दिसंबर, 2009
जिन्हें टीवी पर नाज नहीं है वो आज कहां हैं। ये सवाल मेरे दिल में पिछले एक हफ्ते से घूम रहा है। मन उन टिप्पणीकारों को खोज रहा है जो अक्सर टीवी को अपने कॉलमों में कोसते रहते हैं। टीवी ने चंडीगढ़ की रुचिका का केस उठाया और उसे उस मुकाम तक पंहुचाया जिस तक लाने के लिए रुचिका और उनकी दोस्त के परिवार को 19 साल लग गए फिर भी उसे न्याय नहीं मिला। टीवी ने ये कहानी दिखाई कि कैसे एक मासूम अन्याय का शिकार होती है और जब वो उसका प्रतिकार करती है तो उसे खुदकुशी के लिये मजबूर होना पड़ता है। भाई को झूठे केस में फंसाया जाता है..उसके साथ जानवरों की तरह बर्ताव होता है..पिता की नौकरी छीन ली जाती है..मकान बेचना पड़ता है और 19 साल तिल-तिल कर मरना पड़ता है क्योंकि उनके सामने खड़ा था एक ऐसा शख्स जो हमारे सिस्टम से बड़ा....
लाल कृष्ण आडवाणी का मैं हमेशा ही आलोचक रहा। उस समय भी जब दिल्ली के तमाम पत्रकार उनके साथ अपने परिचय पर इतराया करते थे और उस वक्त भी जब यही पत्रकारी मेंढक उनके संकट में उनको पानी पी पी कर खारिज करते थे। इस दौरान मुझे पता चला कि कुछ पत्रकार कितने अवसरपसंद होते हैं और दिल्ली का राजनीतिक मिजाज कितना निर्मम। लेकिन इस अवसरवादिता और निर्ममता के बीच आडवाणी को लेकर मेरी सोच में रत्ती भर बदलाव नहीं आया। शायद इसलिय़े कि ये आलोचना व्यक्तिगत न हो कर वैचारिक थी। मैंने हमेशा ये माना कि आडवाणी जिस विचारधारा को भारतीय राजनीति में स्थापित करने में जुटे हैं वो देश का नुकसान करेगी, वो एक कौम की विरोधी है और कट्टर राष्ट्रवाद के बावजूद देश को बांटेगी। लेकिन आलोचना की इस दृष्टि के बावजूद मैंने उन्हें कभी नकारा नहीं। इस नजर से जब भी मैं उन्हें देखता....
तेलंगाना की आग ने एक बार फिर नेहरू जी की याद ताजा कर दी। आंध्र प्रदेश के अलग राज्य बनने के बाद नेहरू जी ने कहा था कि 'हमने बर्र के छत्ते में हाथ लगा दिया है और हम सब लोगों को ये आने वाले दिनों में डंक मारने वाला है।' तेलंगाना के मसले पर अभी ये तय नहीं हुआ है कि वो अलग राज्य बन ही जाएगा। जिस तरह से तेलंगाना से अलग इलाकों के नेताओं ने इस्तीफे देने शुरू किए हैं उससे इसके लटक जाने की आशंका बढ़ गई है लेकिन इसने एक ऐसे जिन्न को जन्म दे दिया जो आने वाले दिनों में सरकार को डंक मारता रहेगा। हरित प्रदेश, गोरखालैंड, विदर्भ और बुंदेलखंड की मांगों को एक बार फिर नई जिंदगी मिल गई है। मायावती ने भी ऐलान कर दिया है कि उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों में बांट देना चाहिए। ऐसे में नेहरू....
सात हिंदुस्तानी का सिपाही और जंजीर का एंग्री यंगमैन जवान हो गया है। नये अंदाज और नये रूप में। उसका नया नाम आरो है। उम्र तेरह साल। बस थोड़ी दिक्तत है। वो दिखने मे बूढ़ा लगता है। बड़ा सिर, सिर पर कोई बाल नहीं, नसें बाहर निकलने को बेकरार, मोटा चश्मा, टूटे-फूटे दांत, आवाज फटी-फटी सी। फिर भी कूल। शरारती, हाजिर जवाब और सबका प्यारा। ये अमिताभ है। नया अमिताभ। यानि बिग बी। सिनेमा का महामानव। हमारी पीढ़ी जब जवान हो रही थी तो उसने दूसरा ही अमिताभ देखा था। वो अमिताभ जो लंबा था। भारी भरकम आवाज। कानों तक लटकते बाल और व्यवस्था की आंख में दनदनाता हुआ घूंसा। सिस्टम से नाराज और सिस्टम से बदला लेने को व्याकुल। उसकी हर अदा पर पागल होती जनता और सुपर हिट होती एक के बाद एक फिल्में। लेकिन एक गड़ब़ड थी। ये अमिताभ हर फिल्म में एक ही था।....









