"अमेरिका का मिलिट्री रक्षा खर्च बाकी दुनिया के कुल रक्षा खर्च से ज्यादा है, फिर भी चार सालों के अथक प्रयासों, सैकड़ों अमेरिकियों की जान गंवाने और करीब आधा ट्रिलियन डॉलर स्वाह करने के बावजूद अमेरिका ढाई करोड़ की आबादी वाले एक देश में लोकतंत्र की जड़े जमाने मे नाकाम क्यों रहा। "
जाने-माने अमेरिकी चिंतक फ्रांसिस फुकुयामा ने 2006 में अमेरिका की मौजूदा तकलीफ को इन शब्दों में बयां किया था। उनकी ये टिप्पणी अमेरिका की चिंता और उसकी वेदना की ओर इशारा करते हैं। और यही चिंता नये अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पहले भाषण मे भी दिखाय़ी देती है जब वो कहते है कि अमेरिका इस वक्त संकट के दौर से गुजर रहा है। उनका ये कहना महज एक संयोग नहीं है।
फ्रांसिस फुकुयामा वो शख्स है जिसने नब्बे के दशक में इतिहास का अंत लिखकर ये कह दिया था कि उदारवादी लोकतंत्र सबसे परिष्कृत और स्थाई शासनतंत्र है। फुकुयामा उन लोगों में से हैं जिन्हें नियोकोन यानी नियो-कंजरवेटिव के नाम से जाना जाता है, जो बुश को नीति निर्धारण और रणनीति पर विशेष सलाह देते रहे हैं।
हालांकि फुकुयामा ने अपनी गलती को वक्त रहते ही महसूस कर लिया था परंतु दूसरों को ये समझ अभी तक नहीं आई है जो रिपब्लिकन्स के हार का बड़ा कारण बना। नियोकोन्स पूर्व राष्ट्रपति रीगन के समय ही खबरों मे आ गये थे पर साम्यवाद के पतन और शीत युद्द के अंत ने उन्हें अमेरिकी सोच की मुख्यधारा में ला खड़ा कर दिया। और उसके बाद वो इतने प्रभावशाली हो गए कि बुश प्रशासन की रणनीति तय करने लगे।
मार्क्सवाद के अंत और शीत युद्ध के खात्मे ने उन्हें इस कदर दीवाना कर दिया कि वो ये सोचने लगे कि अमेरिका विश्व सभ्यता का एकलौता सरताज है। और दुनिया के नियम और कानून उसपर लागू नहीं होते और ना ही अमेरिका को किसी के सहयोग और मदद की जरूरत है। यहां तक कि यूरोप की भी नहीं ।
नियोकोन्स ये भी सोचने लगे कि अमेरिका किसी भी देश या राज्य के लिए खुद फैसला लेने में सक्षम है। नियति ने उन्हें ये महती नैतिक जिम्मेदारी सौपी है कि वो दुनिया को नयी रोशनी दिखाये , उसकी अगुवाई करे । और फुकुयामा जैसे लोगों के जरिये उन्हे ये एहसास भी हो गया था कि इतिहास के विकास की धारा में अमेरिका ने गैर पश्चिमी विचारों के खिलाफ आखिरी जंग जीत ली है और अब विचार के स्तर पर उन्हे चुनौती देने का माद्दा किसी में बचा नहीं है। फासीवाद और साम्यवाद जैसी विचारधाराओं का हस्र पूरी दुनिया देख ही चुकी है। और अब दुनिया के हर कोने में लोकतंत्र की स्थापना उनका नैतिक उत्तरदायित्व है ।
उसी सोच ने बुश प्रशासन को किसी भी गैर लोकतांत्रिक देश में सत्ता परिवर्तन के लिये प्रेरित किया। बुश ने ये भी नहीं सोचा कि संप्रभुता के सिद्धांत की अवहेलना न करने पर पूरी दुनिया में आम सहमति है और संयुक्त राष्ट्र का बुनियादी उसूल इसकी इजाजत नहीं देता। लेकिन क्या करे दुनिया अगर अमेरिका ने अपने लिये दयालु तानाशाह की भूमिका तय कर ली।
बुश प्रशासन ने कभी महसूस तक नहीं किया कि किसी भी लोकतंत्र की आधारभूत जरूरत जनता का मत, विचार-विमर्श के साथ शासन और किसी भी वैचारिक बहुमत को अहमियत देना है। स्वतंत्रता यानी लिबर्टी अमेरिकी संविधान की मूल आत्मा है। लेकिन जब दूसरे देशों की बात आयी तो वो ये भूल गये ये किसी भी देश का लोकतांत्रिक अधिकार है कि वो अपने देश और जनता अपनी पसंद के मुताबिक सत्ता का चुनाव करे। इसमे दूसरे के दखल की अनुमति नहीं है।
