Monday , January 07, 2013 at 08 : 20

माओ के देश में क्रांति का मैक्डोनाल्डीकरण


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बीजिंग एयरपोर्ट पर उतरते ही बताया गया कि बाहर का तापमान माइनस नौ डिग्री है। हम दिल्लीवासियों को ठंड का अंदाजा तो है लेकिन इतनी ठंडक सुनकर सिहर गया। खैर, जैसे-तैसे होटल आया। कपडे़ बदले। कुछ खाने के लिए बाहर निकला। होटल के बगल में मर्सिडीज का शोरूम। उसके बगल में रॉल्स रॉयस का शोरूम। पड़ोस में फरारी का और फिर एस्टन मार्टिन, बीएमडब्ल्य़ू और न जाने कितनी निहायत महंगी गाड़ियों के शोरूम। सारे के सारे आधे किमी के रेंज में। और पूरे शहर में इस तरह के कई शोरूम। थोड़ी दूर चला तो फिर चौंका। गुच्ची, शनेल, जारा, गैप, जैसे पश्चिमी कपड़ों के विश्व प्रसिद्ध ब्रैंड के छोटे-छोटे नहीं बहुत बड़े-बड़े स्टोर। गाड़ियों की ही तरह इन ब्रैंडों के हिंदुस्तान की तरह एक दो नहीं, दर्जनों स्टोर। थोड़ी दूर और चला तो नए उम्र के लड़के-लड़कियों के हाथ में आईफोन या फिर इसी तरह के दूसरे महंगे फोन। रेस्त्रां और मेट्रो में शायद ही कोई हाथ हो जिसके पास इस तरह का महंगा फोन न हो। सब के सब इन फोनों या फिर आईपैड या टैबलेट में आंख गड़ाये अपनी ही दुनिया में मशगूल। ऐसा लगा मानो बीजिंग 'फोन-हिप्नोटाइज्ड' हो गया हो।

बीजिंग से शंघाई आया। कपड़ों के बड़े-बड़े ब्रैंड्स के और बड़े-बडे़ स्टोर। खासतौर पर ईस्ट नानजिंग रोड और वेस्ट नानजिंग रोड के दोनों ओर। एक जगह पर लुई वितां का एक स्टोर शाम के वक्त दिखा। पूरी इमारत लुई वितां के नाम। और हर दो मिनट में पूरी इमारत का रंग बदल जाता था। कभी लाल तो कभी नीला और कभी हल्का आसमानी। बड़ी देर तक इस नजारे को देखता रहा। वेस्ट नानजिंग रोड से बुंड तक पैदल चलते हुए एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि मैं चीन के किसी शहर में हूं। यूरोप और अमेरिका की तर्ज पर बनी इमारतें। उतनी ही बड़ी और उतनी ही आलीशान। रात की रोशनी में वैसे ही चमचमाती हुईं। अंदर इन स्टोर्स को संभालते युवा चीनी चेहरे। और हर चीज को खरीद लेने की होड़। चीन के बारे में सुना था कि वहां का खाना जरा संभल कर आजमाना चाहिए। पर अब ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। हर दो सौ मीटर पर कोई न कोई पश्चिमी खानपान का बड़ा रेस्त्रां दिख जाएगा। मैकडोनाल्ड और केएफसी की भरमार है। पिज्जा हट भी है और सबवे का ताजा सैंडविच भी। स्टार बक की कॉफी भी। शंघाई ने तो बाकायदा 'फ्रेंच-कनसेशन' को भी सहेज कर रखा है (वो इलाका जहां कभी फ्रांसीसी 18वीं शताब्दी में रहा करते थे)। और मजे की बात ये है कि इस इलाके में ही 1921 में कम्युनिस्ट पार्टी की पहली बैठक हुई थी। इस इमारत के आसपास घूमते हुए सोचता रहा कि क्या माओ त्से तुंग ने इसी के लिए 1949 में मार्क्सवादी क्रांति की थी? और अगर आज माओ जिंदा होते तो क्या तब भी चीन में यही सब देखने को मिलता। शायद नहीं। माओ के जमाने में चीन ने हमेशा पश्चिम का और उसकी पूंजीवादी विचारधारा का विरोध किया। उसको उखाड़ फेंकने की जुगत भिड़ाता रहा था।

