लाल कृष्ण आडवाणी का मैं हमेशा ही आलोचक रहा। उस समय भी जब दिल्ली के तमाम पत्रकार उनके साथ अपने परिचय पर इतराया करते थे और उस वक्त भी जब यही पत्रकारी मेंढक उनके संकट में उनको पानी पी पी कर खारिज करते थे। इस दौरान मुझे पता चला कि कुछ पत्रकार कितने अवसरपसंद होते हैं और दिल्ली का राजनीतिक मिजाज कितना निर्मम। लेकिन इस अवसरवादिता और निर्ममता के बीच आडवाणी को लेकर मेरी सोच में रत्ती भर बदलाव नहीं आया। शायद इसलिय़े कि ये आलोचना व्यक्तिगत न हो कर वैचारिक थी। मैंने हमेशा ये माना कि आडवाणी जिस विचारधारा को भारतीय राजनीति में स्थापित करने में जुटे हैं वो देश का नुकसान करेगी, वो एक कौम की विरोधी है और कट्टर राष्ट्रवाद के बावजूद देश को बांटेगी। लेकिन आलोचना की इस दृष्टि के बावजूद मैंने उन्हें कभी नकारा नहीं।
इस नजर से जब भी मैं उन्हें देखता हूं तो लगता है कि आडवाणी प्रधानमंत्री नहीं बन पाये ये मलाल उन्हें ताउम्र रहेगा पर इस वजह से इतिहास में उनको नजरअंदाज कर दिया जाएगा, ये मैं नहीं कह सकता। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी सहजता में अगर आरएसएस की विचारधारा का परिचय देश की विशाल जनता से कराया तो आडवाणी ने उसे जन जन तक ग्रहण योग्य और अंग्रेजीदां इलीट तबके में उसे फैशनेबल बना दिया। यानी हिंदूवाद एक गाली की परिधि से निकल कर जाना पहचाना जुमला हो गया और राजनीतिक विश्लेषण का सशक्त माध्यम। और दिल्ली में तमाम पढ़े-लिखों को अचानक बीजेपी में एक नये सूर्य के दर्शन होने लगे। संघ की भारतीय परंपरा में इस तबके को अपना गौरवशाली इतिहास नजर आने लगा। वैचारिक बैशाखी पर लटके ये वो लोग थे जो कभी वामपंथ का सहारा लिए अंतरराष्ट्रीय क्रांति किया करते थे और जो अव वामपंथ के अस्त होते ही वेद उपनिषदों में स्थानीयता को खोजने लगे थे। दुर्भाग्य या सौभाग्य से इस तबके की सत्ता के गलियारों में चलती खूब है क्योंकि विचारधारा कोई भी हो ये अंग्रेजी खूब बोलते हैं। लिहाजा हिंदूवाद जड़ता के दायरे से निकलकर गतिशील हो गया।
अगर गौर से देखें तो ये सब एक ऐसे दौर में हुआ जब एक सशक्त विकल्प के लिए जमीन काफी पुख्ता हो रही थी। 1986 से ही 415 सांसदों के बावजूद जनता ने इस विकल्प की तलाश शुरू कर दी थी। बीजेपी कभी जनता की इस खोज का स्वाभाविकि विकल्प नहीं थी। वी. पी. सिंह और तीसरे मोर्चे में उसे सहज अपनापन दिखता था। ये अनायास नहीं है कि 1977 में जनमानस के दबाव के आगे जनसंघ को अपनी पहचान जनता पार्टी में विलीन करनी पड़ी थी और 1989 में उसे वी.पी. सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन देने को मजबूर होना पड़ा था। वी.पी. सिंह बिना पार्टी के नेता थे और टुकड़ों-टुकड़ों में बने जनता दल के पास बीजेपी से ज्यादा सांसद थे और बीजेपी जबर्दस्त संगठन और भारी कार्यकर्ताओ के बावजूद वो उभार नहीं पैदा कर पाई कि वाजपेयी या आडवाणी प्रधानमंत्री बन पाएं। ये मत भूलियेगा कि ये वो वक्त था जबकि बीजेपी और संघ परिवार अयोध्या की उग्र लहर पर सवार थे फिर भी 1991 में बीजेपी की नहीं कांग्रेस की अल्पमत सरकार बनी थी और मस्जिद विध्वंस के बाद भी मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बर्खास्त बीजेपी की सरकारें सत्ता मे वापस नहीं आ पाई थीं।
