अगर मैं कहूं कि देश के राजनीतिक पटल पर आज भी राष्ट्रीय विचारधारा का सूखा है तो कई लोगों को अजीब लग सकता है पर हकीकत यही है। देश में कमोबेश जितनी भी पार्टियां आज राजनीति के मैदान में हैं उनमें लेफ्ट और कांग्रेस को छोड़कर शायद ही कोई ऐसी पार्टी हो जिसका नजरिया राष्ट्रीय नजर आता है। ये देश के लिए घातक स्थिति है कि राष्ट्रीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा ऐसी पार्टियों का है जो क्षेत्रीय या धर्म आधारित राजनीति करती हैं। इसमें तमाम बड़ी और छोटी राजनीतिक पार्टियां शामिल हैं।
कांग्रेस आजादी के बाद से सबसे ज्यादा देश पर शासन करने वाली पार्टी है। सवाल उठता है कि क्यों, आंदोलन तो जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया ने भी किया था। कांग्रेसराज में घोटालों और बदनामियों की लिस्ट लंबी है। सैक्युलर होने का तमगा लेकर अगर वो अपनी छाती फुलाती है तो देश को अपने नाकारापन से कई बार भारी नुकसान पहुंचाने का श्रेय भी इसी पार्टी को जाता है। सवाल फिर वहीं घूम फिर के वापस आ जाता है कि तो फिर कांग्रेस जीतती क्यों है। मेरी नजर में तीन बातें उसे उसकी हर गलती के बावजूद सत्ता दिलाती हैं। एक- उसकी देश के हर कोने में मौजूदगी। दो- उसकी राष्ट्रवादी विचारधारा। तीन- उसका सैक्युलर होना।
इन्हीं तीन शर्तों को आप बाकी पार्टियों पर लगाकर देखें तो मात्र आपको बीजेपी ही ऐसी पार्टी मिलेगी जो इसकी शर्तों के आसपास नजर आती है। लेकिन उसकी कुंडली में सैक्युलरहीनता का दोष है। बीजेपी लाख कहे कि वो माइनोरिटी विरोधी नहीं है लेकिन उसकी कथनी और करनी इससे मेल नहीं खाती। मैं बाकी बातों पर नहीं जाना चाहता लेकिन एक छोटा सा उदाहरण देना चाहता हूं। हाल में यूपी में चुनाव संपन्न हुए। बीजेपी ने एक फीसदी भी माइनोरिटी उम्मीदवार नहीं खड़े किए। अगर बीजेपी अपनी इमेज सही मायने में बदलने के लिए गंभीर होती तो पार्टी के अंदर माइनोरिटी की भागीदारी को बढ़ाती।
अब सवाल उठता है कि बाकी पार्टियां क्यों एक बड़े स्तर पर नहीं आ सकीं। हम जिन पुरानी पार्टियों की बात कर रहे हैं उनमें से अधिकांश दो तरह की राजनीति कर रही हैं। एक क्षेत्रवाद की और दूसरी जाति आधारित राजनीति। प्रदेश स्तर पर तो ये तरीका कई बार कारगर साबित होता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर वही तरीका विरोधाभासी हो जाता है। हमें ये देखना चाहिए कि दोनों ही तरह की राजनीति देश के ताने-बाने को एक तरह से कमजोर करती है। कई बार ऐसी पार्टियों की सोच राष्ट्रीय विचारधारा से टकराने लगती है।
इन हालात में राजनीतिक परिदृश्य में किसी ऐसी पार्टी की जरूरत है जो इन तीनों बातों को पूरा करती हो। बीते साल जब अन्ना ने हुंकार भरी तो जो भीड़ आई उसने देश के मूड का एक तरह से बयान कर दिया। जनता देश में बड़े पैमाने पर बदलाव चाहती है। ये कहना गलत नहीं होगा कि लोगों को मौजूदा राजनीतिक पार्टियों की बातें ज्यादा असरकारी नहीं लगतीं या ये कहें कि किसी एक तबके को ही उनकी बातें अपील करती हैं। अगर ऐसा न होता तो यूपीए शासन में जिस स्तर पर करप्शन बाहर आया है उसके बाद बड़ा जनसमूह सड़कों पर आ गया होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका अर्थ ये हैं देश की जनता को मौजूदा राजनीतिक पार्टियों पर यकीन नहीं रहा। ऐसे में एक नए राजनीतिक विकल्प की जरूरत है।
टीम अन्ना ने जब इस अगस्त में राजनीतिक विकल्प की ओर इशारा किया तो बहुतों को उम्मीद जगी थी। लेकिन अन्ना-केजरीवाल के बीच ही अब गफलत फिर दिखने लगी है। अन्ना कहते हैं कि केजरीवाल की पार्टी का समर्थन नहीं करेंगे तो केजरीवाल कैंप का कहना है कि अगर राजनीतिक पार्टी नहीं तो फिर क्या। ये विकल्प तो उन्होंने ही सुझाया था। इससे आगे क्या...?
मुझे मालूम है कि बात होगी, शायद अन्ना अपने बिगड़े बयान को फिर सीधा कर लें लेकिन इस गड़बड़झाले ने एक तीसरी ताकत के उदय पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है कि केजरीवाल की पार्टी चुनाव लड़ेगी बल्कि इससे आगे उन्हें टीम अन्ना के अंतर्विरोधों को भी खत्म करना होगा। लोगों को भरोसा होना चाहिए कि तीसरी ताकत पर अगर वो दांव लगाएंगे तो बेकार नहीं जाएगा। मंच सजा हुआ है नए राजनीतिक उदय का। पर क्या वो कोशिश मतभेद और राजनीति का शिकार हो जाएगी या फिर देश को एक नई दिशा देगी इसका जवाब भविष्य के गर्त में है।














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