बीजेपी की हालत बुरी है ये किसी से छुपा नहीं है। लेकिन आरएसएस उसके घाव में मिर्च डालकर उसका दर्द बढ़ा रहा है। संघ के बड़े नेता एम जी वैद्य कहते हैं कि अगर बीजेपी को ये लगता है कि हिंदुत्व के रास्ते चलकर उसे सत्ता नहीं मिल सकती तो वो हिंदुत्व को छोड़ दें। वो ये भी कहते हैं कि अगर बीजेपी को लगता है कि हिंदुत्व पार्टी के आधुनिक बनने के रास्ते में एक रोड़ा है तो उसे छोड़ दें।
वैद्य की बातों में दम है और बीजेपी को फौरन उनका सुझाव मान लेना चाहिए। इसलिये नहीं कि हिंदुत्व वाकई बीजेपी के लिये एक समस्या है, बल्कि इसलिए कि जिस हिंदुत्व की बात संघ करता है वो असली हिंदुत्व है ही नहीं और इसी ओर अरुण जेटली इंडियन एक्सप्रेस के अपने लेख में इशारा करते हैं । जब वो कहते है कि बीजेपी को "श्रिलनेस" यानी उथलेपन से नुकसान हुआ और अब उसे "मॉडरेशन" की दिशा पकड़नी चाहिए।
आडवाणी के राजनीतिक सलाहकार सुधींद्र कुलकर्णी तहलका में लिखते हैं और मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं है कि पहली बार बीजेपी में किसी ने मर्दानगी का काम किया है और उन वैचारिक कमियों की ओर संकेत किया है जो वाकई में बीजेपी और संघ की स्वभावगत कमजोरियां हैं। कुलकर्णी लिखते हैं कि मुस्लिम मुद्दे पर संघ की राय से भ्रम फैलता है। और इस मसले पर संघ और बीजेपी को अपनी राय साफ करनी चाहिए। और वो ये भी सलाह देते हैं कि संघ को बदलना चाहिए। लेकिन संघ को ये कभी मंजूर नहीं होगा।
संघ का हिंदुत्व है क्या? और उस पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिये ? दरअसल संघ की विचारधारा में वो वैज्ञानिक ऊर्जा नहीं है जो आपको साम्यवाद में दिखाई देती है और न ही उसका नैतिक आधार उतना पुष्ट है जैसा मार्क्स के चिंतन में दिखता है। संघ के पास न तो मार्क्स की तरह "डायलेक्टिस" जैसा कोई वैज्ञानिक औजार है जिसके आधार पर आप इतिहास से लेकर सौंदर्यशास्त्र तक का तार्किक विश्लेषण कर सकते हैं और न ही दुनियाभर के दबे कुचले सर्वहारा वर्ग को पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के चंगुल से बाहर निकाल कर सत्ता देने का नैतिक बल और इतिहास के दाएं बाजू मे खड़े होने का सपना। संघ के नेताओं से बात करो तो वो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जुमला दे देश की हिंदू परंपरा और विरासत पर जोरदार भाषण दे देंगे लेकिन अगर आप ये पूछो कि ये सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्या है तो वो अनर्गल प्रलाप पर उतर आएंगे। उनके तर्क में वैज्ञानिकता का पूरा अभाव दिखता है और चूंकि वो अपनी सोच के आधार पर तार्किक जवाब नहीं दे पाएंगे इसलिए थोड़ी ही देर में सवाल करने वाले को छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी बता देगें या फिर देशद्रोही।
हकीकत में विचारधारा के नाम पर संघ का पूरा दर्शन मुस्लिम विरोध है और इस मुस्लिम विरोध को छिपाने के लिए भारी-भारी शब्दों को गढ़ा जाता है। मैं हिंदू हूं, मेरे पिता हिंदू हैं, मेरे दादा परदादा सभी हिंदू हैं ऐसे में अगर कोई हिंदू की बात करता है तो उस पर मैं क्यों एतराज करूंगा या किसी को क्यों आपत्ति होगी? मैं भी चाहता हूं कि हिंदू धर्म का नाम पूरी दुनिया में हो लेकिन उस तरह से नहीं जिस तरह से संघ चाहता है। मेरे जैसे लोगों को हिंदू तालिबानी नहीं चाहिए, जो मुझे बताएं कि मुसलमान कितना गंदा है और कितने बड़े देशद्रोही हैं मुसलमान। और अगर इनको सबक नहीं सिखाया गया तो कुछ सालों के बाद हिंदुस्तान पर मुसलमानों का शासन होगा। ये सोच 1925 और 1947 के सांप्रदायिक माहौल में तो ठीक हो सकती थी अब नहीं। और अगर संघ इस बात से सहमत नहीं है कि वो मुस्लिम विरोधी है तो उसे सवाल खुद से करना चाहिए कि 1925 से अब तक सिर्फ हिंदुओ के हित की बात करने वाला संगठन अब तक हिंदूओ का लाडला क्यों नहीं बन पाया? वो भी उस देश में जहां अस्सी फीसदी हिंदू रहते हों?