लेकिन तीसरे मोर्चे की बार-बार की धोखेबाजी से आजिज जनता ने आखिरकार बीजेपी में विकल्प देखना शुरू किया। आडवाणी का सबसे बड़ा योगदान ये है कि जब इतिहास ने उन्हें मौका दिया तो वो चूके नहीं और विकल्प की तलाश मे जुटी जनता से बीजेपी के तार को बखूबी जोड़ने का काम किया। ये वो समय था जब कांग्रेस तार-तार हो रही थी और उसका सेकुलर चेहरा भोथरा हो रहा था, नेत्रत्वहीनता चारों तरफ थी, संगठन को नरसिम्हाराव और सीताराम केसरी जैसे घुन कमजोर कर रहे थे ऐसे में आडवाणी ने क्षद्म धर्मनिरपेक्षता बनाम उग्र हिंदूवाद का नारा दिया तो लोग आकर्षित हुए और नेता की तलाश में जुटी कांग्रेस के बरक्स लोगों को अटल-आडवाणी के रूप मे कुशल नेतृत्व दिखा और मजबूत संगठन ने बीजेपी को नई ऊर्जा दी। जब देश पर आर्थिक स्तर पर दिवालिया होने का खतरा मंडरा रहा हो और उसे अपनी साख बचाने के लिये सोना गिरवी रखना पड़े तो आडवाणी का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सशक्त पैकेजिंग और देश को अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाने की कोशिश ने लोगों मे नई उम्मीद जगाई।
बोफोर्स घोटाले ने कांग्रेस के करिश्मे की आभा पहले ही रंगहीन कर दी थी। उस पर जनता ने जब पहली बार नरसिम्हाराव के रूप मे पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री को भष्ट्राचार के आरोप में गिरफ्तार होते देखा तो उसका धैर्य जवाब दे गया। और उसने बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के तौर संसद मे चुना। आडवाणी यहां भी नहीं चूके। उन्होंने बजाय अपना नाम आगे करने के, अटल को प्रधानमंत्री के तौर पर आगे बढ़ाया और लोग जुड़ते चले गए। 1998 में पहली बार सही मायने में गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बना।
लेकिन आडवाणी की सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि वो कभी भी अटल बिहारी वाजपेयी के शैडो से खुद को बाहर नहीं निकाल पाए। शायद उनकी हालत उस राहुल द्रविड़ की थी जो है तो जोरदार बल्लेबाज लेकिन सचिन की छाया में खेलना और सफल होना उनकी नियति बन गई। वाजपेयी का कद इतना बड़ा था कि हमेशा आडवाणी को अपना कद छोटा नजर आया। उसपर ट्रेजडी ये कि अटल को तो आडवाणी मिल गए लेकिन आडवाणी को दूसरा आडवाणी नहीं मिला।
इतिहास मे जाएं तो शायद ऐसा एक उदाहरण सोवियत रूस के इतिहास में लियोन ट्राटस्की का मिलता है। जब तक लेनिन थे ट्राटस्की का कोई सानी नहीं थी लेकिन लेनिन के जाते ही ट्राटस्की की मेधा, ऊर्जा जाती रही और वो स्टालिन नाम के एक निहायत मिडियाकर बोल्शेविक से मात खा गए। जब तक अटल सक्रिय थे आडवाणी का हर वार मास्टर स्ट्रोक था लेकिन अटल के पार्श्व में जाते ही आडवाणी जैसा स्ट्रेटजिस्ट ब्लंडर पर ब्लंडर करता गया जैसा कि ट्राटस्की करते गए। फर्क इतना है कि सोवियत रूस में सत्ता संघर्ष की परिणति ट्राटस्की के देश निकाले से हुई जबकि आडवाणी को सिर्फ पद से बेदखल होना पड़ा। शायद ये दो देशो की संस्कृतियों का अंतर है। लेकिन दोनों ही एक नीच ट्रेजडी के शिकार हुए, दोनों को ही इतिहास कभी नकार नहीं पाएगा लेकिन दोनों को इतिहास में वो मुकाम भी नहीं मिलेगा जिसकी संभावना उनमें थी। दोनों ही अपनी संभावनाओं के अकेलेपन में नितांत अकेले होंगे, खुद अपने पर खीजते हुय़े या फिर अपनी किस्मत को कोसते हुए। दोनों ही परिस्थितियों में दूर बैठा मिडियाकर स्टालिन एक नीच हंसी हसता हुआ इतराता रहेगा।














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