फरवरी, 2010
ट्विटर आजकल फैशन में है। मैंने भी सोचा कुछ ट्विटरबाजी हो जाये। सो हुसैन पर लिख बैठा कि 'उन्होंने कट्टरपंथियों से लड़ाई नहीं लड़ी जैसे शाहरुख ने लड़ी और इसकी कीमत वो चुका रहे हैं।' तड़ाक से किसी भाई का जवाब आया। 'अगर हुसैन आपकी मां की वैसी ही तस्वीरें बनाये तो आप क्या करेंगे।' मैंने इग्नोर कर दिया। आगे लिखा 'हुसैन हार गये लेकिन आरएसएस आइडिया आफ इंडिया को खत्म करना चाहता है और हुसैन उसके शिकार हैं।' वो सज्जन राशन पानी लेकर मुझपर पिल पड़े। खैर, मुझे आदत थी सो छोटा सा जवाब देकर दूसरे काम मे लग गया। लेकिन मेरी राय और पक्की हो गयी कि हुसैन ने गलत किया। उन्होंने सेकुलरिज्म की लड़ाई को कमजोर किया है। उन्हें लड़ना चाहिये था और अब कतर की नागरिकता लेकर उन्होंने भयानक भूल की है। हुसैन ने ये पेंटिंग 1970 के आस-पास बनायी थी। तकरीबन 25 सालों....
चुनाव के ठीक पहले मैंने लिखा था कि देश की फिजा बदल रही है और समाज भी, ऐसे में चुनावों को पुराने अंदाज और तरीके से समझने की कोशिश बड़ी भूल होगी। उस वक्त कुछ लोगों ने ये भी कहा था कि देश में जाति और धर्म की राजनीति बरसों से होती आई है और यही आगे भी जारी रहेगा। मैंने तब भी कहा था शायद हम इन चीजों को जरूरत से ज्यादा अहमियत दे रहे हैं। नया समाज, नई पीढ़ी, नई राजनीति लिखेगी। ये मेरा मानना था कि पुराने दकियानूसी तरीके से की गई राजनीति के दिन लदने लगे हैं। चुनावों के नतीजों ने मेरी इस धारणा को पुख्ता किया। ये आहट थी करवट लेते देश की। और लगता है कि अब ये बात बीजेपी को समझ मे आ रही है। बीजेपी इंदौर में अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बदली-बदली सी नजर आई। उसने नए संदेश देने....
माई नेम इज खान। एक फिल्म। विचाराधाराओं के जलजले मे फंसे मुसलमानों की कहानी। आतंकवाद के झंझावात में फंसे एक समुदाय और धर्म की कहानी। एक मुसलमान को जमीन की चंद रेखाओं में बांधकर उसके वजूद को सूली पर चढ़ाने की कहानी। धर्मों के बीच इंसानी रिश्तों के तानेबाने को उकेरने की कहानी। रिश्तों के भंवर मे अपनी तस्वीर को देखने की कहानी। हिंदू-मुसलमान को विभाजन के तराजू से तौलने की कहानी। हमारी और आपकी संवदेनाओं में खुद के इतिहास को ढूंढ़ने की कहानी। फिल्म में कहानियां तो ढेरों हैं। लेकिन थियेटर के बाहर एक नयी कहानी बन गयी। कहानी बन गयी आजादी के चौंसठ साल बाद एक मुसलमान को 'देशद्रोही' बनाने की कहानी, वोटबैंक की आंच में एक मुसलमान की नियत को मापने की कहानी, एक हारे निराश बुढ़ापे के अपने उजड़ते घर को बचाने की बेबस कहानी, एक मुसलमान के खुले आम गुंडातंत्र के खिलाफ होने की कहानी....
एक बड़ी बात हुई है। शिवसेना ने पहले 'सामना' में लिखा कि वो शाहरुख का विऱोध नहीं करेंगे लेकिन थोड़ी सुबह चढ़ते ही खबर आई कि शिवसेना ने पलटी मार दी। ऐलान हुआ कि वो शाहरुख को माफ नहीं करेगी। यानी वो विरोध करेगी। हैरानी इस बात पर की कि इतना हल्ला काटने के बाद शिवसेना ने विरोध का रास्ता पहले क्यों छोड़ा? और एक बार तय करने के बाद चंद घंटे में ही अपने इस स्टैंड से क्यों पलट गई? ऐसा शिवसेना जैसी कट्टरवादी पार्टियों में होता नहीं है। ऐसी पार्टियों में लोकतंत्र नहीं है। पार्टी सुप्रीमो जो कहे वही आखिरी बात। तो क्या हो गया? सुनने में ये आ रहा है कि पार्टी में दो राय हैं। एक जिसका मानना है कि हर मुद्दे पर इतना रैडिकल और हिंसक होने की जरूरत नहीं। शिवसेना को बदलते समय के मुताबिक बदलना चाहिये। लेकिन दूसरा वही पुराना तबका है जो....









