आशुतोष
Monday , December 17, 2012 at 08 : 23

20 दिसंबर और देश की अग्निपरीक्षा


0IBNKhabar

20 दिसंबर भारतीय इतिहास में एक बड़ी घटना का गवाह होने जा रहा है। इस दिन गुजरात के चुनावी नतीजे आएंगे। गुजरात चुनाव नरेंद्र मोदी की वजह से ऐतिहासिक हो गया है। मोदी की जगह कोई और होता तो ये सवाल उतना महत्वपूर्ण नहीं होता। मोदी का सपना देश के लोकतंत्र से सीधे जुड़ा है। सवाल ये है कि जिस शख्स पर दो समुदायों के बीच सौहार्द बिगाड़ने का आरोप हो क्या उसे देश का प्रधानमंत्री होना चाहिये? ये सही है कि देश में लोकतंत्र की प्रक्रिया से निकले हुए हर शख्स को प्रधानमंत्री बनने का हक है और इस प्रक्रिया में अपने को आजमाने और सपना देखने का भी हक है। मोदी की जीत या फिर उनकी जीत का अंतर या फिर हार और हार का अंतर ये तय करेगा कि देश की राजनीति और बीजेपी में उनकी भूमिका कितनी बड़ी या छोटी होगी?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी आज की तारीख में बीजेपी के सबसे बड़े नेता हैं। आडवाणी की मौजूदगी भी इस दावे को झुठला नहीं सकती। कभी पार्टी में आडवाणी की बात पत्थर की लकीर होती थी लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान, मुरली मनोहर जोशी और नरेंद्र मोदी उस कतार में हैं जो आडवाणी और वाजपेयी की खाली की गई जगह को भर सकते हैं। मोदी इस कतार में फिलहाल सबसे आगे लगते हैं। वो ईमानदार हैं। उनकी प्रशासनिक क्षमता असंदिग्ध है। गुजरात में विकास के लिए उनकी गिनती देश के काबिल मुख्यमंत्रियों में होती है। उनके करिश्माई व्यक्तित्व को उनके आलोचक भी नकार नहीं सकते। उनके नाम पर बीजेपी के कार्यकर्ता जोश से भर जाते हैं। और सबसे बड़ी बात आरएसएस और बीजेपी जिस विचारधारा से ऊर्जा पाती है मोदी उसके सबसे बड़े प्रतीक पुरुष हैं। मोदी ने इस विचारधारा को नया आयाम दिया है। उन्होंने बीजेपी के 'हिंदुत्व' को 'विकास' से जोड़कर नया मॉडल पेश करने की कोशिश की है। वो निर्णायक हैं। वो कमजोर न तो दिखते हैं और न ही कोई भी उनको कमजोर मानने की गलती कर सकता है। सोशल मीडिया में उनके नाम का गुणगान करने वालों की भारी भीड़ है। वो बीजेपी के अकेले नेता हैं जिनकी चर्चा विदेशी पत्र पत्रिकाओं में होती है। ऐसे में वो बीजेपी के लिए प्रधानमंत्री पद के 'आदर्श' उम्मीदवार हैं। लेकिन उनको लेकर एक दिक्कत है। तमाम खूबियों के बावजूद 'सांप्रदायिक' छवि उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। और जो भारतीय संविधान सेकुलरिज्म की दुहाई देता है वो एक ऐसे व्यक्ति को कैसे स्वीकार कर सकता है जिसे भारतीय संविधान के मुताबिक 'सेकुलर' नहीं कहा जा सकता है?

मोदी विरोधी कहते हैं कि 'सेकुलरिजम' की बहस तो बाद में होगी पहले बीजेपी ये तो तय कर ले कि मोदी पार्टी में ही सर्वस्वीकृत हैं। ये सही है कि तमाम गुणों के बाद भी मोदी के नाम पर बीजेपी में आम सहमति नहीं है। खुद आरएसएस में दो राय है और आरएसएस में ये बहस है कि कि 'सांगठनिक अनुशासन' और 'अनुशासनिक विनम्रता' की कसौटी पर वो खरे नहीं उतरते। पिछले दिनों आरएसएस के एक बड़े नेता से मुलाकात हुई। उनसे मोदी और बीजेपी के बड़े नेताओं के बारे में बात हुई। ये नेता मोदी के समर्थक हैं। उनका साफ कहना था कि आडवाणी-वाजपेयी और आज के बीजेपी के बड़े नेताओं में बड़ा फर्क है। उन्होंने कहा कि वाजपेय़ी और आडवाणी न केवल काबिल और बड़े नेता थे बल्कि वो बड़े इंसान भी थे। उनके मुताबिक बीजेपी के मौजूदा नेता प्रतिभा के लिहाज से किसी भी बडे नेता से कम नहीं हैं लेकिन उनमे 'प्रतिबद्धता' का अभाव है। वो अपने को पार्टी से बड़ा मानने लगे हैं। और उनकी नजर में संगठन और विचारधारा से बड़ा है खुद का कैरियर। ऐसे में वो नेता तो बड़े हैं लेकिन इंसान के तौर पर छोटे।

