बीते कई दिनों से टीवी पर रश्दी छाए हुए हैं। कुछ उसके समर्थन में हैं तो कुछ उनके विरोध में हैं। हंगामा जारी है। उनकी किताब सेटेनिक वर्सेज दो दशक बाद फिर 'जिंदा' हो गई है। यकायक मुस्लिम समुदाय के कुछ ठेकेदारों ने उसके यहां आने पर प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है तो विपक्ष में कई लेखक और अन्य पूछ रहे हैं कि भइया हर बात पर हल्ला मचाने की आदत कब बदलोगे। बार-बार कहने लगते हो कि इस्लाम खतरे में है....
टीवी पर हुई बहस की एक लाइन में यहां लिखना चाहूंगा- मुस्लिम धर्म गुरु फिरंगी महली और एक राइटर शीबा के बीच तीखी बहस जारी थी। महली कह रहे थे कि रश्दी को विरोध हर हाल में होना चाहिए और अपने बात नॉन स्टोप बोलते ही जा रहे थे इसी बीच शीबा ने उनसे पूछा- बाकी सब तो ठीक है लेकिन ये बताइये इतनी शिद्दत से मुस्लिम एजुकेशन की बात क्यों नहीं करते। आपके हंगामा मचाने से रुश्दी को फिर चर्चा में ला दिया है। हर ओर उसके और उसकी किताब सेटेनिक वर्सेज के बारे में बात हो रही है।
टीवी पर उठने वाली ये शीबा की कमजोर सी आवाज में पूरे समाज की हकीकत छिपी हुई है। ये वो आवाज है जो टीवी पर दुर्लभ ही दिखाई देती है। बहुत कम टीवी वालों को नजर आती हैं ऐसी आवाजें। रश्दीनामा से दो बातें साफ हुई हैं एक टीवी के बारे में और दूसरी मुसलमानों के बारे में। सबसे पहले टीवी पर बात कर लेते हैं।
जब-जब टीवी को मुस्लिम समाज के नाम पर कोई बात कहलवानी होती है फौरन ढूंढ लाता है किसी फिरंगी महली को या फिर किसी मस्जिद के इमाम को। यानी जब भी मुसलमानों की बात होगी तो ये बताएंगे कि मुसलमान क्या सोचते हैं। ये हद दर्जे का भद्दा और हास्यापद प्रयास है। जब भी टीवी को मुस्लिम विचारों की भूख लगती हैं तो मुस्लिम चेहरे के रूप में कट्टरपंथी पेश कर देता है।
मेरा सवाल है कि कल किसी समाज की सोच के नाम पर आप तोगड़िया या किसी दूसरे कट्टरपंथी को बिठा दीजिए तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी ये हम सब जानते हैं तो मेरा सवाल हर उस टीवी चैनल से है जो मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया के नाम पर किसी मौलवी या धर्मगुरु को पकड़ लाता है और अगर वो चैनल कभी ऐसा करता है तो फिर जस्टिस मार्कंडेय काट्जू का वो बयान किस मायने में गलत है कि मीडिया ने मुसलिम समाज को आतंकी बनाकर पेश कर दिया।
मैं भी पत्रकार हूं जब काट्जू ने मीडिया की सोच पर सवाल खड़े किए तो मुझे भी बुरा लगा लेकिन मेरा सवाल ये है जो ढूंढ-ढूंढ कर किसी मुस्लिम कट्टरपंथी को सीट पर बिठाकर मुस्लिम समाज का चेहरा बताना एक पूरे समाज का मजाक उड़ाना नहीं तो क्या है।
यानी एक आदमी जिसने देश का प्रतिनिधित्व किया-कलाम या एक आदमी जिसने आईटी इंडस्ट्री में अपनी कामयाबी के झंडे गाड़े-प्रेमजी या फिर कोई नई सोच वाली शीबा जैसी राइटर किसी टीवी वाले के लिए मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि नहीं हैं लेकिन फिरंगी महली जरूर होंगे, ऐसा क्यों हैं...। एक तर्क आ सकता है कि ये तो धर्म के दायरे ऊपर जा चुके हैं पर मेरा सवाल ये है कि 15-20 करोड़ भारतीय मुसलमानों के आदर्श कौन है कलाम या फिर किसी मस्जिद का इमाम। इस जवाब को भी ढूंढ लिया जाए तो बेहतर होगा। टीवी को भी गेस्ट पकड़ने के चक्कर में शोर्ट कट अपनाने की आदत छोड़नी पड़ेगी तभी कुछ बदलेगा। ये तकरीबन आपराधिक है कि बार-बार दाढ़ी वालों को लाकर ये संकेत दिया जाए ये समाज के कर्ताधर्ता हैं। क्या हम नहीं जानते हैं मीडिया ओपीनियन मेकर होता है?
दूसरी बात मुस्लिम समाज को लेकर है। बड़ा अजीब नहीं है कि जो भी आता है बड़ी शिद्दत से खुद को इस्लाम का रखवाला बताने में जुट जाता है। मैंने इस्लाम को ठेस पहुंचाने की बात पर तो कई बार हंगमा होते देखा है लेकिन किसी को मुस्लिम समाज की एजुकेशन के लिए कभी इतनी शिद्दत से हल्ला नहीं मचाते देखा...क्यों..इसलिए कि कोई फिर उन्हें सुनेगा नहीं। जिस तरह रश्दी ने सेटेनिक वर्सेज लिखकर जो आवभगत पश्चिमी देशों में अपनी करवाई है वो अगर कोई और किताब लिखते तो नहीं करवा पाते। फिर कोई जयपुर फेस्टिवल में उनके लिए दिवाना न होता। सवाल ये है कि कैसे विवादास्पद मुद्दों पर हंगामा मचाओ कैसे दूसरों की आंखों में चढ़ जाओ। ये भी एक शगल है।
मुझे रश्दी और इन धर्मगुरुओं के मकसद पर कोई भ्रम नहीं है दोनों तकरीबन एक रास्ते पर हैं। हां, अंदाज जरूर अलग है। एक डिफेंडर है और एक ओफेंडर। रश्दी अगर लिखता भी है तो ये उसकी अपनी सोच है पर इस कदर ये विरोध हास्यास्पद नजर आता है। किसी को दर्द है तो वो एक किताब लिख दे। पर जितनी शिद्दत से उसका विरोध हो रहा है उतनी शिद्दत से अगर इन लोगों मुस्लिम समाज में कोई एजुकेशन कैंपेन लॉन्च की होती है 2-4 करोड़ रुपये जुट जाते...पर अफसोस ऐसा होगा नहीं...फिर कोई रश्दी आएगा....फिर टीवी को भूख लगेगी....फिर मुल्ला-मौलवी बुलाए जाएंगे...फिर पूरे मुस्लिम समाज को कठघरे में खड़ा किया जाएगा...फिर...फिर...फिर
ये सिलसिला तभी टूटेगा जब टीवी अहद कर ले कि मुस्लिम समाज के नाम पर नई पीढ़ी की नई सोच वाले लोगों को भी कम से कम उतना ही मौका देगा जितना इन मुल्लों को देता है...जब मुसलमान ये सोच ले कि रश्दी नहीं शिक्षा पर हमें ज्यादा टेंशन लेने की जरूरत है....तो मुस्लिम समाज बदलेगा...देश बदलेगा!














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