पिछले कुछ दिनों से लगातार मुंबई जंग का मैदान बनी हुई है। एक तरफ ठाकरे ब्रदर्स दूसरी ओर शाहरुख खान या कहें बाकी भारत। इस जंग में कौन जीता या जीतेगा ये तो पता नहीं लेकिन जो शुरुआती परिणाम आए हैं वो एक आम भारतीय के लिए मायूसी पैदा करने वाले हैं।
खबर आ गई है कि मुंबई में माई नेम इज खान रिलीज नहीं होगी। मल्टीप्लेक्स की आपस में इस बात पर सहमति बन चुकी है। बात खत्म, शिवसेना की मुराद पूरी हो गई साथ ही हमारी महाराष्ट्र सरकार की मुसीबत भी खत्म हो गई। न दिखेगी फिल्म न होगा हंगामा। यानी शिवसेना भी खुश और चव्हाण सरकार भी खुश। तो टेंशन क्या है दोस्त? मैं कहता हूं कि टेंशन है आज एक आम भारतीय हार गया, बॉलीवुड हार गया और वो हर इंसान हार गया जो धमकीतंत्र का विरोध करता है।
जरा गौर से देखिए हम बचपन से फिल्म में बुराई पर अच्छाई की जीत को देखते आए हैं। वही बॉलीवुड पर जब खुद मुश्किल आई तो अच्छाई पर बुराई जीत गई सब देखते रहे, एक और बिग बी चुप खड़े रहे तो दूसरी ओर कई नामी फिल्मी हस्तियां मौन साध गईं। मैं पूछता हूं कि जब आप लोग निजी जीवन में इतने कमजोर हैं तो फिर आपको महानयक कहलाने का अधिकार क्यों हैं।
आज एक आम भारतीय का भ्रम भी टूटा है। जब कोई कहता है कि हम सुपर पावर बनने वाले हैं तो हर भारतीय की छाती गर्व से फूल जाती है। मानो दिल कह रहा हो- रस्ता छोड़ो कि भारत आगे आता है। पर मेरा सवाल ये है कि जब हम ठाकरे जैसे छुटभैये नेताओं की धौंस के आगे झुक जाते हैं तो चीन जैसे देश का कैसे मुकाबला कैसे करेंगे।
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हमारे नेता कमजोर, निर्लज्ज और दोहरा चरित्र जीने वाले हैं। जो देशहित के ऊपर अपने अपने स्वार्थों की कई मंजिला इमारतें बनाए हुए हैं। फिर वो चाहे कोई भी पार्टी क्यों न हो। हम चाहते क्या हैं यह अब तय करना जरूरी हो गया है। क्या किसी की धौंस, एक आम भारतीय की राय से ऊपर है क्या। अगर है तो फिर हर भारतीय को चिंतित होने की जरूरत है। वह इस भ्रम को दूर कर ले कि मुंबई या फिर किसी बड़े शहर के भारत में होने पर गर्व कर सकता है क्योंकि मुंबई के इस विवाद ने साबित कर दिया कि किसी की जबरदस्ती के लिए संविधान को ठेंगा दिखाया जा सकता है।
हर कोई ये सवाल पूछ रहा है कि इतने दिनों तक शिवसेना के मुखपत्र सामना में भड़काऊ लेख छपते रहे, उनके शीर्ष नेता खुलेआम धमकी देते रहे और उन पर सीधे कोई कार्रवाई करने के बजाए राज्य की पंगु सरकार कोई भी सीधी कार्रवाई क्यों नहीं कर पाई।
क्या केंद्र और राज्य सरकारें सिर्फ बातें करने के लिए ही हैं, हमारे गृह मंत्री सिर्फ यह कहकर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं कि राज्य सरकार इस पर कार्रवाई करने में सक्षम है। उधर, हमारे सीएम पूरे वक्त सिर्फ जुबानी जमाखर्च कर समझ लेते हैं कि काम हो गया। ये मामला हमें और आपको ये साफ संदेश देता है कि कल आप इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुगालता न पाल बैठें वरना वही होगा जो कि शाहरुख के साथ हुआ। नए भारत में प्लीज संविधान और नियम कायदों की बात अब न की जाए तो बेहतर होगा वरना मुंबई की तरह ही कहीं से कोई ठकरासुर दहाड़ उठेगा...














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