अक्टूबर, 2008
जिंदगी के चौराहे कभी-कभी एक नये चौराहे पर ला खड़ा करते हैं जहां से आगे का रास्ता दिखता तो है लेकिन जाना कहां है ये पता नहीं होता। और शायद जिंदगी की खूबसूरती भी इसी में है कि ये हमेशा या तो सूली पर टंगी रहती है या फिर चौराहे पर अटकी रहती है। पिछले दिनों जब मुझे ये लगने लगा था कि जिंदगी अब चौराहे और सूली की सीमा से बाहर निकलने लगी है और सामने सीधा पाक रास्ता नजर आ रहा है तभी एक नये अनुभव ने मुलाकात की। इस अनुभव का नाम और एहसास के बारे में पूछेंगे तो शायद थोड़ी झिझक हो, मामूली संकोच भी। पर अब चूंकि बात खुल ही रही है तो बताने से क्या परहेज। इस अनुभव का नाम है सचिन तेंडुलकर और एहसास का जरिया बना ब्लॉग की तिलस्मी और बेबाक दुनिया। एक वर्चुअल वर्ल्ड। जहां जितना उजाला है उतना....
किसी ने मुझसे पूछा था कि क्या सचिन भारत के महानतम बल्लेबाज हैं ? मैंने कहा -"नहीं," सज्जन ने पूछा "क्यों ?" मैंने कहा- "इसके हजारों कारण हो सकते हैं ।" मैं जानता हूं कि मौजूदा माहौल में ये कहना सही नहीं होगा और लिखना तो और भी खतरनाक, लेकिन जो मुझे जानते हैं , और मुझसे बातचीत करते रहे हैं, वो जानते हैं कि मैं ये लंबे समय से यही बात कहता रहा हूं। और इस वजह से अकसर मुझे लोग अजीब नजरों से देखते रहे हैं , कुझ नाराज हो जाते हैं तो कुछ मुझे बेवकूफ समझते हैं। लोग अकसर तर्क देने लगते हैं। कुछ फौरन कहते हैं जब सर डॉन ब्रेडमैन कह चुके हैं कि सचिन मेरी तरह खेलते हैं तो बकवास करने वाले तुम कौन हो। यहां तक महानतम गेंदबाज शेन वॉर्न ने भी उन्हें अपनी लिस्ट में सबसे ऊपर रखा है। लोग....









