मार्च, 2009
अभी सोच ही रहा था कि खबर आ गयी कि वरुण गांधी पीलीभीत से ही लड़ेंगे। खुद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने ऐलान कर दिया। कुछ समझा और कुछ नहीं समझा। समझ और नासमझ के बीच धड़ाम होते-होते ये भी सोचा कि क्या ये कहना जरूरी था। बिना कहे भी तो कई बातें हो जाती हैं। समझ में नहीं आया कि क्यों एक पार्टी जो छह साल तक सरकार में रही है और जिसकी आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में सरकार हो वो भला कैसे किसी संवैधानिक संस्था की खुलेआम अवहेलना कर सकती है। यकीन मानिये बीजेपी की दिक्कत ही यही है। और यही उसके विकास में सबसे बड़ी बाधा भी। वो विचारधारा से बंधी है। उस विचारधारा से जो हिंदुत्व की बात करती है। हिंदुत्व में कोई बुराई नहीं है। लेकिन अगर हिंदुत्व की बुनियाद में मुस्लिम विरोध हो तो दिक्कत है। इसलिये मुझे हैरानी हुई जब ये....
आखिरकार वो घड़ी आ ही गयी जिसका सबको इंतजार था। मैं मोहब्बत में परेशान किसी आशिक की बात नहीं कर रहा हूं। न ही किसी देवदूत के आगमन की। बात है लोकतंत्र के उस पर्व की जो तय करता है कि आखिर किसकी होगी सरकार और किसको मिलेगी मात। कौन बनेगा प्रधानमंत्री या फिर कौन होगा सिफर। जी हां, सोमवार को लोकसभा के चुनावों की तारीखों का ऐलान हो गया। और साथ ही बज गयी रणभेरी। यानी चुनावी शंखनाद। तमाम सेनाएं अपने अपने शस्त्रों के साथ हुंकार मारने को और मरने-मारने को कमर कस चुकी हैं। लेकिन क्या वाकई ये तैयार हैं। देखें तो शायद ऊपर से लगे लेकिन अंदर से सबकी हालत खराब है। कोई ये दावा नहीं कर सकता कि सरकार उसी की बनेगी। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी क्या तीसरा मोर्चा। सब कुछ गड्डमड। कांग्रेस को उम्मीद तो है पर भरोसा नहीं। शायद इसीलिये क्योंकि पिछली....









