आशुतोष
Monday , November 26, 2012 at 08 : 30

कैग और सुलगते सवाल


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टीवी पत्रकारिता में नया-नया आया था। पहले दिन ही भेज दिया गया, टी एन शेषन को कवर करने। उन दिनों सत्ता पक्ष उनका नाम सुनते वैसे ही बिदकता था जैसे आज विनोद राय का नाम लेने पर। शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। उन दिनों चुनाव के दौरान बूथों की लूट, मतपेटियों की डकैती, मतपत्र फाड़ना, उम्मीदवारों के साथ मारपीट, पिछड़ों को वोट देने से रोकना , एक ही आदमी का कई वोट देना, दबंगों की हिंसा और दर्जनों लोगों का मरना आम था। शेषन ने आते ही खास अंदाज में चुनाव की गंदगी पर रोक लगाने की कोशिश की। शेषन को तानाशाह कहा जाने लगा, बददिमाग और बदजुबान। ऐसे में जब मैंने उनसे सवाल पूछा तो उन्होने छूटते ही कहा, 'आई डोंट गिव ए डैम'।

पर तमाम हंगामे के बीच विनोद राय के मुंह से ये शब्द अभी तक नहीं निकले हैं। पहली बार विनोद राय खबरों में तब आये जब कैग ने लिखा कि 2 जी में सरकार के खजाने को 57 हजार करोड़ से लेकर 1.76 लाख करोड़ रुपये तक का चूना लगा। सरकार के लिए बचाव करना मुश्किल हो गया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सरकार कहती रही कि 2 जी में सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ, कैग का आंकड़ा महज एक अनुमान है और अनुमान के आधार पर घोटाले का आरोप गलत। पर किसी ने नहीं सुनी। कैग की एक और रिपोर्ट आई। कोयला खदानों की नीलामी पर। इस बार आंकड़ा 1.86 लाख को छू गया। अब सरकार के लिये करो या मरो की स्थिति थी। सरकार और कांग्रेस ने हुंकार भरी। कैग पर ताबड़तोड़ हमले होने लगे। तीन चीजें एक के बाद एक हुईं। एक, हाल की नीलामी के बाद कहा गया कि स्पैक्ट्रम को मिली कम कीमत इस बात का सबूत है कि कैग की 1.76 लाख करोड़ की बात मनगढ़ंत थी। दो, प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री वी नारायणसामी ने इशारा किया कि सरकार कैग को एक सदस्यीय की जगह बहुसदस्यीय बनाने की सोच रही है। तीन, कैग के पूर्व महानिदेशक आर पी सिंह का बयान कि वो कैग की रिपोर्ट से इत्तफाक नहीं रखते और कैग के अधिकारियों ने पीएसी चेयरमैन मुरली मनोहर जोशी को रिपोर्ट बनाने में मदद की।

खासतौर पर पहले और तीसरे वाकये ने माहौल काफी गरम कर दिया। दो चीजों की तरफ साफ इशारा किया गया। एक, कैग ने मनमोहन सरकार को अस्थिर करने के लिये 2 जी मामले में घाटे का बढ़ा-चढ़ा कर आंकलन किया। दो, और ये सब हुआ बीजेपी के इशारे पर। हालांकि ये आरोप दिग्विजय सिंह और दूसरे मंत्री पहले ही लगा चुके हैं कि विनोद राय पूर्व कैग टी एन चतुर्वेदी की तरह ही राजनीति कर रहे हैं। बोफोर्स मामले में कैग चतुर्वेदी की रिपोर्ट पर 80 के दशक में कांग्रेस सरकार की भारी किरकिरी हुय़ी थी। चतुर्वेदी बाद में बीजेपी से सांसद बने। यानी विनोद राय का एक राजनीतिक एजेंडा है, और वो विपक्ष के कहने पर कर रहे हैं। समस्या यहां है। संवैधानिक संस्थाओं से सरकार और राजनीतिक दलों की नोंकझोंक नई नहीं है। लेकिन संवैधानिक संस्था पर साजिश करने और किसी राजनीतिक दल के इशारे पर राजनीति करने का आरोप संवैधानिक संस्था की साख पर सवाल खड़े करती है?