लेकिन ये बात अपने दंभ में अमेरिका भूलता गया। फ्रांसिसी लेखक पीयरे हैसनर के मुताबिक अमेरिकी संविधान में संस्थाओ के बीच संतुलन को अहमियत दी गयी है क्योंकि अमेरिकी संविधान निर्माताओं का मानना था कि सत्ता भ्रष्ट करती है। भले ही सत्ता चलाने वालों की नियत कितनी भी साफ और ईमानदार क्यों न हो लेकिन किसी भी एक संस्था को बेशुमार ताकत की इजाजत नहीं दी जा सकती।
हैसनर कहता है कि शीत युद्ध के अंत के बाद अमेरिका ने एक दयालु तानाशाह की तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया और लोगों को कहने लगा हम पर "भरोसा करो" । हैसनर पूछता है जब अमेरिका को अपनी जमीन पर सत्ता का केंद्रीकरण पसंद नहीं है तो फिर यहीं सिद्दांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति में क्यों नहीं लागू होना चाहिये। यानी अमेरिका की बेशुमार ताकत अंतरराष्ट्रीय समीकरण को बिगाड़ सकती है, जो चीज उसे अपने यहां ठीक नहीं लगती वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर कैसे सही हो सकती है। अमेरिका की बेशुमार ताकत क्यों नहीं अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिये खराब होगी, गलत होगी।
इसलिए जब बुश ने बगैर किसी असल वजह के इराक पर हमला करने का फैसला किया, तब वो अमेरिकी संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ काम कर रहे थे। और इसका नतीजा भी उन्हे भुगतना पड़ा। नियोकान्स के प्रभाव ने बुश को इस कदर अंधा कर दिया था कि उन्होंने बिना किसी पुख्ता सबूत के इराक पर हमला कर दिया। तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा , झूठ का महल खड़ा किया ।
बुश ने कहा कि इराक के पास पूरी दुनिया को नष्ट करने वाले खतरनाक हथियार हैं और सद्दाम हुसैन का अल-कायदा से संबंध है। ये दोनों बातें बाद मे गलत साबित हुयी। जिसे बाद में अमेरिकी एजेंसियों ने खुद स्वीकार भी किया। शायद ये उन पर नियोकॉन आंदोलन के गुरू लियो स्ट्रॉस के प्रभाव का नतीजा था, जो अकसर "चैंपियन ऑफ नोबल लाई" की थ्योरी को प्रोमोट करते थे। उनका कहना था कि "आम जनता से झूठ बोलने में कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि सच्चाई जानने की काबलियत सिर्फ पढे लिखे विद्वानों मे ही होती है।"
ये नियोकान्स की सोच का असर था या यो कहे सत्ता का नशा कि इराक पर हमले से पहले बुश ने अपने पुराने यूरोपीय मित्र राष्ट्रों को भी भरोसे में लेना मुनासिब नहीं समझा। उन्हें संयुक्त राष्ट्र का भी ख्याल नहीं रहा। उनके लिए तो सिर्फ एक ही नियम था, 'या तो आप मेरे साथ हैं या मेरे खिलाफ'।
फुकुयामा के मुताबिक " बुश प्रशासन को अंतर्राष्ट्रीय कानून और संगठन की क्षमता पर ये यकीन नहीं था कि वो सुरक्षा से जुड़े मामले को सुलझाने में मददगार हो सकेंगे। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था के प्रति उनका अविश्वास अंत में दूसरे देशों के मामले में नजर आया।"
