अभी सोच ही रहा था कि खबर आ गयी कि वरुण गांधी पीलीभीत से ही लड़ेंगे। खुद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने ऐलान कर दिया। कुछ समझा और कुछ नहीं समझा। समझ और नासमझ के बीच धड़ाम होते-होते ये भी सोचा कि क्या ये कहना जरूरी था। बिना कहे भी तो कई बातें हो जाती हैं। समझ में नहीं आया कि क्यों एक पार्टी जो छह साल तक सरकार में रही है और जिसकी आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में सरकार हो वो भला कैसे किसी संवैधानिक संस्था की खुलेआम अवहेलना कर सकती है।
यकीन मानिये बीजेपी की दिक्कत ही यही है। और यही उसके विकास में सबसे बड़ी बाधा भी। वो विचारधारा से बंधी है। उस विचारधारा से जो हिंदुत्व की बात करती है। हिंदुत्व में कोई बुराई नहीं है। लेकिन अगर हिंदुत्व की बुनियाद में मुस्लिम विरोध हो तो दिक्कत है। इसलिये मुझे हैरानी हुई जब ये पता चला कि बीजेपी की चुनाव समिति की बैठक में वरुण के जहरीले भाषण पर पार्टी नेताओं ने अफसोस जताया। और निजी बातचीत में पार्टी के बड़े नेता ये भी कहते पाये गये कि इससे पार्टी का नुकसान होगा। बिल्कुल वही बात जो कर्नाटक में चर्चों पर हमले और पब में लड़कियों के कपड़े फाड़ने पर मुझसे बातचीत में आरएसएस के एक नेता ने कही थी।
सवाल ये है कि जब वो मानते हैं कि ऐसी बातों से पार्टी की छवि को धक्का लगता है और इससे नयी युवा पीढ़ी में बीजेपी के खिलाफ एक माहौल बनता है तो फिर बीजेपी और संघ परिवार का बेताल वहीं से उड़ कर वहीं क्यों आ बैठता है? क्या ये महज इत्तफाक है या फिर कुछ दूसरी चीजें हैं जो संघ परिवार और बीजेपी को मथती रहती हैं और वो इससे बाहर नहीं निकल पाती।
दरअसल विचारधारा की एक अजीब जिद होती है। ये सभी विचारधाराओं के लिये सच है। विचारधारा की उपज और विकास के बीज में होता है एक गहरा विश्वास जिसके ऐतिहासिक कारण होते हैं। जब 1925 में आरएसएस का जन्म हुआ तो वो सिर्फ कांग्रेस विरोध ही नहीं था बल्कि कहीं गहरे हेडगेवार के मन में ये बैठा था कि कांग्रेस की मुस्लिमपरस्त नीति देश का बंटाधार कर रही है और इससे देश को आजादी भले ही मिल जाये लेकिन देश का भला नहीं होगा, हिंदुओं का तो कतई नहीं।
उनके मन के किसी कोने ये बात भी घर कर गयी थी कि भारतवर्ष पर पिछले एक हजार साल से मुसलमानों और ईसाइयों का शासन इसलिये नहीं था कि हिंदुओं में दम नहीं था बल्कि ये इसलिये गुलाम हुये क्योंकि हिंदू संगठित नहीं था। अब गुलामी के सालों ने उसे कायर बना दिया है, उसकी आक्रामकता जड़ से खत्म हो गयी है और जरूरत है उसे नये सिरे से "री-इनवेंट" करने की। उसे अपने को संगठित करना होगा, हिंदुओं को आक्रामक बनना होगा, ताकि फिर वो कभी गुलाम न हों। ऐसे में संघ की नजर में आजादी को स्थाई करने के लिये नये हिंदू को "मैनुफैक्चरर" करना होगा। आज की भाषा में कहें तो उसे एकदम नया "ब्रांड" बनाना होगा।
ये अनायास नहीं है कि राममंदिर आंदोलन के जमाने में शालीन राम की नहीं क्रोधित राम की तस्वीर बीजेपी ने प्रोजेक्ट की। ये वो राम थे जो हथियारों से लैस थे और दुष्टों को सबक सिखाने के लिये अपना गाल आगे नहीं करते। ये गांधी की विचारधारा से बिल्कुल उलट है।
वरुण गांधी पीलीभीत में जो कहता है वो संघ की सोच से हूबहू मेल खाता है। वो अपने भाषण में मुसलमानों को निशाना बनाता है, उन्हें समाज का खलनायक करार देता है और ये भी कहता है कि मैं गांधी नहीं जो एक गाल पर मार खाने के बाद दूसरा गाल आगे कर देता हो। ये भाषा आडवाणी सार्वजनिक मंच से कभी नहीं कहेंगे। लेकिन जिन लोगों ने राममंदिर के जमाने में संघ परिवार का जमीन पर प्रचार देखा है और उन दिनों दीवारों पर जो नारे लिखे होते थे वो विशुद्ध रूप से मुसलमान विरोधी थे और भाषा ऐसी थी कि मैं यहां लिख नहीं सकता। ऐसे में गठबंधन की राजनीति और भारतीय संविधान की मजबूरी के तहत ये बड़े नेता ऑन रिकार्ड भले ही वरुण के बयान से अपने को अलग कर लें लेकिन वास्तविकता में वो वही कह रहा है जो अकेले में ये नेता सोचते और आपस में बात करते हैं।
