मरने वालों की संख्या सौ के पार है। ये वो लोग थे जो कतई नक्सलियों के दुश्मन नहीं थे। न ही ये वो लोग थे जो नक्सलियों को मारने के लिये ट्रेन में जा रहे थे। न ही ये वो लोग थे जो पुलिस और सीआरपीएफ के मुखबिर थे। इनमें वो भी नहीं थे जो नक्सलियों को विचारधारा के स्तर पर देश और समाज का दुश्मन मानते थे। न ही ये रोज टीवी पर आकर नक्सलियों के सफाये की बात करते थे। और न ही ये वो पूंजीवादी थे जो साम्यवादी विचारधारा के मुताबिक मजदूरों और मजलूमों का खून चूसते हैं। न ही इनमें वो सूदखोर जमींदार थे जो किसानों के कंकाल पर कोड़े बरसाते हुए पूरे परिवार को आत्महत्या के लिये मजबूर कर रहे थे। ये थे बेचारे मासूम हिंदुस्तानी। इनमें से कुछ थे जो गर्मी की छुट्टियों में अपनों से मिलने जा रहे थे। कुछ ऐसे भी गरीब थे जो घर से हजारों किमी दूर रोजी कमाने के लिये मुंबई गये थे और वापस अपने काम पर जा रहे थे। कुछ तो आदिवासी भी थे जो पहली बार घर से बाहर निकले थे और पहली बार ट्रेन में सवार हुए थे। इन सबकी आंखों में एक सपना था। सुंदर सपना। ये सवाल कर रहे हैं। हमें क्यों मार दिया?
ये वो सवाल हैं जो हमें देश का नागरिक होने के नाते इन नक्सलियों से पूछना चाहिये और साथ ही उन लोगों से जो दिल्ली में बैठकर नक्सलियों का गुणगान करते हैं। कहते हैं कि ये वो लोग हैं जो व्यवस्था से नाराज हैं क्योंकि व्यवस्था ने इन्हें भुला दिया, इंसाफ नहीं दिया। और समाज और देश के हाशिये पर डाल दिया। इतने हाशिये पर कि इन्हें हथियार उठाने पर मजबूर होना पड़ा। और शायद इसीलिये देश के आदिवासी इनके साथ हैं। और यही चीज इन्हें पंजाब के खालिस्तानी, कश्मीर के मुजाहिदीनों या फिर अलकायदा के फिदायीनों से अलग करती है। लोग इन्हें अलग नजर से देखते थे। एक, साम्यवादी विचारधारा। दूसरी, गरीब, दबे-कुचले आदिवासियों की वकालत करने के कारण।
इस देश में आजादी के पहले से ही साम्यवादियों की एक बड़ी बौद्धिक फौज मौजूद रही है जिसका देश के बौद्धिक वर्ग पर वर्चस्व रहा है। अखबार हो या फिर कालेज, विश्वविद्यालय या फिर साहित्य-कला, सब जगह इनकी ही तूती बोला करती थी और आज भी है। इसी तबके के दबाव के चलते देश में 1991 तक बाजार व्यवस्था अपने पैर नहीं जमा पायी और पूरी तरह से साम्यवादी और समाजवादी ढांचा नहीं होने के बाद भी सरकारी नीतियों पर इसका असर नजर आया। न समाज ने कभी दक्षिणपंथ को मान्यता दी और न ही सरकार के स्तर पर ये वर्ग कभी हावी हो पाया। ये अलग बात है कि 1991 में देश के आर्थिक हालात ऐसे हो गये कि देश को बाजार की तरफ देखना पड़ा और आज दुनिया में इसी बाजारोन्मुखी व्यवस्था की वजह से देश को भविष्य के सुपर पावर के तौर पर देखा जाता है। ट्रेजडी ये है कि देश की तमाम तरक्की के बाद भी साम्यवादी विचारधारा के ये वाहक आज भी आर्थिक नीतियों से संतुष्ट नहीं हैं। इनकी नजर में बड़ी-बड़ी कंपनियां किसानों-आदिवासियों की जमीन छीन कर उनको बेघर कर रही हैं। उनको उनकी जड़ों से बेदखल कर रही हैं। और अंततः विकास का ये बाजारवादी मॉडल देश को एक ऐसे अंधे कुंए की तरफ ले जायेगा जो हिंदुस्तान को अमेरिकी पूंजीवाद साम्राज्यवाद का दास बना देगा।
