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आशुतोष
Tuesday , September 30, 2008 at 18 : 13

जामिया एनकाउंटर और मुस्लिम पहचान


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मैंने अनवर से पूछा - तुम क्या कर रहे हो?

उसने पलटकर पूछा - इसका क्या मतलब ?

मैंने कहा - अबे जामिया में ये रैली करने की क्या जरूरत है? तुम क्यों नहीं समझते? इससे गलत संदेश जाएगा। भगवान के लिए ऐसा मत करो।

ये सुनते ही अनवर आपा खो बैठा और बोला- तुम्हारा क्या मतलब है? कानूनी सहायता देना मूलभूत अधिकार है। मैं उस पर भला कैसे आपत्ति कर सकता हूं। मैंने कहा- देखो, कोई भी भला आदमी इस बात पर उंगली नहीं उठाएगा पर यह वह समय नहीं है। ऐसे में जब कोई ये नहीं जानता कि कहां बम फटेगा और हम घर लौटेंगे भी या नहीं तब आप कैसे किसी से समझदारी की उम्मीद कर सकते हैं।

काफी देर गर्मागर्मी होती रही। एक बार तो ऐसा लगा कि दोस्ती खतरे में है। अनवर और मैं 1988-90 में जेएनयू में साथ-साथ थे। तब से हम परिवार की तरह हैं। हमारे बीच कई बार काफी नोंकझोंक होती रही, और ढेरों मुद्दों पर हमारे विचार काफी अलग-अलग भी रहे लेकिन कभी भी हमारी दोस्ती पर आंच नहीं आयी।

बहसाबहसी में मैंने महसूस किया कि हमारे गुस्से के कारण कुछ और है शायद हम एक दूसरे से जो कहना चाहते हैं वो कह नहीं पा रहे हैं। मैं शायद ये कहना चाहता था कि मुसलमानों के साथ कुछ गड़बड़ है। तुम लोग हमेशा बम फोड़ते हो और वह शायद यह कहना चाहता था कि सरकारी अमले और मीडिया में हिंदुओं का बोलबाला है, जो हमेशा ये सोचते हैं कि मुसलमान आतंकवादी होते हैं और उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए इसलिए निर्दोष मुस्लिम आतंकवाद के नाम पर निशाना बनते हैं।

यह वास्तव में अजीब था क्योंकि कट्टरवाद और फिरकापरस्ती से लड़ने का हम दोनों का लंबा इतिहास रहा है। हम दोनों ऐसी ताकतों के खिलाफ जोरदार ढंग से आवाज उठाते रहे हैं। तो फिर ये गरमागर्मी क्यों? मुझे अगली सुबह इस बात का जवाब मिल गया जब मैंने वरिष्ठ पत्रकार और लेजेंडरी संपादक एम जे अकबर का लेख पढ़ा। अकबर ने बड़े दबे छुपे शब्दों में उस बात को लिख मारा जो अनवर नहीं कह पाया। मैं ये साफ कर दूं कि एम जे के प्रति हमेशा से मेरे मन में सम्मान रहा है, जो आज भी है। वे आधुनिक और बेहतर समझ वाले चुनिंदा संपादकों में से एक हैं। लेकिन टाइम्स आफ इंडिया में में रविवार को जो उन्होंने लिखा उसमें और शाह इमाम बुखारी के मुखर बयानों में काफी कुछ समानता मुझे दिखी।

मैं काफी निराश , उदास और परेशान था। मैं जवाब तलाश रहा था। क्या मेरी सोच में कहीं कुछ गड़बड़ है? क्या मैं बदल गया हूं? क्या मैं वही आदमी हूं जो अबतक हिंदू सांप्रदायिकता और उसकी मुस्लिम विरोधी विचारधारा का विरोध करता आया है? आखिर, क्यों मैं अनवर और एम जे की विश्वसनीयता पर शक कर रहा हूं।

