ये मेरे यूनिवर्सिटी के जमाने की बात है। तब पहली बार मैंने लालू यादव नाम के किसी शख्स का नाम सुना। पता चला वो बिहार के मुख्यमंत्री बनने की रेस में हैं। लालू को उस समय के किंग मेकर और भारतीय राजनीति के स्तंभ माने जाने वाले देवी लाल का समर्थन हासिल था। जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह को लालू यादव फूटी आंख नहीं सुहाते थे।
मुख्यमंत्री पद के लिए वी.पी. सिंह के उम्मीदवार थे दलित नेता रामसुंदर दास। तब किसी ने लालू को गंभीरता से नहीं लिया था। और न ही मुख्यमंत्री बनने के बाद किसी ने सोचा था कि वो अपना कार्यकाल भी पूरा कर पाएंगे। लेकिन तमाम तर्कों और राजनैतिक समीकरणों को दरकिनार करते हुए उनकी सरकार ने न सिर्फ अपना कार्यकाल पूरा किया बल्कि 15 साल तक वो बिहार में सत्ता में भी बने रहे।
मैं उन्हीं लालू प्रसाद यादव की बात कर रहा हूं जिन्होंने बीते हफ्ते लगातार अपना छठा रेल बजट पेश किया और जो इन दिनों मनमोहन सरकार के सबसे मजबूत सिपहसालार माने जाने जाते हैं। लालू ने अपने बजट भाषण में बुलेट ट्रेन का जिक्र साथ ही ये भी बताया कि कैसे रेलवे से मुनाफा भी कमाया जा सकता है। वो वही लालू प्रसाद हैं जिन्हें बिहार की बदहाली और कुशासन का जिम्मेदार माना जाता रहा है।
लालू को कभी किसी ने गंभीरता से नहीं लिया उस वक्त भी जब वो बिहार के मुख्यमंत्री थे और उसके बाद भी जब उनकी पत्नी मुख्यमंत्री बनीं। उच्चवर्गीय अंग्रेजी बोलने वालों को तो छोड़िए, यहां तक कि उच्चमध्यमवर्गीय तबका भी उन्हें नापसंद करता और मजाक उड़ाता रहा।
और आश्चर्य की बात ये कि उन्होंने कभी अपनी इमेज बदलने की कोशिश भी नहीं की। इसके उलट उन्हें खुद का मजाक बनते देखना अच्छा लगने लगा और दूसरों की तरह खुद को जड़ों से दूर दिखाने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने इसका भरपूर मजा लिया औऱ इसे बखूबी राजनीतिक फायदे के लिए भी इस्तेमाल किया।
वो एक ऐसे नेता के रूप में जाने जाते रहे जिन्हें भैंस के साथ फोटो खिंचवाना और हवाई जहाज को 'उड़न खटोला' कहना ज्यादा पसंद था। उनके लिए ऊंची जाति वाले 'भूरा बाल' थे जिन्हें शेव कर हटाना जरूरी था। कई बार उनसे मुलाकात हुई। कभी नाराज होते तो कभी खुश। हालांकि पत्रकार को नेताओं की नाराजगी और खुशी से फर्क नहीं पड़ना चाहिये। और मैंने कभी इसकी परवाह भी नहीं की। जिसने बुरा माना उसका भी भला और जिसने नहीं उसका भी भला। अपना धंधा ही ऐसा है।
एक बार लालू यादव मेरे कुछ तीखे सवालों से भड़क गए और इतना भड़के कि एक साल तक उनसे बात नहीं हुई। मेरा नाम सुनते ही मुंह बिचका देते थे मानो कोई कड़वी गोली हो। इस दौरान लालू ने मुझे इंटरव्यू देने से भी मना कर दिया था।
लेकिन तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों के बावजूद मैं हमेशा उनकी करिश्माई राजनीति का कायल रहा, चारा घोटाला और भ्रष्टाचार के दूसरे आरोपों के बावजूद। या ये कहें इन आरोंपो ने लालू के करिश्मे को और निखारा ही। वो जेल गये लेकिन सभी राजनीतिक आंकलनों को उलटा करते हुये अपनी पत्नी को किचन से निकाल कर सीधे कैबिनेट का मुखिया बना दिया। ये बड़े जिगरे का काम था। और थोड़ी बेशर्मी का भी।
लेकिन लालू के वोटर पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा। वो जो जेल जाये या फिर मजाकिया अंदाज में हेयर स्टाइल रखे, भैंस के बगल में होकर फोटो खिचवांये या फिर हंसी के पात्र बने। सब कुछ बेहद सहज और स्वाभाविक। और सबसे बड़ी बात ये कि वो जो कुछ भी करते या कहते थे उनका वोटर उसको समझता था और उस पर रियेक्ट भी करता था और ये बात हम शहरी लोगों को नहीं समझ आती कि वो आखिर किस भाषा में अपने वोटर से कम्यूनिकेट करते हैं।
