं जो किसी एक धर्म की ही बात करती हो। बस यहीं आकर कांग्रेस बाजी मार ले जाती है। एनडीए का शासन किसी भी सूरत में खराब नहीं कहा जा सकता लेकिन ये इन लोगों की बदकिस्मती है कि पुराने अनुभवों से इन्होंने कुछ नहीं सीखा।

पीएम के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने वो किया जो शायद किसी नेता के लिए करना असंभव हो। इसकी एक वजह ये थी के संघ कभी उनपर सीधे विचारधारा का दबाव नहीं डाल पाया। देर से ही सही आडवाणी ने भी वही कोशिश की लेकिन घिर गए और मौन साध गए। बीजेपी का यह दूसरा योद्धा अपने अवसानकाल में हैं। कभी भी राजनीति को अलविदा कह सकता है या ऐसा करने को कहा जा सकता है। जसवंत चाहे भले ही आडवाणी से हर मुद्दे पर सहमत न हों लेकिन वो कर कुछ ऐसा ही रहे थे जो संघ के बीजेपी का धड़ होने के घमंड को चोट पहुंचा गया। वह स्वतंत्र सोच गए जो संघ को स्वीकार नहीं था।

मेरे खयाल से अब इस पर लंबी चर्चा करने की जरूरत है कि कैसी राजनीतिक पार्टी भारत को सुनहरा भविष्य दे सकती है।

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