जनवरी, 2010
'हाऊ ऑनेस्ट इज द फिल्म', उस अजनबी लड़के ने मुझसे ये सवाल किया। मैंने बचने की कोशिश की। उसने फिर पूछा 'हाऊ ट्रू इज द फिल्म'। अमिताभ बच्चन की फिल्म 'रण' देख कर निकला था कि ये 'हादसा' हो गया। फिल्म के दौरान भी कहीं न कहीं मन में ये बात थी कहीं कोई पहचान न ले। इसलिये थोड़ा बच-बच के चल रहा था लेकिन पकड़ा गया। मैंने कहा 'फिल्म सच्चाई के काफी करीब है।' फिल्म टीआरपी के पीछे भागते टीवी न्यूज चैनल्स की कहानी है। कैसे चैनल्स टीआरपी के लिये कुछ भी करते हैं? फिल्म देखते-देखते कई बार ये भी लगा शायद मैं भी इस फिल्म में एक किरदार हूं। सचाई कड़वी थी। कई बार राम गोपाल वर्मा को गाली देने का मन भी किया। लेकिन अगले ही पल ये भी लगा रामू ने गलत क्या दिखाया है। क्या हम टीवी वाले टीआरपी के लिये कुछ भी....
'ओए मनिंदर, तू तो ऐसी गल मत कर, शर्म कर।' प्यार भरी ये झिड़की जहीर अब्बास की थी। और वो कह रहे थे भारत के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर मनिंदर सिंह को। जहीर अब्बास को पहचान की जरूरत नहीं। उन्हें एशिया का ब्रैडमैन कहा जाता था। इंसान इतने नफीस की दुश्मन भी तारीफ करे। इसलिये टीवी पर एक बहस के दौरान जब उन्होंने मनिंदर को प्यार भरी झिड़की दी तो दिल न जाने क्यों मुंह को हो आया। वाकया था आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों की नीलामी में बोली नहीं लगने का। मनिंदर ने बस इतनी सी बात कही थी पाकिस्तान अगर भारत पर 26/11 जैसे हमले करेगा तो पाकिस्तान से क्रिकेट कैसे हो सकती है। मन तो मेरा भी यही कह रहा था कि जो पाकिस्तान भारत को खंड-खंड करने की साजिश रचे उससे हम क्रिकेट क्यों खेलें? लेकिन जहीर की बातों ने इतिहास की इस त्रासदी की कुछ दूसरी....
बात पुरानी है। एस.पी. सिंह तब मेरे एडीटर थे। एक दिन मुलायम सिंह के किसी मामले पर समाजवादी पार्टी का रिएक्शन चाहिए था। मैं उत्साही रिपोर्टर भागकर अमर सिंह की बाइट ले आया। एस पी के पास गया। वो मुझ पर भड़क गये। कहा, किस की बाइट ले आये, जाओ राम गोपाल यादव के पास। उनसे बात करो। कम से कम वो पॉलिटकल तो हैं। मरता क्या न करता। भागा भागा राम गोपाल के पास गया। उनसे बाइट ले आया। ये अमर सिंह के कैरियर की शुरुआत थी। तब बेनी प्रसाद का जलवा हुआ करता था, जनेश्वर मिश्रा संसद में बोलने उठते थे लेकिन उनको सुनते थे। राम गोपाल यादव पार्टी की राजनीति में निर्णायक माने जाते थे। और मुलायम समेत इन सबको समाजवादी माना जाता था। लेकिन अमर धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी की मुख्य धारा बन गये और बेनी प्रसाद हाशिये से होते-होते बाहर, जनेश्वर पार्टी मे सजावट की....
टीवी के बारे में किसी ने कहा है कि जब बच्चों के गली में निकलने पर पाबंदी होती है तब वो उसे दुनिया भर की सैर कराता है। और मैकलुहान भी कहता है कि मीडिया हमारे शरीर का ही विस्तार है। यानी टीवी हमारी मासूमियत को विस्तार भी देता है साथ ही उसकी मासूमियत में करप्ट भी करता है। फर्क इतना है कि इस्तेमाल सही हो रहा है या फिर गलत। अगर सही तो वो हमें कूपमंडूक बने रहने से बाहर निकालता है, हमारे ज्ञान और विवेक की सीमा को नया आयाम देता है और अगर गलत तो आंध्र प्रदेश के कुछ टीवी चैनेल्स जैसा हाल होता है। जब पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर की मौत को एक साजिश बता कर इस तरह से पेश किया जाता है कि लोग उत्तेजित हो सड़क पर उतर आये और तोड़फोड़ करने लगे। इस खबर का कोई आधार नहीं था। बस एक वेबसाइट पर खबर....
आमिर को देखा था, मिला कभी नहीं था। सोचता था, ये छुटकू कमाल होगा। सो 'तारे जमीन पर' की रिलीज पर जब इंटरव्यू करने मुंबई पहुंचा तो थोड़ा हैरत में आ गया क्योंकि बिलकुल अलग लगा। वह नरेंद्र मोदी के बारे में बात कर रहा था, जानना चाहता था कि वो जीतेगा या नहीं। दुबारा मिला तो 'थ्री इडियट्स' का मौका था। जगह बिल्कुल अलग, चेन्नई। थका मांदा लेकिन इस बार वो तेलंगाना पर बात करना चाहता था। सोचा ये क्या आदमी है? दोनों बार उसने चौंकाया। इन दो फिल्मों के बीच वो 'गजनी' कर चुका था जो भारी सुपरहिट थी और आमिर का स्टारडम पहले से बढ़ गया था। सोचा कहां 'गजनी' और कहां 'थ्री इडियट्स' का रांचो! एक में 'एट-पैक्स-एब' और दूसरे में चौवालिस की बाली उमर में 22 साल का मैच्योर लेकिन फनी किरदार। मैं सोचता रह गया। हर बार अपनी सीमाओं को तोड़ता और....









