अक्टूबर, 2009
विजयाराजे सिंधिया बीजेपी की बड़ी नेता थीं और जब तक रहीं तब तक उनका पूरा सम्मान पार्टी ने रखा लेकिन यही वसुंधरा राजे सिंधिया के बारे में नहीं कहा जा सकता। लोकसभा चुनावों के बाद से जो पार्टी उनके पीछे पड़ी तो इस्तीफा लेकर ही मानी। ये अलग बात है कि इस दौरान वसुंधरा ने भी पार्टी को तिगनी का नाच नचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहने को आप कह सकते हैं कि आखिर आलाकमान जीता और वसुंधरा को सरेंडर करना पड़ा। ये भी कहा जा सकता है कि वसुंधरा खुद को पार्टी से बड़ा समझने लगी थीं इसलिये उन्हें औकात बताना जरूरी था। और ये भी कि पार्टी में जिम्मेदारी तय करने की नयी परंपरा के बीज पड़ने लगे हैं। चूंकि वो लोकसभा और विधानसभा का चुनाव नहीं जितवा पायीं तो उन्हें हटना पड़ा। लेकिन इस माथापच्ची और सांप-सीढ़ी के खेल के बीच ये प्रकरण बीजेपी के एक....
अपने एक दोस्त और संपादकीय सहयोगी से बात हो रही थी। वो राहुल गांधी से थोड़े नाराज नजर आ रहे थे। कारण, राहुल का ये कहना कि हमें पाकिस्तान पर पांच मिनट से ज्यादा वक्त नहीं बर्बाद करना चाहिए। मित्र का तर्क था कि एक व्यक्ति जो प्रधानमंत्री होने वाला है उसे इस तरह की छोटी बात नहीं करनी चाहिए। ये विदेश नीति का मामला है और सोच समझ कर बोलना चाहिए। उनकी बात सही हो सकती है लेकिन मैं उनकी बात से सहमत नहीं था । मुझे लगा कि शायद बात पांच मिनट की नही उसके आगे की है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भारतवासी पाकिस्तान को लेकर इतने 'आबसेस्ड' है कि उसकी हर बात को जरूरत से ज्यादा अहमियत देते हैं? वहां से छोटा सा बयान आया नहीं कि हम रियेक्ट करने को उतावले हो जाते हैं। सवाल इस बात का भी नहीं कि पांच मिनट....