टीवी पर आने और दिखने की ललक हर राजनेता में होती हैं लेकिन जिस तरह से लालू ने टीवी का दोहन किया वो अद्भुत है। भरपूर इस्तेमाल किया और हमेशा अपने फायदे कि लिये। सवाव ये होता है कि आखिर ' गंवार सा दिखने वाला एक आदमी इतने लंबे समय तक क्यों जमा हुया है? मेरी नजर में इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। कुछ कह सकते है कि वो अच्छे 'कम्युनिकेटर' हैं, कुछ के लिये वो 'जातिवादी राजनीति की बुरी उपज' और कुछ के लिये 'मुस्लिम तुष्टीकरण के बायप्रोडक्टट'।
विवादों में फंसने का खतरा मोल लेते हुये मैं ये कहना चाहता हूं कि वो कांशीराम के साथ अकेले ऐसे शख्स हैं जिसने देश के संविधान में आम आदमी, दबे-कुचले तबके को वो मुकाम दिलाया जिसका जिक्र तो संविधान में था लेकिन जिसकी तस्वीर साफ नहीं दिखाई देती थी।
साफ शब्दों में कहें तो लालू ने संविधान को 'विश्वसनीयता' दिलाई और यकीनन वो ही एक ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने सामाजिक समानता और आजादी (इक्वलिटी और लिबर्टी ) के सिद्धांत को कांशीराम के साथ बढ़ाया। उनके पहले भारतीय संविधान लोकतंत्र की दुहाई तो देता था, उसकी बात तो करता था लेकिन सही मायने में आम आदमी का प्रतिनिधितत्व नहीं करता था।
ये लोकतंत्र काफी हद तक पढ़े-लिखे और शक्तिशाली ऊंची जातियों की नुमाइंदगी करता था। गांधी जी समाज के सबसे निचले तबके के, आखिरी आदमी की बात करते थे, नेहरू ने समाज के हाशिये पर मौजूद आम आदमी तक पहुंचने की कोशिश की औऱ लोहिया ने भी दबे कुचलों की, निचली जातियों के लोगों को केंद्र में रखकर राजनीति करने की कोशिश की। लेकिन कोई भी लालू यादव की तरह कामयाब नहीं हुआ।
उस दौर में कोई पिछड़ी जाति का नेता मंत्री बन जाता या उसे कोई अच्छा मंत्रालय मिल जाता तो वो खुश हो जाते थे। जगजीवन राम और चरण सिंह कुछ ऐसे ही नेता थे। ये वो नेता थे जिन्हें उच्च जाति से प्रभावित भारतीय समाज और राजनीति ने को - आप्ट कर लिया था। इन्हें अपना बना लिया था और इनके बहाने पिछड़ी जातियों को सत्ता में भागीदारी का सब्जबाग दिखाया जाता था पर हकीकत में ये छलावा था क्योंकि इनकी सत्ता में भागीदारी और समाज में इज्जत वो नहीं थी जो ऊंची जातियों के लोगों और नेताओं की थी।
ये वो नेता थे जो सत्ता का हिस्सा होने के बाद ऊंची जातियों की तरह ही बरताव करने लगते थे और धीरे-धीरे अपनी जड़ों से दूर हो जाते थे। और शायद ऊंची जातियों और भद्र पुरुष चाहते भी यही थे क्योंकि इससे उनकी सत्ता को कोई खतरा नहीं था और पिछड़े भी संतुष्ट थे।लेकिन लालू यादव और कांशीराम जगजीवन राम और चरण सिंह नहीं थे।
मैं इससे बिल्कुल सहमत हूं कि अगर मंडल कमीशन नहीं होता तो शायद लालू नहीं होते, लालू मंडल की राजनैतिक उपज हैं। अगर वी.पी. सिंह ने मंडल कमीशन को लागू नहीं किया होता तो शायद लालू भी उन्हीं मुख्यमंत्रियों की श्रेणी में आते जिन्हें लोग अब तक भूल चुके होते। मंडल कमीशन ने उन्हें पिछड़ी जातियों में राजनैतिक हैसियत बनाने में काफी हद तक मदद की और रथ यात्रा के दौरान आडवाणी की गिरफ्तारी ने मुसलमानों को भी उनके करीब ला दिया।