चीन के पुराने लोगों का कहना है कि शंघाई और बीजिंग आज से बीस साल पहले ऐसे नहीं थे। न इतनी ऊंची इमारतें थीं और न ही पश्चिमी सभ्यता के इतने लब्ध प्रतिष्ठित निशान। चीन माओ के जमाने में मूलतः एक कृषि प्रधान देश था। जो साम्यवादी तरह से विकास करने की कोशिश कर रहा था। माओ के समय में बाजार व्यवस्था नहीं थी। निजीकरण की इजाजत नहीं थी। लेकिन तब चीन में समृद्धि भी नहीं थी। काफी बड़ा हिस्सा कभी भुखमरी और कभी अकाल का शिकार होता था। पचास और साठ के दशक में माओ की सनक और प्रयोगवाद के चलते करोड़ों लोग मारे गए। उनके साथी देंग जियाओं पेंग ने चीन को माओ की मौत के बाद नई दिशा दी। पूंजीवादी व्यवस्था अपनाई। चीन ने दशकों के बाद सामाजिक स्थिरता देखी और सड़कों और कस्बों में लोगों ने समृद्धि का स्वाद चखा। लोग आज भी कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकारवादी शासन में रह रहे हैं लेकिन आज लोगों के चेहरे पर दहशत नहीं दिखती। लोग खुश हैं। मजे में जिंदगी काट रहे हैं। वो आर्थिक आजादी को 'इंज्वाय' कर रहे हैं। उनके लिए आईफोन बात करने का औजार नहीं है, वो उनकी आर्थिक स्वतंत्रता का जीता जागता प्रमाण है।

लोगों को इस बात की बिलकुल परवाह नहीं है कि वो क्या पहन रहे हैं। और न ही इस बात की, कि कहीं दूर बैठा उन्हें कोई देख रहा है। हालांकि आज भी चीन में राजनीतिक मामलों पर बोलने की आजादी नहीं है। लेकिन शायद लोगों को अभी उसकी जरूरत भी नहीं है। वो नई खुशहाली का पूरा मजा ले लेना चाहते हैं और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी समाज से एक अघोषित समझौता कर रखा है। तुम हमें शासन करने दो और हम तुम्हें खुशहाल करते जाएंगे। उसने लोगों को ये सपना दिखा रखा है कि वो दिन दूर नहीं जब चीन अमेरिका को पीछे छोड़ देगा और चीन दुनिया का सबसे विकसित, सबसे ताकतवर मुल्क हो जाएगा जैसे वो मिंग राजाओं के जमाने में था और तब चीन को 'मिडिल-किंगडम' कहा जाता था यानी विश्व का केंद्र। ये सपना सुनहरा है लेकिन आम चीन की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं। तमाम अर्थशास्त्री ये कहते थकते नहीं कि जल्द ही चीन अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। लेकिन नानजिंग जैसे छोटे शहर की सड़कों पर घूमते हुए मुझे ये सवाल थोड़ा अटपटा लगा। क्योंकि वहां जिधर नजर जाती मुझे मैक्डोनाल्ड का बर्गर दिखाई पड़ता था।

अमेरिका किसी अर्थव्यवस्था का नाम नहीं है। वो एक सभ्यता का नाम है। कोका कोला, ली वीइज और मैक्डोनाल्ड उसके सबसे अहम निशान हैं। चीन ने पिछले दिनों निश्चित रूप से 'हार्ड-पावर' में अमेरिका से बराबरी करने की कोशिश की है लेकिन अमेरिका की ताकत आज उसकी 'सॉफ्ट-पावर' है। 'सॉफ्ट-पावर' यानी जोसेफ नाई के शब्दों में 'अमेरिका की वो 'मूल्य-व्यवस्था' जिसकी नकल करने के लिए आज पूरी दुनिया उतावली है। बिना किसी अमेरिकी जोर-जबर्दस्ती के। बिना किसी अमेरिकी लालच के। 'शंघाई और बीजिंग के रेस्त्रां में मैक्डोनाल्ड के 'मैक-बर्गर' और 'मैक-काफी' का मजा लेते लोग, मेट्रो में आईफोन में अपनी नई दुनिया खोजते लोग और यूनिवर्सिटी और सड़कों पर 'ली-वाइज' की जींस में मटरगस्ती करते लोग, दरअसल जाने-अनजाने अमेरिकी सभ्यता को अपने जीवन में उतारने की कोशिश कर रहे हैं। या फिर नियाल फर्गुसन की भाषा में कहें ये उस विचारधारा की अजीब विडंबना है कि जिस विचारधारा ने पूरी दुनिया को अनंत चुनाव का मौका दिया वो पूरी मानवता को एक जैसा करने और दिखने में कामयाब रहा। तो क्या कहें चीन 'ग्लोबलाइजेशन' की प्रक्रिया का हिस्सा हो गया या फिर अमेरिकी 'सॉफ्ट-पावर' का शिकार?

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