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आशुतोष
Friday , June 06, 2008 at 16 : 42

ब्रेक के बाद


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इस देश में एक मंत्री हैं जिनको कामधाम कुछ नहीं है। वैसे ज्यादातर मंत्री ऐसे ही हैं। लेकिन इनमें एक खास हैं। नाम बता सकता हूं लेकिन नाम में क्या रखा है। बस मान लीजिए उनका नाम ब है।

इन ब को दिक्कत ये है कि आरुषि कांड में एक आई जी महोदय ने कुछ कह दिया तो ये ब महोदय उनको सस्पेंड कराना चाहते हैं। मंत्री हैं तो कुछ भी कह सकते हैं और कर भी सकते हैं। लेकिन ये अकेले नहीं है। इनके साथ एक भीड़ है । जी हां, भीड़।

इनका भी नाम देकर क्या होगा। कहीं भी मिल जाएंगे। कहीं भी नजर घुमाओ दिखाई पड़ जाएंगे। इनका काम बहुत मुश्किल है। इन लोगों ने समाज की ठेकेदारी ले रखी है । इनकी आदत है कहीं भी फतवा दे देते हैं। हर जगह ये सुकरात के साथ खड़े दिखाई देते हैं।

आप जानते हैं न सुकरात को। वही जो कहा करते थे कि नॉलेज इज वर्चू यानी ज्ञान ही नैतिक है। बेचारे सुकरात तो जहर का प्याला पी स्वर्ग सिधार गए लेकिन इन लोगों को छोड़ गए। ये यानी वो लोग जो खुद को समाज से ऊपर , नैतिकता के शीर्ष पर बैठे पाते हैं। कहीं कुछ भी होगा ये जरूर कहेंगे इनको छोड़ कर बाकी सब लोग गैरजिम्मेदार है, समाज की इन्हें कोई चिंता नहीं, सब कबाड़ कर रहे हैं।

खैर, मैं बात कर रहा था मंत्री जी की और आरुषि हत्याकांड की। किसने मारा, क्यों मारा किसी को नहीं मालूम, लेकिन खेमे जरूर खड़े हो गए हैं।

इस हत्याकांड ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनको न तो ये मंत्री महोदय जानना चाहते हैं और न ही ये सुकरात के पठ्ठे। ये कहानी महज एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। ये इससे कहीं आगे चलकर कई निहायत ही चिंताजनक सवाल खड़े करती है।

सवाल ये नहीं है कि खूनी पंजा कहां से आया, हेमराज पहले मरा या फिर आरुषि, घर में एंट्री फ्रेंडली थी या फिर कातिल ने किसी पेशेवर हत्यारे को सुपारी देकर उसे बुलाया और दोनों को कत्ल करवाया, कत्ल की जानकारी डॉ. तलवार के परिवार वालो को क्यों नहीं हुई? पोस्टमार्टम की रिपोर्ट बदली गई या नहीं और केस से जुड़े जांचकर्ताओं को क्या पैसे दिए गए, मामले को रफादफा करने के लिये या नहीं ?

एक चीज हम शायद भूल जाते है इस पूरे एपिसोड में। आखिर वो नौबत क्यों आई कि एक मासूम सी बच्ची का कत्ल घर के अंदर हो गया। मेरी नजर में सबसे बड़ा सवाल यही है इस पूरे मामले में ।

आरुषि एक निहायत ही मासूम सी दिखने वाली साधारण सी लड़की थी। पढ़ने-लिखने मे बेहद तेज। दोस्तों के बीच काफी लोकप्रिय। उसके कुछ गहरे दोस्त थे। दूसरी तरफ थे उसके माता-पिता। पढ़े-लिखे, पेशे से डाक्टर, पैसे से कमजोर नहीं, ढेरों लोगों के बीच उठना-बैठना, कहने को कह सकते है रसूखदार।

दोनों पति-पत्नी अपने काम में मस्त, इतने मस्त की शायद महानगरीय परिवेश और संस्कृति में ये भूल गए कि उनकी एक बेटी भी है जो उसी सामाजिक परिवेश में धीरे-धीरे बढ़ रही है जिस परिवेश में वो डॉक्टरी करते हुए अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं।

यह लड़की एक बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ती है लेकिन कहीं उसकी जिंदगी में एक खालीपन है । और ये खालीपन उसके मातापिता को दिखती नहीं है क्योंकि महानगरी परिवेश में मां बाप को अकसर अपने बच्चों का ये खालीपन दिखता नही है।