सोचते वक्त मुझे जाने-माने पटकथा लेखक जावेद अख्तर का खयाल आया, जिन्होंने एक टीवी डिबेट के दौरान मेरे एक मंझे हुए एंकर संदीप चौधरी को यह कहकर झिड़क दिया था कि उनका सवाल सांप्रदायिक का है। मुझे ठीक से उनका वह सवाल याद नहीं लेकिन इतना याद है कि वह सवाल मुसलमानों और उनकी पहचान को लेकर था। तब मैंने गुस्से में एक हिंदी मैगजीन में एक तीखा लेख लिखा था और सवाल उठाया था कि क्यों आरिफ मोहम्मद खान को सैयद शहाबुद्दीन से 80 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में मात खानी पड़ी? आखिर क्यों ऐसा हुआ कि वी पी सिंह ने आरिफ मोहम्मद खान को इलाहाबाद जाने से रोक दिया जहां से वे 1988 में लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे लेकिन शहाबुद्दीन का स्वागत किया गया।

अचंभे की बात है कि मुझे इस मुद्दे पर जावेद अख्तर के कभी दोस्त रहे सलीम खान से जोरदार समर्थन मिला। उन्होंने दैनिक भास्कर में मेरे लिखे का हवाला देते हुए एक लेख लिखा था और मेरे कुछ तर्कों से सहमति जताई थी ।

मुझे यहां ये मानने में कोई संकोच नहीं है कि पिछले काफी समय से मेरे जेहन में ये सवाल रह रह कर गूंज रहा है कि अब मुस्लिम समुदाय के आत्ममंथन का वक्त आ गया है। समुदाय को खुद से ये सवाल पूछना होगा कि क्या अंदर कहीं कुछ गलत हो रहा है?

आखिर क्यों नैरोबी से दार-ए-सलाम, इंडोनेशिया से सूडान, मैड्रिड से मैनहटन, काबुल से कश्मीर, चेचेन्या से चीन तक उनकी पहचान एक ऐसे शख्स की बन रही है जो बम फोड़ता है , धमाका करता?

मुझे मालूम है कि ऐसा कह कर मैं क्या जोखिम मोल ले रहा हूं। मुझे मालूम है कि कुछ लोग यकायक कह उठेंगे कि देखा आशुतोष का चेहरा बेनकाब हो गया, धर्मनिरपेक्षता की आड़ में वो अबतक सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहा था। यही है उसका असली चेहरा। अब उसकी हकीकत सामने आई है। लेकिन मुझे आज इसकी परवाह नहीं।

आज सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर क्यों 20वीं सदी के बेहरतीन दिमागों में से एक सलमान रुश्दी खुली हवा में सांस नहीं ले सकते और क्यों तसलीमा नसरीन देश की सबसे धर्मनिरपेक्ष मानी जाने वाली लेफ्ट सरकार के साए में शांति से नहीं रह सकतीं? आखिर क्यों लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह सिमी पर से बैन हटाने को सही ठहराने की कोशिश करते हैं? ऐसा क्यों होता है कि देवबंद के मौलाना मदनी रामलीला मैदान में आतंकवादी विरोधी रैली का आयोजन करते हैं और आतंकवाद का विरोध करते हैं तो उर्दू प्रेस उनकी आलोचना पर उतर आती है?

कोई ये सवाल भी उठा सकता है कि कट्टरपंथ और फिरकापरस्ती तो हर धर्म में है तो ये हंगामा क्यों? मैं मानता हूं लेकिन थोड़ा फर्क है। हिंदू समाज में अगर भड़काने वाली कट्टरपंथी आवाज है तो वहीं इसके बराबर या कहें इससे भी अधिक मजूबत उदारपंथी आवाज भी है। ईसाईयत में ये जंग धार्मिक कट्टरपंथ काफी पहले हार चुका है। ईसाईयत में ये तय हो चुका है कि धर्म निजी आस्था का मामला है और राजनीति में मजहब के लिये कोई जगह नहीं है। हिंदुत्व और ईसाईयत में अबुल अल मौदूदी जैसे लोग नहीं दिखाई पड़ते जो धर्म और राजनीति का घालमेल करना चाहते हैं। मौदूदी दावा करते हैं कि इस्लाम एक क्रांतिकारी विचारधारा है और एक सिस्टम भी जो सरकारों को पलट देता है।

