Monday , August 27, 2012 at 09 : 04

जो डर गया, सो मर गया...


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'एलिमेंटरी, माई डियर वॉटशन'

शरलॉक होम्स का मशहूर डॉयलाग..

कांग्रेस कठिन दौर से गुजर रही है। एक लाख छियासी हजार करोड़ के घोटाले का आरोप, निशाने पर प्रधानमंत्री, संसद ठप। मुलायम सिंह कह रहे हैं कि सरकार का इकबाल खत्म हो गया है। मनमोहन-सोनिया के सामने दो संकट हैं। एक, नेत्तृत्व का संकट। दो, साख का संकट। पिछले दिनों देश कई तरह के संकटों से दो चार हुआ लेकिन एक बार भी ये नहीं लगा कि सरकार या कांग्रेस में एक ऐसा नेता है जो देश को ये विश्वास दिलाए कि डरने की जरूरत नहीं है - 'वो है'। असम का संकट आजादी के बाद की एक बड़ी घटना है। सांप्रदायिक दंगों में सत्तर से ज्यादा लोग मारे गए। पांच लाख लोग बेघर। महीने भर बाद भी हालात काबू में नहीं। नेहरू जी ने जिस भारत की नींव रखी थी वो बुनियाद पिछले एक महीने में हिलती नजर आई। अयोध्या आंदोलन के बाद पहली बार ये लगा कि सांप्रदायिक सौहार्द का तानाबाना, जो भारतीय एकता की प्राणवायू है, वो कहीं टूट रहा है। विभिन्न समुदाय एक दूसरे को शक की निगाह से देख रहे हैं। असम के बोडोलैंड में हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। असम के बाहर पूर्वोत्तर के लोग अपनों से डर के वापस भाग रहे हैं। मुंबई में एक पुलिस कमिश्नर को इसलिये हटा दिया गया कि एक समुदाय के लोगों को लगा कि उसने जानबूझकर भीड़ नियंत्रण करने के लिय़े दूसरे समुदाय की भीड़ पर गोलियां नहीं चलाईं। और राज ठाकरे ने हजारों की भीड़ इकठ्ठा कर दूसरे समुदाय के लोगों को डराने का काम किया। ऐसे वक्त में देश को एक मजबूत नेता की जरूरत हो आई। वो नेता जो समुदायों को ये भरोसा दे सके कि - 'वो है'।

मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी असम जरूर गए लेकिन न तो उनकी 'बोली' से और न ही उनके 'कदम' से लोगों को लगा कि - 'वो है'। एक नेता है जो लोगों में ऊर्जा भर सके,. प्रेरित कर सके। सैकड़ों विभिन्नताओं वाले एक सौ इक्कीस करोड़ के देश को एकसूत्र में बांधने वाली वो शख्सियत नहीं दिखी। ये खतरनाक बात है। हिंदुस्तान अमेरिका नहीं है, न ही यूरोप है, न ही चीन जहां कमोवेश एक ही तरह की संस्कृति के लोग रहते हैं। और जहां जातीय स्तर पर दरारें न के बराबर होती है। हमारे मुल्क में दरारें इस कदर हैं कि एक अखिल भारतीय व्यक्तित्व ही इसे संभाल सकता है। जैसे कभी गांधी जी थे या फिर नेहरू जी या इंदिरा गांधी। और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी। व्यक्तित्व का करिश्मा बड़े से बड़े संकट के समय भी लोगों को आश्ववस्त रखता है।

2004 के बाद अर्थव्यवस्था जब तक अच्छी थी सब बल्ले-बल्ले थे। देश सुचारू रूप से चल रहा था। लेकिन जैसे ही अर्थव्यवस्था को ग्रहण लगा, हालात संभाले नहीं संभल रहे। आर्थिक विकास दर को तेज करने की जरूरत है। नए सुधारों को फौरन लागू करना है लेकिन सरकार में वो कुव्वत नहीं कि वो कड़े कदम उठाए। 2008 में न्यूक्लियर डील के समय मनमोहन सिंह ने हिम्मत दिखाई। जनता ने उनपर भरोसा किया। 2009 में लोगो ने पहले से बड़ा जनसमर्थन दिया। वो मनमोहन सिंह कहीं गुम हो गए हैं। महंगाई बेलगाम है। आर्थिक विकास दर के आठ फीसदी से घटकर पांच फीसदी पर अटकने वाली है। सरकार लकवे का शिकार है। फैसले होने बंद हो गए हैं।