लालू और कांशीराम के पहले ये सही है कि संविधान ने पिछड़े तबके को कानून की नजर में बराबरी का दर्जा तो दिया था लेकिन सच्चाई में इन्हे कभी भी सही मायने में आजादी नहीं मिली। इनके लिये आजादी एक अजीबो-गरीब शब्द था और समानता एक मृगमरीचिका। वो वोट देने को आजाद तो थे लेकिन वास्तव में वोट उन्हे किसी और के इशारे पर देना होता था, उन्हें किसी को भी चुनने का हक तो था लेकिन चुनते उसी को थे जिन्हे चुनने को कहा जाता था। यानी वोट इनका लेकिन इशारा किसी और का। यहां तक कि उन्हें शासन करने की भी इजाजत नहीं थी।
मुस्लिम और पिछड़ी जातियों को आजादी तब तक थी जब तक वो किसी खास सरकार या उम्मीदवार को चुनते रहे। वो लोकतंत्र का अहम हिस्सा थे, वो चुनाव में महत्वपूर्ण थे। लेकिन वो खुद ये फैसला नहीं कर सकते थे- उनका ग्राम प्रधान कौन होगा, कौन होगा उनका अपना विधायक और कौन होगा उनका अपना सांसद या मुख्यमंत्री? उन्हें चुनाव करने के लिए आदेश मिलते थे या फिर उन्हें इस प्रक्रिया से महरूम होना पड़ता था।
लालू प्रसाद की राजनीतिक कुशलता ने पूरे दृश्य को पलट दिया। उन्होंने खुद को वी.पी. सिंह से अलग कर एक नई पार्टी तैयार की और अपने लोगों को एहसास कराया कि अब असली आजादी का वक्त आ गया है। अब वो खुद किसी को चुन सकते हैं, आजादी की जिंदगी जी सकते हैं और खुद अपनी सरकार भी चुन सकते हैं। लालू ने ये भी एहसास दिलाया कि उन्हें अब किसी ऊंची जाति के शक्तिशाली नेता की कठपुतली बनकर नहीं रहना। जगन्नाथ मिश्रा की तरह लालू भी अब उड़न खटोला में उड़ सकेंगे।
उन्होंने कभी भी खुद को भैंसों से अलग नहीं किया। इसके अलावा इसे संपन्नता का प्रतीक बना दिया। लालू ने जन-जन तक ये संदेश भी पहुंचाया कि शक्तिशाली होने के लिए उन्हें अपनी जीवनशैली बदलने की कोई जरूरत नहीं और न ही उन्हें जगन्नाथ मिश्रा बनने की कोई जरूरत है। वो खुद अपनी तकदीर के मालिक हैं।
लालू ने पिछड़ी जाति और मुसलमानों को आजादी और समानता का एहसास कराया। इससे पहले तक वो संख्या में तो ज्यादा थे लेकिन हैसियत नदारद थी। लेकिन लालू ने एहसास कराया कि अगर वो संख्या में ज्यादा हैं तो उनकी हैसियत भी बड़ी है। क्योंकि वो अब सिर्फ संविधान के हिसाब से बराबर नहीं हैं बल्कि राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी बराबर हैं। और यही हमारे देश के संविधान का मूल आधार है।
और ये अनायास नहीं है कि ये तबका पंद्रह सालों तक लालू से जुड़ा रहा। इस बात की परवाह नहीं कि बिहार में सड़क है या नहीं, कानून व्यवस्था बदतर है, और क्योंकि जब सवाल अपनी अस्मिता को तलाशने और सदियों से सोयी चेतना के जगने का हो, उसका आनंद लेने का हो तो कुछ सवाल तो पीछे छूट ही जायेंगे। ये अब नीतिश कुमार की जिम्मेदारी है कि वो सामाजिक चेतना के उभार को विकास से जोड़ें।
इसी वजह से मैं कहता हूं कि तमाम खामियों के बाद भी सही मायने में लालू ने ही संविधान को उसकी कमी का एहसास दिलाया और उस खामी को पूरा किया जिसके बगैर ये संविधान संविधान तो होता लेकिन सिर्फ उन लोगों को सदियों से ताकतवर है जाति के हिसाब से और सामाजिक चेतना के स्तर पर। लालू ने कांशीराम के साथ संविधान की आत्मा को झकझोरने और हमारे सामूहिक अपराधबोध को उद्घाटित करने का काम किया उस तबके को सत्ता से जोड़कर जो कभी सत्ता के नाम से कांप उठता था।
यही वजह है कि अब जब भी वो रेल बजट पेश करते हैं कोई भी उनका मजाक नहीं उड़ाता। और अब तो मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट भी उनसे मैनेजमेंट के गुर सीखना चाहते हैं। क्योंकि अब संविधान की आत्मा जाग उठी है और इसे जगाया है लालू और कांशीराम ने। और इसी वजह से अब संविधान कुछ ज्यादा ही मर्यादित और सम्माननीय लगता है।














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