हैरानी नहीं कि इसी चाल चलन की वजह से अपने दूसरे कार्यकाल में बुश दुनिया के सबसे बदनाम अमेरिकी राष्ट्रपति बन गए और अमेरिका दुनिया का सबसे नापसंद देश। उनकी नीति जिहादी आतंकवाद के प्रसार में मददगार साबित हुयी। आखिरी के कुछ दिनों में बुश निहायत अकेले पड़ गये थे और अमेरिका का सुपर पावर का गुरूर टूटता नजर आने लगा।
ओबामा इस बात को पहले ही समझ गये थे तभी तो उन्होने अपने भाषण में कहा कि "सनकी लोगों को अब ये समझना होगा कि उनके नीचे की जमीन खिसक चुकी है? पुराने घिसे-पिटे राजनीतिक जुमलों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है।"
"हमारे पूर्वजों ने आम लोगों को ध्यान में रखकर संविधान का निर्माण किया था। वो आदर्श आज भी विश्व को रोशन करते हैं और हम उस आदर्श को कतई नजरअंदाज नहीं करेंगे। इसलिए आज जो लोग या सरकार हमें देख रहें हैं, ये जान लें कि अमेरिका हर राष्ट्र, हर व्यक्ति, हर औरत और हर बच्चे का दोस्त है जो इज्जत और शांति के साथ अपने भविष्य की तलाश में हैं। औऱ हम एक बार फिर नेतृत्व करने को तैयार हैं।"
ओबामा ने आगे कहा " हमारे पूर्वज जानते थे कि हम भले ही कितने ही ताकतवर हों लेकिन अकेले खुद की सुरक्षा नहीं कर सकते। न ही हमे मनमानी करने का अधिकार है।" ओबामा आगे कहते हैं कि हमारी ताकत इसके तार्किक और ईमानदार इस्तेमाल से बढ़ती है। विनम्रता और आत्मनियंत्रण से हमे बल मिलता है।
मुझे पूरा यकीन है कि अमेरिकन डेमोक्रेसी के फरिश्ते उस वक्त जरूर मुस्कुराए होंगे जब ओबामा के भाषण के खत्म होने पर बुश ने तालियां बजाईं होंगी क्योंकि ओबामा वो कुछ कह रहे थे जो बुश की नीतियों का बिलकुल उलट था।
तो क्या हम इस नयी सुबह के आगमन और नये हीरो के जन्म के साथ के साथ ये कह सकते है कि अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति से दयालु तानाशाह के दिन बीत गये हैं? क्या अब अमेरिका अफगानिस्तान औऱ इराक जैसे देशों में सत्ता परिवर्तन की हिमाकत नही करेंगा? ओबामा के ये शब्द इस ओर इशारा जरूर करते हैं। और हमें ये यकीन भी दिलाते है कि अमेरिका अपनी गलतियों से सबक लेगा। मेरा ये विश्वास तब और मजबूत हुआ जब ओबामा मुस्लिम देशों से मुखातिब हुये और बोले " मैं परस्पर सम्मान और आपसी हितों के मद्देनजर नया रास्ता तलाशना चाहता हूं। " मैं ये नहीं ये कहता कि अमेरिका हमेशा के लिए बदल चुका है। मैं ये भी नहीं कहता कि अब अमेरिका इराक या अफगानिस्तान में कभी भी अपनी सेना नहीं भेजेगा।
मैं बस ये कहना चाहता हूं कि अमेरिका अब जनमत आड़ और नैतिकता का लबादा ओढ़ शक्ति के इस्तेमाल की कोशिश करेगा। पहले की तरह अब हेकड़ी की जगह नफासत से काम लेने का प्रयास करेगा। "हार्ड पावर" की जगह "साफ्ट पावर" उसका हथियार होगा। गुरु फुकुयामा पहले ही कह चुके है कि "अमेरिकी ताकत सबसे कारगर और फायदेमंद तब होती है जब इसका प्रयोग पर्दे के पीछे से हो। "
क्योंकि हमें नहीं भूलना चाहिए कि ओबामा बुश नहीं हैं और अब नियोकॉन्स भी नहीं है जो उन्हें दिशा-निर्देश दें। लेकिन ओबामा अमेरिकी हैं, ये सच्चाई है। पूर्व विदेश मंत्री मैडलिन ऑलब्राइट की तरह हर अमेरिकी इस बात का कायल है कि दुनिया की अगुवाई करना अमेरिका का हक है क्योंकि अमेरिकी बाकी लोगों से ज्यादा आगे की सोच सकते हैं। और ये सोच ओबामा को हमेशा ही प्रेरणा देती रहेगी।














कमेंट्स
7