ऐसे में ये बुनियादी सवाल उठाना लाजिमी है कि आपत्ति है किस बात पर है? कैग की घाटे की संख्या पर है या इस बात पर कि 2 जी को खामखां घोटाले का नाम दिया गया? या फिर अनुमानित आंकड़े की आड़ में ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि जब घोटाला हुआ ही नहीं तब कैग घोटाले की ओर इशारा कर सरकार की साख पर बट्टा क्यों लगा रहा है? हकीकत ये है कि अगर घोटाला नहीं होता और घोटाले का नाम कैग देता तो ये वाकई बहुत गंभीर बात होती है। लेकिन कैग के सबसे कटु आलोचक भी नहीं कह सकते कि 2 जी में घोटाला नहीं हुआ। पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है। और सुप्रीम कोर्ट सारे 122 लाइसेंस रद्द कर चुका है। 20 फरवरी 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले मे लिखा, '2 जी स्पैक्ट्रम बंटवारे का मामला असंवैधानिक और मनमाना है। ए राजा जनता के पैसों पर कुछ कंपनियों को फाय़दा पहुंचाना चाहते थे।' टेलीकाम मंत्री राजा को टेलीकाम सेक्रेटरी बेहुरा के साथ सलाखों के पीछे जाना पड़ा। निजी कंपनियों के आला अधिकारी भी जेल मे एड़ियां रगड़ने को मजबूर हुए। यानी घोटाले पर तो सुप्रीम कोर्ट भी मुहर लगा चुका है।

फिर उस वक्त के कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर भी तो यही कह रहे हैं। 18 अक्टूबर 2012 को जेपीसी के सामने चंद्रशेखर ने कहा कि उन्होने स्पैक्ट्रम आवंटन के लिये 'एंट्री-फी' तय राशि 1658 करोड़ की जगह 21 गुना ज्यादा 35000 करोड़ रुपये की सिफारिश की थी। उनके मुताबिक अगर 'एंट्री-फी' को बदल दिया जाता तो सरकार के खजाने में कहीं ज्यादा पैसा पहुंचता। चंद्रशेखर ने जेपीसी के सामने कबूला कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनकी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया। ये चिट्ठी स्पैक्ट्रम आवंटन के पांच हफ्ते पहले लिखी गई थी। अगर चंद्रशेखर की बात को मानकर 35000 करोड़ की एंट्री फी पर स्पैक्ट्रम बेचा जाता तो कितना पैसा खजाने में आता समझा जा सकता है। कैबिनेट सेक्रेटरी के अलावा उस वक्त के वित्त सचिव डी सुब्बाराव ने भी 22 नवंबर 2007 को पत्र लिखकर 2001 की कीमत पर 2 जी स्पैक्ट्रम बेचने पर आपत्ति दर्ज कराई थी। यानी कुछ तो कारण रहा होगा कि कैबिनेट सचिव और वित्त सचिव की आपत्तियों को भी दरकिनार कर के राजा को मनमाना करने दिया। और इसीलिए ही तो 2 जी घोटाले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गठबंधन राजनीति का रोना रोया था।

यानी घोटाला हुआ। और असल मसला भी ये घोटाला ही है। घोटाला चाहे एक रुपए का हो या फिर 1.76 लाख करोड़ का, भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार है। बहस उस पर होनी चाहिए। आंकड़ों पर बहस मूल मुद्दे को भटकाने की कोशिश है। ये न भूलें कि सरकारे तो आती है, और चली जाती है। संस्थाएं स्थाई होती हैं। पर अगर किसी भी संवैधानिक संस्था की साख को चोट पहुंचती है तो लोकतंत्र को घाव लगते हैं। मेरा मानना साफ है कि कैग से आज भले ही सत्ता पक्ष सहमत न हो और कफन घोटाले में कैग की रिपोर्ट पर कैग को 'बेवकूफ' बताने वाली बीजेपी बम बम, कैग पर सवाल खड़े करना सही नहीं है। वक्त बदल रहा है। संवैधानिक संस्थाओं को अपनी ताकत का अंदाजा होने लगा है। वो पहले की तरह केंद्र सरकार के सामने दबी नहीं रहना चाहतीं। कैग का भी 90 के दशक की तरह चुनाव आयोगीकरण हो गया है। और हो सकता है कि आना वाला समय विनोद राय को वैसे ही याद रखे जैसे-जैसे आज शेषन को।

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आशुतोष के बारे में कुछ और

आशुतोष आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। वह IBN7 में मैनेजिंग एडिटर के पद पर रह चुके हैं। आईबीएन7 से जुड़ने से पहले आशुतोष एक प्रमुख खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे। वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे। ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही। वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं।
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