मेरी नजर में मुस्लिम समुदाय में रैडिकल इस्लाम या राजनीतिक इस्लाम है जो खुद अपने ही लोगों और दुनिया के लिए मुसीबत पैदा कर रहा है। लेकिन हैरानी वाली बात ये है कि इस तथाकथित रैडिकल इस्लाम के खिलाफ कोई पुरजोर आवाज बुलंद नहीं करता न ही भारत में और न ही दूसरी जगहों पर। उदारपंथियों का एक बड़ा तबका अकसर चुप रहता है या फिर वह इसका इतनी ताकत से विरोध नहीं करता कि पूरा समुदाय इसको सुने।

फरीद जकरिया ने अपनी किताब 'पोस्ट अमेरिकन वर्ल्ड' में लिखा है कि मुस्लिम जगत भी बदल रहा है लेकिन बाकी की तुलना में काफी धीमे। इसमें भी कई ऐसे लोग हैं जो इस बदलाव के विरोध में खडे़ हो खुद को इस तबके का नेता मानने का अहसास पाले बैठे हैं। दूसरी संस्कृतियों की तुलना में इस्लाम के अंदर प्रतिक्रियावादी ज्यादा कट्टर हैं- इनमें जड़ता व्याप्त है। हालांकि इनकी संख्या काफी कम है। काफी अल्पसंख्या में हैं।

मैं मानता हूं कि मौदूदी जैसे लोग कम संख्या में हैं। नहीं तो अनवर, साजिद और आर्फीन जैसे मेरे दोस्त नहीं होते लेकिन बदकिस्मती से वे ऐसे कुछ लोगों को बाकी लोगों पर राज करने का मौका देते हैं। मुस्लिम समुदाय के बहुसंख्यक तबके की ये चुप्पी तकलीफदेह है और अब यह चुप्पी काफी जटिल रूप अख्तियार करती जा रही है। यह इसी "कांप्लेक्स" का नतीजा है कि जामिया नगर का "पुलिस एनकाउंटर" मुस्लिम बौद्धिक वर्ग के लिये अपनी मुस्लिम पहचान बनाने का जरिया बन जाती है।

मेरा सवाल यह है कि आखिर क्यों एक एनकाउंटर को मुस्लिम समुदाय के ऊपर हमला माना जा रहा है? पुलिस एनकाउंटर कोई नया नहीं है। ये असली या फर्जी दोनों ही होते हैं। यह हर रोज होता है। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब कोई आतिफ अमीन मारा जाता है तो हंगामा हो जाता है, प्रदर्शन होते हैं। यहां कोई नंदू मारा जाता है तब जंतर-मंतर और जामिया पर रैली क्यों नहीं होती?

मुझे एम जे अकबर को ये बताने की जरूरत नहीं कि एक नकली एनकाउंटर को असली बनाने के लिए पुलिसवाले अकसर खुद को गोली मारते हैं? राजबीर, दया नायक और प्रदीप शर्मा असली गोली चला कर हीरो नहीं बने बल्कि ये अकसर उन लोगों को मारकर हीरो बने है जिनकों इन्होंने पकड़ कर रखा था। मोहनचंद शर्मा भी कोई साधू नहीं था लेकिन एमजे को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि जामिया नगर एनकाउंटर में एम सी शर्मा पुलिस की गोलियों का भी शिकार हो सकते हैं? मेरा सवाल ये है कि क्या वो एक आम मुसलमान की तरह "रिऐक्ट" कर रहे हैं या फिर देश के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर। यही सवाल मेरा अपने प्रिय मित्र अनवर से भी है।

