एक बड़ी बात हुई है। शिवसेना ने पहले 'सामना' में लिखा कि वो शाहरुख का विऱोध नहीं करेंगे लेकिन थोड़ी सुबह चढ़ते ही खबर आई कि शिवसेना ने पलटी मार दी। ऐलान हुआ कि वो शाहरुख को माफ नहीं करेगी। यानी वो विरोध करेगी। हैरानी इस बात पर की कि इतना हल्ला काटने के बाद शिवसेना ने विरोध का रास्ता पहले क्यों छोड़ा? और एक बार तय करने के बाद चंद घंटे में ही अपने इस स्टैंड से क्यों पलट गई? ऐसा शिवसेना जैसी कट्टरवादी पार्टियों में होता नहीं है। ऐसी पार्टियों में लोकतंत्र नहीं है। पार्टी सुप्रीमो जो कहे वही आखिरी बात। तो क्या हो गया? सुनने में ये आ रहा है कि पार्टी में दो राय हैं। एक जिसका मानना है कि हर मुद्दे पर इतना रैडिकल और हिंसक होने की जरूरत नहीं। शिवसेना को बदलते समय के मुताबिक बदलना चाहिये। लेकिन दूसरा वही पुराना तबका है जो आज भी शिवसेना का पुराना अंदाज और तेवर बरकरार रखना चाहता है। यानी 1966 की शिवसेना को जस तस का। बिना इस बात को सोचे और समझे की पिछले चौवालिस सालों में देश और महाराष्ट्र और मुंबई कितनी बदल गयी है।
उद्दव ठाकरे ने कमान संभालने के साथ ही शिवसेना मे बदलाव की शुरुआत की। उसने सोचा कि मुंबई सिर्फ मराठियों की है जैसे नारे अब पुराने पड़ गये हैं। उसने 'मी मुंबईकर' का नारा दिया। उद्दव ने शिवसेना को मुंबई ठाणे से बाहर निकालने का कोशिश की, बोला शिवसेना को पूरे महाराष्ट्र की पार्टी उसे बनना होगा अगर वो चाहती है कि प्रदेश में उसकी अपने दम पर सरकार बने। लेकिन कुछ शिवसेना की अंदरूनी जड़ता और कुछ बालासाहेब के बाद के सत्ता संघर्ष की वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और जब राज ठाकरे ने चुनौती दी तो शिवसेना को लगा को मौजूदा जमीन बचाना ही पहली प्राथमिकता हो। राज ने उद्दव के एजेंडे को रोक दिया। वो फिर वही टिक गये जहां से चले थे। राज में आक्रामकता है, करिश्मा है, बाला साहेब का क्लोन लगता है इसलिये तत्काल फायदा वो ले गया लेकिन ये मार्ग छोटा है। ज्यादा चलेगा नहीं। बिल्कुल वैसे ही जैसे कि बीजेपी का कट्टरपंथी चेहरा लोगों को कम पसंद आने लगा है। नतीजा बीजेपी लोकसभा के दो चुनाव हार गई। उनके सबसे बड़े नेताओं की मौजूदगी के बाद भी।
बीजेपी की तरह शिवसेना भी हारी, लगातार तीसरा विधानसभा चुनाव। वो भी उस पार्टी से जिसकी सरकार ने महाराष्ट्र के लिये एक निहायत ही औसत सरकार दी है। ये कहें तो बेहतर होगा कि कांग्रेस एनसीपी के पिछले दस सालों मे महाराष्ट्र पीछे गया है आगे नहीं। तमिलनाड, कर्नाटक और आंध्र प्रेदश जैसे राज्यों ने काफी तेजी से विकास किया है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक तो दुनिया मे आईटी क्रांति के नये मुकाम बन के उभरे। और पूरी दुनिया ने भी उन्हें सलाम किया। एक जमाना था जब महाराष्ट्र हिंदुस्तान का सबसे विकसित और आर्थिक रूप से मजबूत प्रदेश था। लेकिन अब हालात में तब्दीली आ रही है। नये उद्योग आ नही रहे हैं, पुराने खत्म हो रहे हैं। निवेशकों को महाराष्ट्र उतना आकर्षित नहीं करता। और एनरान ने ऐसी मिट्टी पलीद की है कि विदेशी महाराष्ट्र मे कुछ भी करने के पहले दस बार सोचते हैं। महाराष्ट्र पर डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज है। कपड़ा मिल्स पिछले बीस सालों मे ठप्प हो गईं। इन मिल्स में लगे ढाई लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हुये। देश मे सबसे ज्यादा यानी तकरीबन डेढ़ करोड़ शहरी बेरोजगार महाराष्ट्र में है। हर साल करीब पांच लाख नये बेरोजगार महाराष्ट्र में जुट जाते हैं। शिवसेना को सोचना चाहिये वो क्यों ऐसी सरकार से क्यों हारी?
