कुछ दिन पहले दिल्ली के एक व्यस्त बाजार से निकलते वक्त एक शख्स ने मुझे रोककर पूछा, टाइम क्या हुआ है भाई? मैंने जवाब दिया- फोर थर्टीफाइव। अब आप सोच रहे होंगे मियां, इसमें अजीब क्या है, बेशक मैं भी ऐसा ही सोचता हूं। लेकिन कुछ लोगों को इसमें इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर ऐतराज हो सकता है।
दरअसल इसमें अंग्रेजी वर्ड्स का इस्तेमाल हुआ है जैसे कि टाइम। काम के दौरान अमूमन हमें ऐसे यक्ष प्रश्न का सामना करना पड़ता है कि हम क्या लिखें। शुद्ध हिंदी या फिर वह भाषा जो आम जनमानस बोलता और समझता है।
मीडिया कोई स्कूल की क्लास नहीं है यह तो आपको आपकी भाषा में जरूरी खबरें पहुंचाने का मजेदार माध्यम है।
कहने की जरूरत नहीं जबतक हिंदी चैनलों का आगमन नहीं हुआ था तबतक सबकुछ ऐसा ही था पर अब प्रिंट और ऑनलाइन ने देर से ही सही पर इस बदलाव को स्वीकारा है। बहुत से लोग इसे भाषा का भदेस (भोंढ़ापन) कहते हैं। मेरा सवाल यह है कि आपकी न्यूज कोई ढंग से पढ़ भी ना पाए तो उसमें आपकी क्या योग्यता है।
जाहिर है आप बड़ा बदलाव तभी ला सकते हैं जब जनता में अपनी बात को असरदार तरीके से पहुंचा सकें।














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