पर ये भी एक सचाई है कि पिछले दिनों समाज में जबर्दस्त बदलाव आये हैं और आरएसएस को लगे या न लगे लेकिन बीजेपी को ये लगने लगा है कि पार्टी कहीं इस नये बदलाव के मुताबिक अपने आप को बदल नहीं पायी है जिसकी वजह से उसका विकास और विस्तार उतना नहीं हो पा रहा है जितना होना चाहिये। कुछ बड़े नेताओं को ये भी लगता है कि आगे के विस्तार में विचारधारा की जिद काफी आड़े आ रही है। आडवाणी का जिन्ना बयान इसी मानसिकता का प्रतीक है। सवाल ये कि क्या विचारधारा की जिद से इतनी आसानी से पार पाया जा सकता है ।
ये आसान नहीं है और अगर बीजेपी ने जल्दी ही इस दिशा में कदम नहीं बढ़ाया तो हैरानी नहीं होगी कि वो सिमटती ही जाये। "गठबंधन या नो-गठबंधन" उसे अपने को बदलना होगा और ये बदलाव सिर्फ हिंदू-मुस्लिम मुद्दे पर ही नहीं बल्कि पूरी सोच को सिंक्रोनाइज करते हुये लिबरल विचारधारा के तहत नये प्रतिबिंब गढ़ने होंगे। हिंदू-मुस्लिम रिश्तों पर, अर्थनीति के मसले पर, भारतीय परंपरा और इतिहास को नये सिरे से खंगालना होगा। इतिहास में सिर्फ शिवाजी, राणाप्रताप और भगत सिंह ही नहीं हैं, वहां अकबर भी है और अशोक भी, चंद्रगुप्त भी है और समुद्रगुप्त भी, बाल गंगाधर तिलक हैं तो भीमराम अंबेडकर, फूले, पेरियार और रविंद्रनाथ टैगोर भी हैं। यानी राष्ट्रवाद की नयी परिभाषा बीजेपी और संघ परिवार को गढ़नी होगी।
विदेश नीति में सिर्फ पाकिस्तान और इजराइल ही नहीं हैं। वहां रूस भी है, कजाकिस्तान भी है और सऊदी अरब भी। दूसरे उसे अब ये भी सोचना होगा कि महज सेल फोन और लैपटॉप के इस्तेमाल से कोई व्यक्ति या पार्टी आधुनिक नहीं हो जाती। आधुनिकता एक मिजाज है, एक एहसास है, एक जीवन पद्धति है। उसे अतीत की कोख से निकाल कर नये लिबास पहनाने होंगे। संघ परिवार कब तक इतिहास का बदला वर्तमान से लेता रहेगा। आज के बच्चे जीन्स पहनते हैं और उन्हें शॉर्ट्स भी अच्छे लगते हैं लेकिन वो खाकी शॉर्ट्स नहीं जो संघ परिवार पहनता है। ये इत्तफाक नहीं कि पिछले सालों में आरएसएस की शाखाओं की संख्या काफी घटी है। ये नये समाज के नये बच्चे हैं। आज से बीस साल पुराने नहीं जब हम अमेरिका के सामने नतमस्तक हो जाते थे। आज यही जीन्स पहने बच्चे अमेरिकियों को नया पाठ पढ़ा रहे हैं। "कांफिडेंस इज द न्यू बज वर्ड"। इन बच्चों को संघ की "शाखा" नहीं "जिम" पसंद है। अब किसी नये हिंदू को "मैनूफैक्चर" करने की जरूरत नहीं है।
अर्थनीति में उसे समझना होगा कि बाजारवाद एक सच्चाई है और इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। बीजेपी की परेशानी ये है कि वो उदारवाद के रास्ते पर चलते-चलते स्वदेशी की बात करने लगती है जिसको न तो इसकी वकालत करने वाले खुद समझते हैं और न आज तक दूसरों को समझा पाये हैं। उस पर अधकचरी गांधीवादी अर्थव्यवस्था की बात पार्टी की अर्थनीति को चू चू का मुरब्बा बना देती है। सुदर्शन ने अटल सरकार के दौरान जिस तरह से यशवंत सिन्हा पर हमले किये वो इसकी बानगी है ।
हिंदुस्तान अब गुलाम नहीं, नयी दुनिया का नया सुपर पावर बनने का ख्वाब देख रहा है। देश में पैंतीस साल से कम उम्र के लोगों की आबादी पूरी आबादी का पैंसठ फीसदी है। ऐसे में नयी बोतल में पुरानी शराब नहीं, पूरी बोतल और शराब बदलने की आवश्यकता है। उसे उग्र हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी नहीं नयी "राइटिस्ट" पार्टी बनने का रास्ता खोजना होगा। जैसे इंग्लैंड या फिर अमेरिका में। टोरी या फिर रिपब्लिकन पार्टी का मॉडल है उसके पास। ये उस मौके पर और भी जरूरी है जबकि संघ में पुराने सुदर्शन की जगह नये भागवत आ गये हैं और बीजेपी में अटल-आडवाणी का युग खत्म होने को है। उसने अगर ऐसा नहीं किया तो यकीन जानिये एक दिन साम्यवाद की तरह हिंदूवाद का भी तंबू उड़ जायेगा और किसी को खोजने से नहीं मिलेगा। ऐसे में वरुण गांधी का भाषण बीजेपी के लिये चुनाव प्रचार का नया औजार नहीं खुद को जड़ से काटने का हथियार है। ये आडवाणी को कुछ-कुछ समझ में आता है लेकिन उनके बाद की पीढ़ी को भी समझना होगा और नये बदलाव के लिये पार्टी को अंदर से लेकर बाहर तक तैयार करना होगा।














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