मार्च, 2010
लोग मुझे नरेंद्र मोदी का कटु आलोचक कहते हैं। लेकिन पिछले दिनों जब अमिताभ को कांग्रेस ने लपेट लिया तो अच्छा नहीं लगा। सवाल सिर्फ इतना सा है क्या इसी आधार पर कांग्रेस अमिताभ का बहिष्कार कर दे कि वो मोदी के साथ दिखे और गुजरात के ब्रांड एंबेस्डर बने? उनके साथ कांग्रेसी रिश्ता नहीं रखें? ये बात पचती नहीं क्योंकि बच्चन और नेहरू-गांधी परिवार 50 के जमाने से करीब रहे हैं। नेहरू जी हरिवंश राय और तेजी बच्चन की काफी इज्जत करते थे। इंदिरा गांधी के जमाने में तो ये भी कहा जाने लगा था कि अमिताभ का कैरियर ही सरकर की वजह से आसमान पर पहुंचा। लोग ये आरोप लगाते हैं कि इमरजेंसी के समय अमिताभ की फिल्मों पर खास मेहरबानी की गई। '84 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव के कहने पर अमिताभ ने हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ इलाहाबाद से चुनाव लड़ा। अमिताभ का....
ज्यों मायावती के गले में पड़ी माला देखता गया त्यों-त्यों कांशीराम की याद ताजा होती गई। और कांशीराम के साथ बीते दिन भी याद आए और वो बातें जो उनके साथ न जाने कितनी बार मैंने की थीं। मैं अक्सर उनसे पूछता था कि उन्हें कैसी सरकार पसंद है वो हर बार यही कहते कि उन्हें मजबूर सरकार अच्छी लगती है। मैं फिर पूछता क्यों? उनका जवाब होता जितनी मजबूर होगी वो उतना ही उनके एजेंडे पर काम करेगी। और उनका एजेंडा क्या था ये बताने की जरूरत नही हैं। कांशीराम एक बात और खूब कहते थे। जहां सब स्थिर सरकार की बातें करते वो छूटते ही कहते उन्हें स्थिर नहीं अस्थिर सरकार चाहिए। उनकी सोच थी कि जितनी ज्यादा अस्थिरता होगी उतने ज्यादा चुनाव होंगे और उतना ही ज्यादा दलितों को मोबिलाइज करने का मौका मिलेगा। तब कांशीराम की ये बातें लोगों को अटपटी लगती थीं। ज्यादातर लोगों को....
महिला आरक्षण बिल में बड़ी आग है। संसद हो या फिर सड़क चर्चा हर जगह गरम है। विरोधियों को ये पच ही नहीं रहा है कि महिलाएं किचन से निकल कर कैबिनेट तक पर हावी हो जाएं और मर्द बेचारे हवा फांकते रह जाएं। उधर समर्थकों को नई क्रांति दिख रही है। इस बहस में सोनिया गांधी बल्ले-बल्ले हैं। उनके लिये तो पार्टी का नया वोटबैंक तैयार हो रहा है। महिलाओं को वोटबैंक के तौर पर कभी हिंदुस्तान में देखा ही नहीं गया। जातियों पर डोरे डाले गये। धार्मिक गुटों को अपना बनाने के लिये रोटीयां बेली गईं लेकिन औरत वो तो अबला है, बेचारी कहां जायेगी। सोनिया को लगा कि इस तबके को भुनाया जा सकता है तो राष्ट्रपति चुनने के लिये तमाम हैवीवेट राजनेताओं के बीच उन्हें प्रतिभा पाटिल नजर आईं और लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर मीरा कुमार। और जब महिला बिल पर कांग्रेस के....
भारतीय नारी क्या है- सीता, सावित्री या द्रौपदी। राधा या मीरा। वह शिव की पार्वती है या फिर विष्णु की लक्ष्मी। कई चेहरे लेकिन कहानी लगभग वही। सीता जो पति की खातिर चौदह साल तक बनवास भोगती है। सावित्री जो पति सत्यवान के जीवन के लिये यमराज से लड़ जाती है। द्रौपदी जो पांच महाबली पतियों के बावजूद दुशाषन के चीरहरण की शिकार होती है। राधा और मीरा कृष्ण के प्यार में दीवानी। पार्वती और लक्ष्मी देवियां हैं लेकिन उनकी पहचान शिव और विष्णु से है। यानी देवी हो या फिर आम स्त्री पति ही परमेश्वर है और पुरुष के बिना कुछ भी नहीं। वो गरीब है तो अबला और अमीर है तो इज्जत। इनके बीच वो क्या है? सीता को पति चुनने का अधिकार दिया गया और द्रौपदी को भी जीतने के लिये अर्जुन को मछली की आंख मे तीर भेदना पड़ा। सावित्री भी अपने पिता की....