उन्होंने साफ कहा कि वाजपेयी जी का कद बीजेपी से बड़ा था। उनकी वजह से बीजेपी को फायदा हुआ और बीजेपी के विस्तार में मदद मिली लेकिन वाजपेयी में कभी भी ये भाव नहीं आया कि वो संगठन से ऊपर हैं और संगठन के छोटे से छोटे कार्यकर्ता को उनसे बात करने में हिचक नहीं होती थी लेकिन ये बात आज के नेताओं के बारे में नहीं कही जा सकती। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री बनने के पहले और बाद में वाजपेयी पर कई तरह के हमले संगठन के स्तर पर हुए लेकिन उन्होंने कभी भी संगठन के खिलाफ काम नहीं किया। इस संदर्भ में गुजरात का जिक्र आया और मैंने उनको जब बताया कि कैसे गुजरात में विश्व हिंदू परिषद और भारतीय किसान संघ को कमजोर करने की कोशिश मोदी ने की तो उन्होंने मेरी बात से नाइत्तफाकी नहीं की। आरएसएस का साफ मानना है कि गुजरात में बीजेपी सत्ता में आयी ही अपने सहयोगी संगठनों की वजह से। विश्व हिंदू परिषद और किसान संघ का संगठन बीजेपी से कहीं ज्यादा बड़ा था और केशु भाई और मोदी की सरकार बनवाने में इन संगठनों की भूमिका कहीं ज्यादा बड़ी थी। लेकिन मोदी के समय इन संगठनों के साथ 'शत्रु' की तरह बर्ताव किया गया। खुद बीजेपी के अंदर गुजरात के सारे बड़े नेताओं को हाशिये पर पहुंचा दिया गया। आज गुजरात में बीजेपी की सरकार नहीं मोदी की सरकार है और बीजेपी मोदी का जेबी संगठन। इस बार के चुनावी पोस्टर इस बात की तस्दीक करते हैं। पोस्टर पर सिर्फ मोदी ही मोदी। किसी और नेता की कहीं कोई तस्वीर नहीं दिखी। ये 'व्यक्तिवाद' संघ को अखरता है और मोदी को आरएसएस की मौलिक विचारधारा के विपरीत खड़ा करता है।

ऐसे में सवाल फिर वही घूम कर आ जाता है कि मोदी की जीत क्या बीजेपी की जीत होगी या फिर सिर्फ मोदी नाम के एक व्यक्ति की जो बीजेपी का सदस्य है? मोदी अगर 117 या इससे ज्यादा सीटे लेकर आते हैं तो फिर बीजेपी में उन्हें कोई नहीं रोक पायेगा और वहीं 2014 में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे। पर अगर सीटें घटकर 100 या इसके आसपास सिमट गईं तो मोदी के लिये राष्ट्रीय राजनीति का सपना दूर का सपना हो सकता है। मोदी नाम के धूमकेतु का मिथ भी खत्म हो सकता है और बीजेपी में अभी मोदी के ताप से दबे सहमे नेता शेर की तरह गुर्राने लग सकते हैं। ऐसे में 20 तारीख ये तय तो करेगी कि देश के अंदर अगली राजनीतिक लड़ाई मोदी बनाम राहुल की नहीं बल्कि 'सेकुलरिज्म' बनाम 'हिंदुत्व' की वैचारिक लड़ाई होगी य़ा फिर 'लेफ्टवादी-बाजारवाद' या फिर 'दक्षिणवादी-बाजारवाद' के बीच होगी। मोदी की बड़ी जीत पहले संघर्ष का औपचारिक ऐलान होगा और मोदी की महज जीत या फिर हार दूसरी लड़ाई की शुरुआत। तय 20 दिसंबर को होगा।

IBN7IBN7

Previous Comments

IBN7IBN7
IBN7IBN7

आशुतोष के बारे में कुछ और

आशुतोष आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। वह IBN7 में मैनेजिंग एडिटर के पद पर रह चुके हैं। आईबीएन7 से जुड़ने से पहले आशुतोष एक प्रमुख खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे। वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे। ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही। वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं।
IBN7IBN7

IBN7IBN7

पिछली पोस्ट

आर्काइव्स

IBN7IBN7