ये मेरा अनुमान नहीं बल्कि यकीन है कि दोनों महानुभाव एक नागरिक की तरह व्यवहार नहीं कर रहे हैं और उनके शब्दों में वही कुछ झलक रहा है जो कि जमिया नगर, सराय मीर और आजमगढ़ की सड़कों पर आम मुसलमान की बातों में झलक रहा है। यहां खुले रूप से कहा जा रहा है कि "काउंटर टेररिज्म" के नाम पर मासूम मुस्लिमों को शिकार बनाया जा रहा है। पहले आम मुसलमान और पढ़े-लिखे मुसलमान में फर्क था। लेकिन अब ये तस्वीर कुछ-कुछ धुंधली होती दिख रही है। और ये बात परेशान करने वाली है।

भारतीय संदर्भ में क्या इसका ये मतलब है कि मुस्लिम समुदाय में उदारता कम होती जा रही है? मेरा जवाब है - बिग नो । फिर ऐसी प्रतिक्रिया क्यों? मैं इसे "लिटिल ब्वाय सिंड्रोम" कहता हूं। एक ऐसा बच्चा जिसे बार-बार उस शैतानी के लिए दोषी ठहराया जाता है जो उसने की ही नहीं। अवसाद के चलते वह जिद्दी और हठी हो जाता है - स्वीकारतावादी । और वो चिढ़ कर , तंग आकर , परेशान हो कर कह उठता है - "हां मैंने ही किया है। आप क्या कर लोगे?"

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने और अल कायदा और ओसामा बिन लादेन के उभरने के बाद से उदारपंथी मुसलमानों के दिक्कतें शुरू हो गयीं, उनकी पहचान को खतरा पैदा हो गया है। दुनिया के हर कोने में उन पर लगातार नजर रखी जा रही हैं। उनका नाम आते ही उन्हे "अजीब सी नजरों" से देखा जाता है मानो वो आम इंसान न होकर आतंकवादी हों। न्यूयॉर्क हो या नई दिल्ली सब जगह यही हाल है। एक उदारपंथी मुसलमान जानता है कि उसका कट्टरपंथियों की सोच से कोई लेना देना नहीं है।

उसका बम फोड़ों आंतकवादी सोच से दूर-दूर तक का कोई वास्ता नहीं है। न ही वो ये मानता है कि हिंदू-यहूदी-ईसाई या भारत-इस्राइल-अमेरिका इस्लाम को नेस्तनाबूद करने के लिये साजिश रच रहे हैं। लेकिन वो कर क्या सकता है। वो असहाय है। उसे मालूम है कि उसकी सुनने वाला कोई नहीं। वो अंदर भी टूट रहा है और बाहर भी उनपर कोई यकीन नहीं कर रहा है कि ये खतरनाक सोच उसकी जिंदगी का हिस्सा नहीं है। और यही असहायता उसके अंदर एक ऐसे कांप्लेक्स को जन्म देती है जिसे हम लिटिल ब्वाय सिंड्रोम कहते हैं।

अनवर मेरे दोस्त, तुम्हें इस सिंड्रोम से बाहर आना होगा क्योंकि अगर तुम मौदूदी और सैयद कुतुब और ओसामा और जवाहिरी जैसी सोच का शिकार हो गए तो इस धर्म का कोई भविष्य नहीं बचेगा जो शांति और क्षमा का पाठ पढ़ाता है। इस आततायी मानसिकता का जोरदार विराध करने का वक्त आ गया है। अगर अब ऐसा नहीं होगा तो मैं, तुम और एम जे जैसे लोग इतिहास में विलेन के रूप में देखे जाएंगे और हिंदू कट्टरपंथी जैसी ताकतें इस देश पर राज करेंगी।

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आशुतोष के बारे में कुछ और

44 साल के आशुतोष मैनेजिंग एडिटर हैं। IBN7 से जुड़ने से पहले आशुतोष एक प्रमुख खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे। वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे। ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही है। वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं।
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