आज ऑफिस आने में मैं थोड़ा लेट हो गया, तेज कदमों से अपनी सीट पर पहुंचा, अपना कंप्यूटर ऑन करने से पहले ही मेरी नजर मेरे साथी के स्क्रीन पर पड़ी, आईबीएन खबर की लीड पर नजर गई और रुक गई। मन में अजीब सी कसमसाहट हुई और फिर उसी बैचेनी में मैंने अपना पीसी ऑन कर लिया। ऐसी खबर अमूमन हमारी लीड बन जाती है। बस इसमें हमें ये बदलना पड़ता है कि किसको धमकाया गया है पर ये तय हो गया कि कौन धमकी देगा। अब सीधे मुद्दे पर आता हूं। धमकाने वाला और कोई नहीं, ठाकरे एंड कंपनी है।
खबर थी कि मुकेश अंबानी के बयान पर बाल ठाकरे को गुस्सा आ गया। वो सामना में लिखते हैं कि भाई अंबानी ऐसी बात मत करो, मुंबई तो सिर्फ मराठियों की ही है। वैसे ये अब रुटीन हो गया है। ठाकरे ब्रदर्स आजकल अक्सर किसी न किसी को मराठावाद के नाम पर हड़काते हुए मिल जाते हैं। अभी घंटा भर भी नहीं बीता था कि एक और खबर आ गई कि ठाकरे एंड कंपनी की ओर से शाहरुख को भी घुड़की मिली है। अजीबोगरीब स्थिति हो गई है किसी को भी डांट मिली जाती है। सब जानते हैं कि ठाकरे अपनी राजनीति की दुकान चला रहे हैं पर सवाल वही है कि सिस्टम उन्हें कब तक ऐसा करने की अनुमति देता है या फिर कहें कि कब उन पर कार्रवाई का मन बनाता है।
थोड़ा फ्लैश बैक में जाइये, ठाकरे एंड कंपनी का उदय कैसे हुआ। दरअसल ये सन 60 का दौर था जब महाराष्ट्र में ट्रेड यूनियन का बोलबाला था, नौकरियों में परप्रांतीय तब भी बड़ी संख्या में थे। यूनियन की ताकत को खत्म करने के लिए तब एक राष्ट्रीय पार्टी ने ऐसे तत्वों को हवा दी जो कि क्षेत्रीयता का नारा लगाकर इनमें दो फाड़ करा सके। कोशिश थी कि किसी तरह वामपंथी प्रभाव वाली यूनियनों को खत्म किया जाए। फार्मूला कामयाब हुआ लेकिन जिन लोगों को ऐसा कराने के लिए आगे बढ़ाया गया वो अब धीरे-धीरे क्षेत्रीय ताकत बनकर उभरने लगे। यानी नफरत की आग ने जिन्हें जीवनदान दिया वही आने वाले कल की कड़वी हकीकत बन गए। सन 92 के बाद इन ताकतों को संप्रदायवाद के रूप में नया हथियार मिल गया। उस वक्त देश के दक्षिणपंथी संगठनों को ठाकरे की बातें बहुत सुहाती थीं। वे मन ही मन प्रसन्न होते थे। एक ध्येय हल हो रहा था, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा था। कितनी ऐसी चीजें हैं जिनका आज तक निदान नहीं निकला। दंगों पर बने कमीशन की रिपोर्ट बेमानी कर दी गई। आज उसकी कोई बात नहीं करता। क्या न्याय किसी का धर्म देखकर दिया जाएगा देश में?
