मई, 2009
एक पुरानी कहावत है जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था। बीजेपी संकट के दौर से गुजर रही है और पार्टी में चाणक्य कहलवाने के शौकीन और अंग्रेजी चैनलों में दिखने के आदी अरुण जेटली साउथ अफ्रीका में आईपीएल देखने जा रहे हैं। जब इस चाणक्य को फिर चोटी बांध कर पाटलिपुत्र पर नये सिरे से कब्जे की योजना बनानी चाहिये तब वो धोनी की बैटिंग का लुत्फ उठाने की सोच रहा है। वहीं अब तक चंद्रगुप्त बनने का सपना देख रहे लालकृष्ण आडवाणी कड़े फैसले नहीं कर पा रहे हैं। आडवाणी ने विपक्ष के नेता पद से इस्तीफे की बात कही तो लगा पार्टी ने हार से सबक लिया है और नयी शुरुआत करना चाहती है ताकि 2014 की जंग जीती जा सके लेकिन दो दिन के अंदर ही मजबूत नेता अपने फैसले पर मजबूत नहीं रह पाया। संकट को ये कह कर टाल....
बड़े चुनाव देखे और किए लेकिन ऐसा चुनाव नहीं देखा। किसी को कुछ पता नहीं, कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं। कोई आज कांग्रेस की सरकार बना रहा है तो थोड़ी देर में ही वो "कनफ्यूज्ड" बीजेपी की सरकार बनाने का दावा कर रहा है। बड़े-बड़े सेफोलाजिस्ट और राजनीतिक पंडितों की बोलती बंद है या फिर गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं। कहीं आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने की अधूरी कोशिश तो कहीं मनमोहन को फिर प्रधानमंत्री देखने की अधूरी चाहत। तो किसी की दमित वासना ने पल भर के लिये लेफ्ट से या फिर तीसरे मोर्च की तरफ से मायावती या शरद पवार को प्रधानमंत्री निवास के नए पक्षी के रूप में देख डाला। न राजनीति का साफ चेहरा, न नेताओं के लपलपाते बोल, न सत्ता के दलालों का दंभ, न पूंजीपतियों की गरगराती आवाज। सब तरफ "बैखौफ अनिश्चतता", "आधे-अधूरे ख्वाब", कारे बदरा न जाने कब और कहां....
राजनीति की जमीन पर अभी धूल बहुत है। पार का आसमान दिखाई नहीं दे रहा है। चारों तरफ अनिश्चितता है। सिर्फ कयासों के पर फड़फड़ा रहे हैं। चुनावों की रेलमपेल खत्म होने को है। पर कांग्रेस हो या फिर बीजेपी कोई नहीं कह सकता सरकार उसकी बनेगी। बीजेपी को लगता है कि उसकी शुरुआत खराब रही पर जैसे-जैसे चुनाव का सूरज चढ़ता गया उसकी स्थिति अच्छी होती गयी। कांग्रेस जिसको लग रहा था कि इस बार वो कामयाबी के रथ पर सवार है वो पांच चरण आते-आते थोड़ी नर्वस नजर आने लगी। थर्ड फ्रंट जो बैशाखियों के सहारे महल बनाने का ख्वाब देख रहा था अब लड़खड़ाता दिख रहा है। टीआरएस ने पहली सेंध लगा दी है। क्या टीडीपी भी उस राह पर आगे बढ़ेगी, कहना मुश्किल है। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर इस मंथन में हो क्या रहा है? क्या अनिश्चितता के समुद्र में कुछ....
राहुल गांधी अब महाराज बनने को पूरी तरह से तैयार हैं। दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस इस बात की चुगली करती है। सोनिया ने इस चुनाव में अपने आप को पूरी तरह से फ्रंट फुट पर नहीं रखा और पीछे से रह कर ही चुनाव पर नजर रखे हुए हैं। यूपी और बिहार में कांग्रेस का अकेले जाना और मुलायम और लालू के साथ किसी भी तरह का गठबंधन न करना इस बात के पहले सबूत तो नहीं लेकिन इस बात की पुख्ता गवाही जरूर देते हैं। सवाल सिर्फ इतना भर है कि राहुल कब पूरी तरह से अंतिम फैसले की कमान अपने हाथ में लेते हैं। राहुल का केंद्र में आना कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी की मौजूदगी का अहसास है। ये अलग बहस का विषय है कि एक परिवार का इस तरह किसी पार्टी और देश की राजनीति में छाए रहना कितना लोकतांत्रिक है या....
करीब छह महीने पहले की बात है। देवबंद स्कूल और जमीत-ए-उलेमा-ए-हिंद के नेता और सांसद महमूद मदनी से बात हो रही थी। बातों-बातों में बात निकली तो बात मुस्लिम वोटरों तक जा पहुंची। वो बोले मुस्लिम मानस बदल रहा है। और आने वाले चुनाव में इसकी तस्वीर भी दिखाई देगी। उनका कहना था कि एक समझ इस तबके में आई है। उनकी तरह ही कई दूसरे मित्रों की भी यही राय है मुस्लिम वोटर अब वोट बैंक बनने और ब्लैकमेल होने को तैयार नहीं है। चुनाव आते ही अब तक ये सोच लिया जाता था कि अगर उसे डरा दिया जाए और हिंदूवादी पार्टियों का भूत खड़ा कर दिया जाए तो एकमुश्त वोट वो उसके खिलाफ खड़े सबसे तगड़े उम्मीदवार को दे देगा। लेकिन इस बार अखिल भारतीय स्तर पर ऐसा हो ये कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी। इस बदलाव के कई कारण हैं। एक, पिछले दिनों देश....









