अपैल, 2009
गाली-गलौच के बीच आम धारणा यही बनती है कि ये राजनीति अपने लायक नहीं है। यहां सभ्य पढ़े लिखे लोगों के लिए जगह नहीं है। राजनीति करने के लिए किसी जाति विशेष या फिर किसी धर्म विशेष का होना जरूरी है। या फिर अपराध की दुनिया में पीएचडी तो हो ही। और अगर कुछ भी न किया हो तो इतना पैसा बैंक में हो कि वो आसानी से किसी भी पार्टी का टिकट खरीद सके। अगर दंगा कराना आता है तो किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब भी देख सकते है और शायद कुछ धन कुबेर आपको प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी पेश कर सकते हैं। लेकिन यकीन जानिए देश के लोकतंत्र की ये तस्वीर बदल रही है। हाल के दिनों में कुछ बुनियादी बदलाव की आहट आने लगी है। बहुत दूर नहीं बिहार ही चले जाइए। नीतीश बमबम हैं जबकि लालू खिसियाए....
तीसरे मोर्चे के योद्दा इस बार काफी उत्साह में नजर आ रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि बिल्ली के भाग से छींका इस बार फूट सकता है। लेकिन इनके निशाने पर न सेकुलरवाद है और न ही सांप्रदायिकता, न आर्थिक सुधार और न बेरोजगारी, अमेरिका से रिश्ते पर भी चर्चा नहीं हो रही और न ही पाकिस्तान से संबंध पर चर्चा। मोर्चे का प्रधानमंत्री कौन होगा ये भी तय नहीं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि मोर्चे को जोड़ने वाली गोंद क्या है? दरअसल तीसरा मोर्चा मौकापरस्त नेताओं की एक जमात है, जो जोड़तोड़ करके केंद्र की सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं। एक जमाना था जब तीसरा मोर्चा गैर-कांग्रेसवाद के वैचारिक आवरण के तले अपनी जमीन तलाशता था। लोहिया ने इस गैर-कांग्रेसवाद की नींव डाली थी, जिसका मूल उद्देश्य था केद्र की राजनीति में कांग्रेस के एकक्षत्र राज को खत्म करना। तब ये एहसास तमाम पार्टियों को....
बात काफी पुरानी है। पत्रकारिता में नया-नया रंगरूट आया था। एक हिंदी दैनिक के ब्यूरो चीफ अक्सर हमारे दफ्तर आया करते थे। एक दिन बातचीत में मेज ठोंकते हुए काफी जोर देकर बोले- डिवीजन आफ कांग्रेस इज ऑन कार्ड। मैं नया-नया था। उनकी बात सुनकर भौंचक्का भी था और असहमत भी लेकिन इतनी हिम्मत नहीं थी कि उनसे तर्क करता, सो सुन लिया। ये नरसिंह राव का जमाना था। सोनिया गांधी राजनीति में नहीं आई थीं और संघ परिवार इस सोच में पड़ा था कि सोनिया राजनीति में आएंगी या नहीं ? और अगर आएंगी तो क्या पार्टी उनको स्वीकार करेगी? पत्रकार महोदय संघ परिवार से जुड़े थे। उनका ये मानना था कि सोनिया के आते ही कांग्रेस टूट जायेगी। एक विदेशी भला कांग्रेस के बड़े नेताओं के गले कैसे उतरेगी ? तब भी मेरा मानना था कि कांग्रेसियों के पास सोनिया को स्वीकार करने के अलावा कोई चारा....
पिछले हफ्ते नीतीश कुमार का इंटरव्यू कर रहा था। मैंने पूछा -ये क्या मजबूरी है कि कल्याण सिंह के साथ मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार के साथ आडवाणी नजर आते हैं? नीतीश न चाहते हुए भी बोल गये। क्या करें पुराने समाजवादियों की गलतियों का खामियाजा भोग रहे हैं। नीतीश कुमार ने एक वाक्य में देश में समाजवाद की ट्रेजडी बयां कर दी। इधर नीतीश ये कह रहे थे, उधर समाजवादियों के पुरोधा जार्ज फर्नांडीस नीतीश के ही खिलाफ आग उगल रहे थे। उन्हें षड्यंत्रकारी और तानाशाह कह रहे थे तथा दिग्विजय सिंह भी उनकी हां में हां मिला रहे थे। 50 और 60 के दशक में समाजवादी पार्टी देश की सबसे बड़ी पार्टी हुआ करती थी। यही मौका 80 के दशक में भी आया और 90 के शुरुआती दिनों में भी। लेकिन आपसी इगो, संगठन न बनाने की उच्छंखलन तबियत और बुनियादी तौर पर किसी भी....