2010 में देश ने सीडब्ल्यूजी घोटाला देखा। 2011 में एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ का टूजी घोटाला सुर्खियों में रहा। अब एक लाख छियासी हजार करो़ड़ का कोयला घोटाला। सरकार ने टूजी पर कहा 'एक भी पैसे का नुकसान नहीं हुआ'। लोगों ने यकीन नहीं किया। अन्ना के नेतृत्व में लोग सड़कों पर उतरे। सरकार फिर कह रही है कोयला में सरकारी खजाने की कोई लूट नहीं हुई। टूजी में कैबिनेट मंत्री जेल गये। एक निहायत ताकतवर नेता की बेटी को जेल जाना पड़ा। कई आला अफसर और कई बड़ी कंपनियों के प्रमोटर और सीइओ को सलाखों के पीछे एड़ियां रगडनी पड़ीं। क्या फिर वही कहानी दोहराई जाएगी? लोगों को पहले भी य़कीन नहीं था और आज भी सरकार के दावे पर यकीन नहीं है। सरकार की साख कहां है?

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की छीछालेदर की। कैग ने सरकार की धज्जियां उड़ा दीं। यूपी चुनाव में चुनाव आयोग को कैबिनेट मंत्री के खिलाफ कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति से दर्ख्वास्त करनी पड़ी। सरकार के सहयोगी दल चाहे ममता हो या फिर मुलायम हर कदम का विरोध कर रहे हैं। सिविल सोसायटी के नेतृत्व में रामलीला मैदान पर देश ने आजादी के बाद के सबसे बड़े सरकारी विरोधी जनउभार को देखा। पंजाब चुनाव कांग्रेस हार गई। गोवा में मुंह की खानी पड़ी। केरल और उत्तराखंड उसे बड़ी आसानी से जीतना था, किसी तरह गिरते पड़ते सरकार बना सके। सरकार के मंत्री प्रधानमंत्री की सुनते नहीं। उन्हें बजट पेश करते ही रेल मंत्री को हटाना पड़ता है। और उन मुकुल राय को रेल मंत्री बनाना पड़ता है जिसने खुलेआम असम में रेल हादसे के बाद प्रधानमंत्री का आदेश मानने से इंकार कर दिया था। ऐसे में मुलायम कहें कि सरकार का इकबाल नहीं है तो हैरान कोई नहीं है।

सरकार की सत्ता सिर्फ संसद में नंबरों का खेल नहीं है। नंबर तो राजीव गांधी के पास भी 415 थे लेकिन एक बार बोफोर्स का गोला लगा कि सरकार लंगड़ी हो गई। शासन करने का नैतिक बल हवा हो गया। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे लेकिन वीपी सिंह लोगों के दिल में बसते थे। आज भी सरकार के पास भले ही बहुमत का आंकड़ा हो लेकिन नैतिक बल कहां है? मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी मानें या न मानें सत्ता नैतिक बल से चलती है। वर्ना वो घिसटती है। आज सरकार खुशकिस्मत है कि विपक्ष में वीपी सिंह नहीं हैं। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि सरकार में कोई राजीव गांधी भी नहीं है। ऐसे में सरकार और कांग्रेस को चाहिए कि वो 2014 का इंतजार न करे। वो चुनावों की डायलिसिस पर चढ़कर अपने रक्त को दुरुस्त करे। और अगर उसे यकीन है कि घोटाला नहीं हुआ, विपक्ष खामखां मुद्दा बना रहा है, सिविल सोसायटी झूठ बोल रही है तो फौरन मध्यावधि चुनाव कराए। शासन करने का नैतिक बल नए सिरे से हासिल करे, प्रशासनिक लकवेपन को दूर करे, देश को लगे कि देश में कोई सरकार है, कोई नेता है जिस पर भरोसा किया जा सकता है। लेकिन वो करेगी मुझे यकीन नहीं है? नेपोलियन बोनापार्ट कह गया है 'जो ये सोचकर भयभीत रहता है कि वो कहीं हार न जाए वो निश्चित रूप से हार जाता है'। 'एलिमेंटरी, माई डियर मनमोहन सिंह'।

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