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अफसर अहमद
Sunday , August 17, 2008 at 10 : 43

शबाना तुम भी…


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अभी मैंने शबाना आजमी और सैफ के कमेंट पढ़े। फिर से मन में दबे एक सवाल ने कोहराम मचाना शुरू कर दिया है कि ये मुसलमान हैं तो क्या हुआ? आखिर यह अस्वीकार्यता क्यों हैं। आखिर क्यों दूसरे समाज में एक अकेले मुस्लिम परिवार के लिए जगह नहीं है। मैं भी बाकियों की तरह चुप्पी साध सकता हूं। चुपचाप मन में मचे इस कोलाहल को गुजर जाने दे सकता हूं लेकिन अब मैं ऐसा करूंगा नहीं।

सच को स्वीकारना और उसका मुकाबला करना जरूरी है। यहां मेरा आक्रोश किसी दूसरे समुदाय को लेकर नहीं है। जाहिर है कि एक आम मुसलमान की इमेज बाकी समुदाय में स्वीकार्य नहीं है। इसके लिए मेरी नजर में खुद मुसलमान तबका ही जिम्मेदार है।

ऐसा नहीं है मुस्लिम तबके में विकास नहीं हो रहा लेकिन ये जरूर हो रहा है कि जो आगे बढ़ रहा है वह बाकियों को तुच्छ मानकर भूलता जा रहा है। सीधे तौरपर जो तरक्की कर चुके हैं वह भी पिछड़े मुस्लिम तबके के बारे में सोचना नहीं चाहते।

आप जाइये किसी मुस्लिम इलाके में वहीं आपको गंदगी मिलेगी। अब क्या यह भी सरकार करेगी या कोई और समुदाय के लोग। इस तबके पर जबतक कट्टरपंथी हावी रहेंगे और उदारपंथी इसकी सुध नहीं लेंगे यही होता रहेगा।

कट्टरपंथियों से में पूछना चाहता हूं कि आजादी के 62 सालों में उन्होंने मुसलमान को क्या दिया, भुखमरी, बेगारी, अनपढ़ता...कोई थोड़ी आजाद खयाली की बात करता है तो सारे मुल्ला मौलवी उसके पीछे पढ़ जाते हैं। जैसे उन्होंने पूरे समाज का ठेका ले लिया हो। मुसलमान को बदहाली के लिए ये भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। हर दिन एक फतवा निकाल दिया जाता है। क्या कोई बदला? स्वतंत्रत भारत में फतवा अब मुसलमान को चला रहा है!

सानिया क्या पहन रही है इसकी कट्टरपंथियों को चिंता है लेकिन गरीब मुसलमान के बच्चे पढ़ नहीं पा रहे इसकी चिंता कौन करेगा। इस पर कोई फतवा क्यों नहीं निकाला जाता कि सारे पैसे वाले मुसलमान कम से कम एक गरीब बच्चे को पढ़ाने का जिम्मा उठाएंगे।

यकीन मानिए इस पर कोई कौमी मुहिम नहीं चलाएगा, अंटी से पैसा जो जा रहा है। मैंने देखा है इनमें से अधिकतर मुस्लिम तबके पर अपना रौब गांठने के लिए यह सारे काम करते हैं। हकीकत में इन्हें मुस्लिमों से कोई लेना देना नहीं है। सही मायने में यही कौम के दुश्मन हैं जो नहीं चाहते कि मुसलमान पनपे।

इतने मदरसे चल रहे हैं। क्या वहां पर भारत सरकार के सिलेबस भी शामिल करने की जरूरत नहीं है। पर नहीं ये तो अपनी मर्जी का करके मानेंगे। अरे भाई दीन ईमान के साथ साथ दुनियावी तालीम की भी जरूरत है। अचंभे की बात यह कि कई मदरसे अपने खर्चे की लिखत-पढ़त भी सरकार को देने को राजी नहीं है। अरे भई क्यों? डरते क्यों हो अगर गड़बड़ नहीं है तो हिसाब दो। पर नहीं देंगे, जो बचा रहे हैं वो भी तो मालूम पड़ जाएग। अब मेरा सवाल यह है कि मदरसे में पढ़कर एक मस्जिद का इमाम बना इंसान क्या ठीक से अपने परिवार का पेट पाल सकता है। वह ताउम्र मुहल्ले वालों के दिए पैसों पर जीवन गुजारता है। क्या उसे एक अच्छी जिंदगी जीने का हक नहीं है। आखिर क्यों उसे दुनियावी तालीम से अलग रखा जाता है। यही इमाम मुस्लिम समाज में बदलाव की एक अहम कड़ी साबित हो सकते हैं बशर्ते इन पर ध्यान दिया जाए।

अक्सर मेरे कानों में यह शब्द आते रहते हैं कि मुसलमानों के साथ भेदभाव होता है। मैं पूछता हूं कि कितनों ने नए जमाने के हिसाब से खुद को ढाला है। हम जब घर से निकले तो कुछ ऐसा ही सोचकर निकले ऐसा क्यों भाई, अगर ऐसा होता को कोई शबाना आजमी, सानिया मिर्जा या कलाम हमें देखने को नहीं मिलते।

सैफ और शबाना ने जो कहा वह हम सबने सुना। जाहिर है मुसलमानों के उदारपंथी तबके को आगे आकर इन कट्टरपंथियों से मुकाबला करना होगा। ताकि आने वाले कल में मुसलमान बच्चे सानिया, शबाना, प्रेमजी और कलाम को अपना आदर्श मानें न कि किसी विकृत मानसिकता वाले जिहादी को।

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