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अफसर अहमद
Friday , October 02, 2009 at 18 : 17

लगे रहो राज


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ऊपर जो मैंने लिखा उससे कई की त्योरियां चढ़ सकती हैं। सवाल उठेंगे कि भई आप राज ठाकरे की तारीफ कैसे कर सकते हैं। सच है, आलोचना सही है। पर मेरा सवाल शायद उससे भी ज्यादा सही है कि इतने दिनों से राज ठाकरे लगातार सिस्टम को चुनौती देते हुए वह कर रहे हैं जिसे एक आम आदमी के करने पर कई सालों के लिए पुलिस जेल में डाल देती, पर राज को वरदान है, अभयदान है। वो ठाकरे परिवार से हैं, वो मराठा हितों के रक्षक हैं और न जाने क्या क्या...। जब उन्हें कोई कुछ भी नहीं कहता तो जाहिर है कि हम सब मौन रहकर भी उसका समर्थन ही तो कर रहे हैं।

मेरे ख्याल से किसी और के लिए कम लेकिन भगवा खेमे के लिए यह बात ज्यादा चौंकाने वाली लगती है क्योंकि क्षेत्रवाद उसके तरकश का तीर नहीं है। और फिर राज की शैली और सिद्धांत तो शिवसैना जैसे ही हैं, तो गड़बड़ कहां हुई। जब तक राज की उम्मीद थी कि बाला साहेब उन्हें ही अपना उत्ताराधिकारी बनाएंगे तब तक वे उनके सिंहासन के एक मजबूत पाए बने रहे। लेकिन धीरे-धीरे वो हुए जिसकी राज को सपने में भी उम्मीद नहीं थी। ठाकरे के अपने पुत्र उद्धव जो राजनीति से दूर अपनी ही दुनिया में मगन थे अचानक राजनीति में आ गए। बस यहीं से राज की तकलीफ बढ़ गई। वो असहज थे लेकिन मौन। उन्हें उम्मीद थी कि राजनीति उद्धव के बस की बात नहीं। वो थक हार कर इसे नमस्ते कह जाएंगे।

अफसोस, पर ऐसा हुआ नहीं। हैरान, परेशान राज ने आखिरकार अपनी नई पार्टी का गठन किया। लेकिन सवाल था कि वो करें क्या। शैली तकरीबन उनकी वही रही जो शिवसैना में उनकी थी। हां, आक्रामकता में उबाल जरूर आया। उन्हें पता था कि चाचा बाल ठाकरे की ढाल अब नहीं है सो अगर आक्रामक नहीं रहे हो तो पतन निश्चित है। सो उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए उत्तर भारतीयों को निशाना शुरू किया।

आप कह सकते हैं कि राज के लिए इससे बेहतर आसान निशाना कोई नहीं हो सकता। परप्रांतीय के नाम पर उनके समर्थकों ने सड़कों पर कोहराम मचाकर रख दिया। वो हर दिन कुछ न कुछ कर रहे थे लेकिन जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात थी वो यह थी कि राज्य की कांग्रेस सरकार मौन थी। बहुत दबाव होने पर ही कोई मरी सी प्रतिक्रिया सामने आती थी।

राज्य सरकार की यह चुप्पी कइयों को परेशान करने वाली थी। लोग यह सोच रहे थे कि आखिर राज्य सरकार को हुआ क्या है। क्या कोई आदमी इतना बडा़ हो सकता है कि वह सिस्टम को चुनौती देना शुरू कर दे। किसी को भी धमकाना शुरू कर दे....। ...हां, हो सकता है, जब बात वोटों की हो, दूसरे का आधार खत्म करने की हो। शिवसेना जब यह आरोप लगाती है कि कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां शिवसेना का वोटबैंक काटने के लिए राज ठाकरे को बढ़ावा दे रही हैं तो एक क्षण के लिए आम आदमी ठिठक कर सोचता जरूर है कि कुछ ऐसा तो हुआ है जिससे ऐसा लगता है हालांकि ये बात सिर्फ अनुमान तक ही सीमित है।

आम चुनाव हुए..सबने देखा, राज के शिवसेना को नुकसान पहुंचा दिया। उसके वोट बंट गए। शिवसेना सुप्रीमो तिलमिला गए। जब बात राज्य चुनावों की आई तो उनकी तिलमिलाहट साफ नजर आने लगी। उन्होंने कहा कि राज तो जिन्ना है उसे उसी की तरह पछताना पड़ेगा। अब बेटे उद्धव की बारी थी। उन्होंने कहा नहीं माना राज तो उसे बाद में देख लेंगे। जवाब राज ठाकरे की तरफ से भी आया।

इन ठाकरे ब्रदर्स की इस फिल्म का क्लाइमेक्स क्या होगा अभी किसी को पता नहीं है लेकिन इतना जरूर है ये दोनों भाई समाज को, इस देश को और हमारी लालाची नेताओं को आईना जरूर दिखा रहे हैं।

ये दोनों भाई पूरे देश के लिए कई सवाल छोड़ रहे हैं जिसका कभी न कभी हर भारतीय का जवाब देना ही होगा कि क्या कोई भी मसला देश से बढ़कर हो सकता है। हम क्या कहें कि पहले हम भारतीय हैं या फिर हम ये कहें कि हम मराठी, उत्तर भारतीय, गुजराती, दक्षिण भारतीय हैं, हम पहले हिंदू हैं, मुसलमान हैं, सिख हैं, ईसाई हैं या फिर हम पहले भारतीय हैं। यहां सवाल ये नहीं है कि आपको अपने धर्म या अपने क्षेत्र से प्यार है या नहीं यहां सवाल ये है कि क्या हमारी भारतीयता की भावना कमजोर हो रही है।

बड़े दिन तक हमारे यहां धर्म के नाम पर दंगे होते रहे तो अब हम क्या कहें कि क्षेत्र के नाम पर दंगों के लिए तैयार रहो। आखिर क्यों केंद्र और राज्य सरकारें किसी आदमी के कद को इतना बढ़ा होने देती हैं कि वो सिस्टम को गाहे बगाहे चुनौती देने लगता है। केंद्र की जड़ता कब टूटेगी, कब सत्ता में बैठी पार्टियां वोटबैंक से आगे सोचना शुरू करेंगी।

राज का उदय कई मायनों में चौंकाने वाला है। वह भी राजनीति की आजमाई हुई धारा यानी अतिवाद के जेट पर सवार हैं, अतिवाद कोई नया प्रयोग नहीं है। बीते 20-25 सालों में इसका जमकर इस्तेमाल हुआ है, किसने किया, कैसे किया जनता और हुक्मरानों को अच्छी तरह पता है। पर मेरा सवाल फिर वही है कि क्या देशहित से बढ़कर वोटहित, सत्ताहित, अहंहित हो सकते हैं।

कल्पना कीजिए कि अगर हर प्रदेश में एक राज ठाकरे हो तो क्या होगा। सड़कों पर हर दिन कोई परप्रांतीय पिटेगा, किसी को कभी भी धमाकाया जाएगा और कभी भी किसी का जीना मुहाल कर दिया जाएगा। क्या हम और आप राज के इस मल्टीवर्जन के लिए तैयार हैं, क्या ये सही समय नहीं है कि हम ये तय करें कि हम इंडियन पहले हैं कोई प्रांतवासी बाद में।

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