अब हालात बदल गए हैं, चाचा-भतीजा आमने सामने हैं, उनके लिए मुसलमान अब बड़ा विषय नहीं रहे। फिर से उन्हें मराठी का मुद्दा क्लिक करने लगा है। यानि संप्रदायवाद से अब वो क्षेत्रवाद पर आ चुके हैं। हर तरफ मराठी की गूंज है। मराठावाद के नाम पर किसी को भी धमकी दी जाती है, चाहे फिर वो सचिन हो, मुकेश अंबानी हों, अमिताभ बच्चन हो या फिर मीडिया।
ठाकरे एंड कंपनी की इस धूम धड़ाम पर सवाल के घेरे में अगर कोई है तो वो ठाकरे ब्रदर्स नहीं बल्कि हमारा संघ, बीजेपी, और कांग्रेस है। गौर करने वाली बात है कि संघ हर स्वयंसेवक को राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाता है। पर जब अपना ही तथाकथित कट्टरपंथ का ठेकेदार इस थ्यौरी को पलट रहा है तो वह मौन है। साफ है महाराष्ट्र पर कब्जे की लड़ाई में जुटे ठाकरे ब्रदर्स को राष्ट्र से नहीं सिर्फ महाराष्ट्र से मतलब है। मुझे ध्यान नहीं आता कि किसी बड़े मंच से संघ ने शिवसेना या मनसे का नाम लेकर कहा हो कि उनका क्षेत्रवाद हमारे राष्ट्रवाद की भावना के आड़े आता है, हम उसे नहीं मानते।
तो क्या हम मानें कि संघ में भी क्षेत्रवाद घर करता जा रहा है। संघ का मुख्यालय महाराष्ट्र में है, उसका मुखिया भी महाराष्ट्र से है और बीजेपी जो उसका राजनीतिक संगठन है उसका मुखिया भी महाराष्ट्र का ही है। क्या ये अजीब इत्तेफाक नहीं है। क्या ये नहीं दिखाता है कि सालों साल संघ ने जिस विचारधारा का ढोल पीटा उसे अब उसने ठाकरे एंड कंपनी के हाथों 'बेच' दिया है।
अब बात करते हैं बीजेपी की। साफ है कि महाराष्ट्र में वह सालों से शिवसेना के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है। क्या ये सही समय नहीं कि वह शिवसेना के क्षेत्रवाद पर अपनी स्थिति साफ करे और उससे नाता तोड़ ले। अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं है और आगे इसके आसार नजर नहीं आते क्यों राजनीतिक रूप से काफी जूनियर माने जाने वाले बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ठाकरे से काफी प्रभावित नजर आते हैं। संभव है कि दोस्ती के लिए वे ठाकरे के क्षेत्रवाद की इस कड़वी गोली को निगल लें।
अब आते हैं कांग्रेस पर, इतिहास गवाह है कि ज्वलंत मुद्दों पर कांग्रेस के देर से कार्रवाई करने या न करने के मिजाज के चलते विगत में कई विकराल समस्याएं उठी हैं, भस्मासुर पैदा हुए हैं जिनसे निबटने में देश को भारी जान माल का नुकसान उठाना पड़ा है। भगवा संगठनों को अगर बाबरी घ्वंस के लिए जिम्मेदार माना जाता है तो कांग्रेस को तब धृतराष्ट्र की तरह आंख मूंद लेने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। कमोवेश कांग्रेस इतिहास की उन्हीं गलतियों को दोहरा रही है। जब तक समस्या काबू से बाहर न हो जाए वो सक्रिय होने के मूड में नजर नहीं आती। कह सकते हैं सबका भला बने रहने में अगर राजधर्म भुला दिया जाए तो कोई बात नहीं है।
मुंबई हमलों के बाद कांग्रेस ने देशमुख को हटाकर अशोक चव्हाण को महाराष्ट्र के सीएम की कुर्सी दी। लोगों ने सोचा शायद नया मुखिया इस सामाजिक अव्यवस्था फैला रहे इन ठाकरे ब्रदर्स को आईना दिखाएगा लेकिन ये क्या उसने भी क्षेत्रवाद की जुबान बोलना शुरू कर दिया। मुंबई में टैक्सी का मामला सामने है सबके। मेरी ये समझ में नहीं आता कि क्या कोई बाल ठाकरे, राठ ठाकरे इस देश से बढ़कर है। क्या मुंबई किसी की बपौती है। कब तक चलेगी ये गुंडागर्दी। किसी का भी इस देश में अपमान हो जाए, इस देश में कार्रवाई नहीं होती।
मेरा सवाल है सत्ता मौन क्यों है, क्या हमें एक और भस्मासुरी समस्या का इंतजार है। क्या कोई भी किसी भी प्रांत से आएगा और कहने लगेगा कि वह देश पर पहले अपने प्रांत को मानता है। मेरे ख्याल से ये देश की एकता में दरार के खतरनाक संकेत हैं। समय रहते इसे भरा नहीं गया तो ये दरार गहरी भी हो सकती है। और अगर ऐसा हुआ तो ये देश राष्ट्रवाद का दंभ भरने वाले संघ, खुद को आधुनिक पार्टी बताने वाली बीजेपी और शासन में सुचिता का दावा करने वाली कांग्रेस को कभी माफ नहीं करेगा।














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