मैं ऐसे ढेरों संघियों को जानता हूं जिन्होंने समाजसेवा के नाम पर आजीवन ब्याह नहीं किया, त्याग और तपस्या का जीवन जिया, फिर भी वो आदर्श नहीं बन पाए और ऐसे लोग कश्मीर से कन्याकुमारी तक हजारों-लाखों हैं। संघ को ये सोचना चाहिए कि ऐसे तपस्वी लोगों की बातों पर हिंदू यकीन क्यों नहीं करता? और अस्सी फीसदी हिंदुओं की राजनीति करने वाली बीजेपी को चुनावों में सिर्फ मिलते हैं 18 फीसदी वोट? कहीं कुछ तो गड़बड़ होगा कि विश्वास का इतना बड़ा संकट संघ के सामने है बीजेपी के सामने है? वो भी तब जब कि वो राम मंदिर आंदोलन को आजादी के बाद का सबसे बड़ा जनउभार बताती है और उसी उभार के समय उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में बीजेपी सरकार बर्खास्तगी के बाद अस्सी फीसदी हिंदुओं के वोट के बल पर 1993 में दोबारा सत्ता में नहीं आ पाती? क्यों?
क्यों ऐसा है कि संघ की विचारधारा में शिवाजी और महाराणा प्रताप को ही प्रमुखता है? अगर वो देश के हजारो सालों की सांस्कृतिक विरासत की बात करता है तो फिर समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, हर्षवर्धन जैसे हिंदू राजा उसके इतिहास का "रिफरेंस-प्वाइंट" क्यों नहीं हैं? दुनिया के दूसरे देशों में जीतने वाले बड़े विजेताओं की पूजा होती है हारने वाले का गान नहीं होता है लेकिन संघ ये नहीं करता है। क्योंकि इन राजाओं ने मुसलमानों के खिलाफ जंग नहीं लड़ी जैसी शिवाजी और राणा प्रताप ने लड़ी। राणा प्रताप ने अकबर के खिलाफ और शिवाजी ने औरंगजेब के विरोध में। संघ परिवार को अकबर पसंद नहीं है जबकि हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द की उससे बड़ी मिसाल देश के इतिहास में नहीं है। क्योंकि वो मुसलमान शासक है। एम जी वैद्य को ये बात समझ में नहीं आती। न ही आरएसएस को कि आज अपनी बुनियादी दार्शनिक अवधारणाओं के नए सिरे से मूल्यांकन और विश्लेषण का वक्त आ गया है।
उसे अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिंद्धांत को नए सिरे से परिभाषित करना होगा? हिंदुत्व में से मुसलमान विरोध हटाना होगा और इतने बड़े आदर्शवादी स्वयंसेवकों की फौज की अपार ऊर्जा का इस्तेमाल हिंदू समाज में नए सामाजिक सुधार का सूत्रपात करने में लगाना होगा। उसकी ऊर्जा अगर दलित और महिला उत्पीड़न के खिलाफ जनआंदोलन में लगे तो मैं भी उसमें शामिल होउंगा। अछूत को बराबरी दिलाने के लिए और दहेज और भ्रूण हत्या के खिलाफ वो कूदे तो लोग यकीन करेंगे, हिंदू धर्म मे कर्मकांड और आडंबर के खिलाफ लड़े तो लोग जुटेंगे, ब्राह्मणवाद और जातिवाद पर आघात करें तो लोग बीजेपी को वोट देंगे लेकिन अगर दिलचस्पी कंधमाल से ईसाईयों को मार भगाने और गुजरात में मुसलमानों को सबक सिखाने तक ही सीमित होगी तो कैसे हिंदू उनसे जुड़ेगा। आरएसएस को ये समझना होगा कि उसका असल दुश्मन मुसलमान नहीं हिंदू है। ऐसे मे बीजेपी के लिये बेहतर यही होगा कि वो वैद्य की राय मान संघ से नाता तोड़ ले नहीं तो वो आजीवन अठारह से बीस फीसदी की ही पार्टी बनी रहेगी और आडवाणी कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे।














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