जिस जिंदगी की रेस में वो शामिल हैं उसमे स्पीड बहुत है, महत्वाकांक्षा की ये अंतहीन रेस आपको ऊपर और ऊपर और ऊपर और ऊपर ले जाने को प्रेरित करती है। और इतना प्रेरित करती है कि अगर आप में संयम न हो, बुद्दि और विवेक के पहरेदार साथ न हों तो आप वो सब कुछ पा लेना चाहते है या फिर वो सबकुछ चख लेना चाहते है जो एक सामान्य जन के लिये सिर्फ वर्जित ही नहीं है बल्कि कभी-कभी पाप भी है।

इस अंतहीन रेस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पुराने समाज की तरह या फिर कहें हमारे भदेस गंवई समाज की तरह आस- पास टोकने या फिर कहने के लिये कोई बूढा या फिर बूढ़ी भी नहीं होते हैं।

आप अपनी मायावी दुनिया में मस्त सरपट भागते रहते हैं। न आगे कोई देखने वाला न पीछे कोई पूछने वाला। इसमे बच्चे गौण हो जाते हैं और साथ ही नैतिकता भी कुछ समय के बाद असहाय दिखने लगती है। बेचारी नैतिकता एक निरीह की तरह घर के कोने मे पड़ी बेबस सी ताकती रहती है और पूरा खेल देखती रहती है कर कुछ नहीं पाती, न प्रतिकार न चमत्कार, न अकेले न समूह में।

इस अंतहीन रेस की दूसरी बड़ी खासियत ये है कि इसमे वक्त बिल्कुल नहीं है। न उनके पास जो इस रेस में शिरकत कर रहे हैं और न उनके पास जो दूर से इस दौड़ को देख रहे है। और शायद हम ये चाहते भी नहीं कि कहीं आत्मा की एक वर्जिन जमीन पर वक्त होने का आभास हो। क्योंकि वक्त हुआ तो सोचने का मौका मिल जायेगा और सोचने का मौका मिला तो फिर खुद का चेहरा कैसा दिखेगा ये सोच कर डर लगता है ।

ऐसा हमारे समाज में पहले कभी होता नहीं था। हर घर में कुछ बंदिशें रहती थीं। इन बंदिशों की एक सीमा होती थी। साथ ही, महत्वाकांक्षा की सपाट जमीन पर दौडने का एक नियम भी। और कहीं न कहीं और कभी न कभी कोई बूढ़ा उठ कर कह देता था ये ठीक नहीं है, गलत है बच्चों पर इसका क्या असर होगा , बच्चों पर ध्यान देना जरूरी है।

उनको इग्नोर करके जीवन आगे नहीं चल सकता क्योंकि इन्हीं बच्चों को आपके मूल्यों को आगे ले जाना है, वंश चलाना है। लेकिन नए बदलाव ने ऐसा बोलने वालों को डपट दिया कि ये प्राइवेसी में दखल है और निजता का हनन। हमें क्या करना है और क्या नहीं करना ये कहने का अधिकार किसी को नहीं मां-बाप को भी नहीं।

और ये इस बदलाव का नतीजा है कि रात को अपने बच्चे के कमरे को बाहर से लॉक करने के लिये मजबूर होना पड़ा। कमरे में लगने वाला ये ताला कुछ भी कह सकता है, मां-बाप की निजता की स्वतंत्रता को बचाने की भरपूर कोशिश या फिर बच्ची की निजता लक्ष्मणरेखा को पार न करे उस पर अंकुश लगाने की कोशिश।

दोनों ही स्थितियों मे दोनों की निजताएं एक दूसरे के विरोध में खड़ी नजर आती हैं जबकि होना ये चाहिए कि मां-बाप की निजता और बच्चों की निजता एक दूसरे की पूरक होनी चाहिए। जब दोनों में टकराव की स्थिति होगी तो कत्ल उसका एक स्वाभाविक परिणाम होगा।

ऐसे में उस बेचारे आईजी को गाली देकर या फिर उसको सस्पेंड करा के बालू में सिर दबा देने से काम नहीं चलेगा। ये बात सुकरात की औलादों को समझनी होगी साथ ही मंत्री महोदय को भी कि बहस करनी है कि इस बात पर कि दोनों की निजताएं एक दूसरे के खिलाफ क्यों खड़ी हो गई हैं न कि इस बात पर कि पुलिस ने क्या गलती की या फिर मीडिया ने सीमा कहां लांघी?

शायद हम इस बहस मे नहीं पड़ना चाहते क्योंकि हममें से ज्यादातर खुद भी नए बदलावों की पोखरी में डुबकी लगाए आनंद ले रहे हैं और हमारे घरों में भी दोनों निजताएं एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं।

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आशुतोष के बारे में कुछ और

44 साल के आशुतोष मैनेजिंग एडिटर हैं। IBN7 से जुड़ने से पहले आशुतोष एक प्रमुख खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे। वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे। ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही है। वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं।
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