शिवसेना और अंडरवर्ल्ड की वजह से महाराष्ट्र की इमेज ऐसी बनी है कि यहां उद्योग फलफूल नहीं सकते। शिवसेना की यूनियन और उनकी गुंडागर्दी के कारण कौन उद्योगपति अपना पैसा फंसायेगा, कौन रोज ब्लैकमेल होना चाहेगा। यही वजह है कि टाटा भी जब बंगाल से बाहर निकले तो गुजरात गये, महाराष्ट्र नहीं। फिर हिंदुस्तान 1966 में ही नहीं ठहरा हुआ है वो काफी तेजी से बदल रहा है। महाराष्ट्र भी और मुंबई भी बदला है। एक जमाना था जब कि मुंबई मे 32 फीसदी मराठी थे आज माइग्रेशन के कारण ये आंकड़ा घटकर 26 फीसदी रह गया है। अगर 60 के दशक मे दक्षिण भारतीय थोक में मुंबई आते थे तो आज यूपी, बिहार, राजस्थान के लोग पंहुच रहे हैं। आजाद भारत के संविधान ने लोगों को ये आजादी दी है वो कहीं भी जाकर रहें और नौकरी करें। इस वजह से हर शहर और प्रदेश का प्रोफाइल गडमड हो गया है। जब जनसंख्या की संरचना मे बदलाव आयेगा तो पूरे समाज की सोच भी तो बदलेगी। फिर वो कैसे महाराष्ट्र सिर्फ मराठियों के नारे को तरजीह देगा। ये शिवसेना समझना नहीं चाहती।
और सबसे बड़ा बदलाव ये आया है कि हिंदुस्तानी हो या फिर मुंबईकर उसका सामंती परिवेश और संस्कार बदला है। टीवी और उदारवाद की कृपा से उसने अपने होने का अहसास किया है, वो खुली आंखों से दुनिया को देख रहा है और इस खुली हवा में वो देख रहा है कि लोकतांत्रिक मूल्यों से बेहतर और कोई मूल्य नहीं है। उसने खुद को भी देखा और पाया कि वो किसी से कमजोर नहीं है, न किसी प्रदेश से, न किसी देश से, न किसी इंसान से, न किसी मशीन से। इस नये शख्स को अमर्त्य सेन आरगुमेंटेटिव इंडियन कहते हैं। वो जो तर्क के आधार पर चीजों को कसता है। वो जमाना गया जब ये नया भारतीय किसी भी नेता या अभिनेता की बात को आंख मूंदकर मान लेता था। ऐसे मे ये कैसे संभव है कि बाला साहेब ठाकरे पहले की तरह आदेश दें और उसका आंख मूंदकर पालन हो जाये। क्या महज इत्तफाक है कि राहुल को झंडा दिखाने के लिये चार पांच सौ शिवसैनिक ही जुटे। यानी बाला साहेब के हुक्म को भी शिवसेना मानने को तैयार नहीं है। ऐसा क्यों है? ये शिवसेना को समझना होगा।
ये इस बदलाव का नतीजा है कि पार्टी मे सुप्रीमो की बात पर एकमत नहीं है, दो राय हो गयी है। और बालासाहेब और उद्दव को ये समझना होगा कि अगर शिवसेना ने खुद में आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया तो वो खत्म हो जायेगी क्योंकि खुली हवा में सांस लेने की आदत एक बार लग जाये तो फिर कट्टरवादी तानाशाही की जुबान भाती नहीं है।














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