इस वर्ग का तर्क है कि नंदीग्राम हो या फिर सिंगूर, पास्को या फिर दादरी का रिलायंस प्लांट हर जगह गरीबों को नजरअंदाज करने और देश के विकास में भागीदारी नहीं देने का नतीजा है कि जगह-जगह जमीन पर किसानों का गुस्सा फूट रहा है और लोग सड़कों पर उतर रहे हैं और हथियार उठाने को तैयार हैं। इस बात में काफी हद तक दम है कि 1991 से विकास के मॉडल में गरीबों, किसानों और गांवों को शुरुआत से नहीं जोड़ा गया। इसलिये शहरों में तो विकास की रेल नजर आती है, लोगों के पास बड़ी-बड़ी कारें आ गईं और बड़े एसी मॉल्स खचाखच भरे दिखते हैं लेकिन गांव और छोटे शहर आज भी उसी तरह से बदबू फैलाते दिखते हैं। मुंबई और दिल्ली इतने बड़े हो गए हैं कि उनके पड़ोस के उपनगर देहात लगने लगे हैं। लेकिन सवाल ये है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्या इस समस्य़ा का निदान सिर्फ हथियार उठाने में है? और इन हथियार उठाने वालों की कारस्तानियों को गांधीवादी बंदूकधारी कह देने से सब कुछ सही और तर्क की कसौटी पर कस जायेगा? ये जो लोग हैं इनसे मेरी सहानुभूति होती अगर ये स्वभाव से लोकतांत्रिक होते, इन्हें इस देश की व्यवस्था में आस्था होती तो पूरी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की वकालत नहीं करते। मेरा सवाल है इन साम्यवादी रैडिकल जीवों से कि झारग्राम की घटना के बाद मैं कैसे यकीन कर लूं कि आम नागरिकों से इनकी कोई दुश्मनी नहीं है, ये सिर्फ राजसत्ता के शत्रु हैं?
इस नक्सलवादी बौद्धिक वर्ग को इस सवाल का जवाब देना चाहिये कि झारग्राम ट्रेन उड़ाने वालों को क्या ये नहीं पता था कि इसमें पुलिस वाले नहीं सवार हैं और उनके हमले से पूंजीवादी सामाज्यवादी व्यवस्था की चूलें नहीं हिलेंगी बल्कि आम आदमी, गरीब मारा जायेगा? लेकिन शायद ये बौद्धिक वर्ग ये कहकर बात को टाल जाये कि 1917 में भी बोल्शेविक क्रांति और उसके पहले चीन में 1949 की माओवादी क्रांति और उसके पहले काफी निर्दोष लोगों की जानें गई थीं क्योंकि क्रांति लहू मांगती है और क्रांतिकारी सपनों में इस तरह की मौतों को नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिये क्योंकि बड़े सपनों की पूर्ति के लिये बलिदान तो देना ही पड़ता है। लेकिन मैं उन लोगों को ये याद दिलाना चाहता हूं कि ये देश रूस और चीन नहीं है और न ही ये देश लेनिन, स्टालिन और माओ का है। ये देश गांधी जी का है, उन गांधी जी का जो साधन और साध्य की पवित्रता की बात किया करते थे और दोनों में सामंज्य नहीं होने पर चौरी चौरा के बाद उफान मारते आंदोलन को वापस ले लिया था, फिर भी वो जननायक बने रहे। क्या ये नक्सली अपनी गलती का प्रायश्चित करेंगे? और इनके तथाकथित समर्थक बुद्धिजीवी देश से माफी मांगेंगे? नहीं वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि ये न तो सही मायनों में क्रांतिकारी हैं और न ही इस देश के मानस को समझते हैं।














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