जुलाई, 2008
चलिये आप से एक सवाल करते हैं। विश्वास मत से किसको फायदा हुआ? कौन जीता? कौन हारा? आप सोच रहे होंगे क्या बकवास कर रहा हूं? यकीन मानिये मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है। ये एक ऐसा सवाल है जो हम सब लोगों को पूछना चाहिये और इसका जवाब भी खोजना चाहिये, इसलिये नहीं कि ये सवाल अभी महत्वपूर्ण है और कुछ समय के बाद इसका मतलब नही होगा। चलिये इस सवाल का जवाब सीधे प्रधानमंत्री से ही शुरू करते हैं। मनमोहन सिंह। देश के प्रधानमंत्री। देश को दिशा देने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। उन्हें ही पूरे देश को साथ लेकर चलना है और भविष्य की भी दिशा उन्हें ही निर्धारित करनी है। इस घटना से पहले तक बीजेपी नानाप्रकार के शब्दों से उनकी ताजपोशी कर रही थी, उनकी शान में कसीदे गढ़ रही थी। सबसे मशहूर थे उनके जादुई शब्द कि "ये प्रधानमंत्री आजादी के बाद....
बात बजट के दिन की है। मंनी कंट्रोल डॉट कॉम ने बजट की राजनीति पर एक लेख लिखने को कहा था। इस लेख को लिखते-लिखते दिमाग मे आया कि लेफ्ट इतनी हाय-तौबा क्यों मचा रहा है? थोड़ा सोचने लगा। मन ने कहा पिछली कई गठबंधन सरकारो में मनमोहन की सरकार सबसे ज्यादा स्थिर सरकार है। पिछले चार सालों में शायद ही कभी ये लगा हो कि सरकार गिरने वाली है। जबकि इसके पहले वाजपेयी सरकार और संयुक्त मोर्चा सरकारें गठबंधन राजनीति का शिकार हो चुकी हैं। देवेगौड़ा को तो बाकायदा हटाकर आई. के. गुजराल को प्रधानमंत्री भी बनाया गया था। देवेगौड़ा की सरकार बमुश्किलन एक साल चल पायी थी। वाजपेयी की दूसरी सरकार को इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि जयललिता और सुब्रमण्यम स्वामी ने चाय की प्याली मे तूफान ला दिया था और उनकी सरकार बस एक वोट से अपने को नही बचा पायी। इस....









