काफी समय से एक नीरो के बारे में बार-बार एक ही बात सुनता आ रहा हूं कि जब रोम जल रहा था वह आराम से बांसुरी बजा रहा था, तो...? इसके पीछे का एक सबक है जो किताबी दिनों में ही समझ आ गया था पर कभी मुझे इसे लेकर इतनी उत्सुकता नहीं हुई। बाद में एक बार माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अहाते से नीरो शब्द गूंजा। किताबी दिन फिर याद आ गए। वो सबक याद आ गया। समय गुजरा, नीरो की आवाज धीरे-धीरे मंद पढ़ने लगी।
आजमी को जब थप्पड़ लगा तो फिर इस शब्द को मैंने महसूस किया। अब आईबीएन के ऑफिस पर हमला हुआ। टीवी पर बार-बार सीएम अशोक चव्हाण साहब सफाई दिए जा रहे थे कि कार्रवाई होगी, बार-बार उनसे एक ही सवाल पूछा जा रहा था कि क्या आप कार्रवाई करेंगे, किंगपिन को पकड़ेंगे, सीएम साहब ने दोहराया करूंगा, करूंगा, फिर महाराष्ट्र के गृह मंत्री से पूछा गया- कार्रवाई करेंगे, जवाब आया - करूंगा, फिर पूछा गया- फिर जवाब आया करूंगा-करूंगा...! सवाल ये कि जब एक बार प्रांत का मुखिया कह रहा है कि कार्रवाई होगी तो फिर देश की जनता के दिल को ये चैन क्यों नहीं आ रहा है कि कार्रवाई होगी...मुझे लगता है इन्हीं सवालों के बीच में लोकतंत्र की जानबूझकर पैदा की गई बेचारगी छिपी हुई है।
शायद सीएम साहब से सवाल बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं पड़ती अगर राज ठाकरे को वो पहली बार ही हंगामा करने पर सलाखों के अंदर कर देते। हमारी आपकी आंखों ने कई बार देखा, पढ़ा है कि मुंबई में गाहे बगाहे शिवसेना और मनसे के कार्यकर्ता कहीं भी कभी भी हंगामा, मारपीट शुरू कर देते हैं। आखिर क्यों उन्हें रोका नहीं जाता। इसकी अगर विवेचना करें तो शायद घूम फिरकर वहीं आ जाएंगे कि राज्य सरकार निकम्मी है, वह मौन है, उसे इस हंगामे की परवाह नहीं। मुझे लगता है कि इस आलोचना से भी अब आगे जाकर सोचने की जरूरत है कि अगर यही सब चलता रहा तो आगे होगा क्या?
हाल ही में मैंने एक चैनल पर एक मनसे नेता को यह कहते देखा कि हमारे लिए प्रांत पहले है, भारत बाद में। एक नजर से देखो कि यह बात तो छोटी है लेकिन इसका इशारा बड़ा यानी भारत को तोड़ने वाला है। क्या मैं आप और कोई भी भारतीय इस वाक्य को सुनने के लिए तैयार है? मैं कहूंगा कि कोई नहीं और उम्मीद करूंगा कि देश के सवा अरब लोग भी वही चाहते हैं। आखिर इन लोगों की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती है। फिर हम वहीं आ जाते हैं, केंद्र और राज्य में बैठी पार्टियों द्वारा वोटों के लिए अपनाए गए नकारापन के चलते ये भस्मासुर पैदा हुए।
क्या इन पार्टियों को अपना वोट बैंक इतना प्यारा है कि ये इसके लिए पूरे देश को दांव पर लगाए दे रही हैं। हम और आप चाहे जो भी सोचें लेकिन हकीकत काफी कुछ इस सवाल के शाना बशाना चलती नजर आती है। सोचिए, बाल ठाकरे, राज ठाकरे, भिंडरावाला कैसे बड़े हो गए। जड़ में जाने पर पता चलता है कि दूसरी पार्टी की काट के लिए इन्हें बड़ा बनाया गया। आज तक सबने इन्हें बुरा कहा कि ये लोग बुरे हैं, मेरा सवाल ये है कि जिसने उस वक्त इन पर एक्शन न लेकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया, क्या वो सजा के हकदार नहीं। क्या वो भारत के नीरो नहीं....?














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