आशुतोष
Monday , February 25, 2013 at 10 : 18

हर नेता में बैठा है एक आत्मघाती दस्ता


0IBNKhabar

एक और आतंकी धमाका, कुछ और लोगों की मौत, सुरक्षा एजेंसियों की एक और जांच पड़ताल, राजनेताओं में एक और हड़कंप, टीवी स्टूडियो में वही तीखे सवाल, आम लोगों की वही चिंता और अगले दिन सबकुछ शांत। आतंकवाद से लड़ने का ये भारतीय तरीका है। थोड़ी सी चिंता, थो़ड़ी सी शिकायत। गोया आतंकवाद न हुआ प्रेम का मनुहार हो। हर ब्लास्ट के बाद हम कुछ नहीं सीखते। हैदराबाद धमाके के बाद भी सब कुछ वैसे ही। सवाल वही कि आतंकवाद से लड़ने की तैयारी हम क्यों नहीं करते? क्या हम कायर कौम हैं? क्या हममें आतंकवाद का मुकाबला करने की हिम्मत नहीं है? या हमारे पास संसाधन नहीं हैं? हमारे पास ताकत भी है और टैलेंट भी। साधन भी हैं और हौसला भी। नहीं है तो हमारे हुक्मरानों में इच्छाशक्ति, राजनेताओं में दूरदृष्टि और उनका लिजलिजापन। कंधार के बाद करगिल हुआ, हमने सबक नहीं सीखा। संसद हमले के बाद 26/11 हुआ, हमने कुछ नहीं किया। नेताओं को कदम उठाना चाहिये था लेकिन दोष पुलिस व्यवस्था, खुफिया एजेंसिय़ों पर डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए देश को उसी तरह से सड़कों पर उतरना पड़ेगा जिस तरह से दिल्ली गैंगरेप के बाद पूरे देश में गुस्सा उबला और सरकार को दो महीने के अंदर कानून बनाने लिए मजबूर कर दिया।

ये नेताओं का लिजलिजापन ही तो है कि करगिल के बाद बनी कमेटी के सुझाव ठंडे बस्ते में आज भी सड़ रहे हैं। संसद पर हमले के बाद फिर ये सवाल उठे लेकिन कान में जूं तक नहीं रेंगी। 26/11 के बाद जरूर सरकार हिली। और कुछ कदम उठाए भी गए। एनआईए का गठन हुआ। लेकिन खुफिया एजेंसियों को एक सूत्र में बांधने और एक छत के नीचे लाने का प्रयास आगे नहीं बढ़ पाया। और एनसीटीसी नहीं बन पाया। कभी बीजेपी के नरेंद्र मोदी को आपत्ति तो कभी बिहार के नीतीश कुमार को। कभी असम में कांग्रेस के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई आपत्ति करते हैं तो कभी ममता बनर्जी का अलग राग। एनसीटीसी के गठन में तेजी आनी चाहिए लेकिन उसे संवैधानिक मुद्दा बना उलझा दिया गया। कहा गया कि अगर एनसीटीसी बिना राज्य सरकारों को बताये किसी आतंकी को उठाती है तो उससे राज्य सरकारों की संप्रभुता और संघीय ढांचे को चोट पहुंचेगी। सचाई तो ये है कि केंद्र की तरह राज्य सरकारें भी आतंकवाद से लड़ने में संजीदा नहीं हैं। वोटबैंक राजनीति और मुख्यमंत्री की सामंती प्रवृत्ति आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को शुरू ही नहीं होने देती। हर मुख्यमंत्री ने राज्य पुलिस को अपनी राजनीतिक पार्टी का बंधुआ मजदूर बनाकर छो़ड़ दिया है। निकम्मे अफसरों को महत्वपूर्ण पद दिए जाते हैं क्योंकि ये वो अफसर है जो संविधान के प्रति जवाबदेह न होकर सत्ताधारी पार्टी के नेता के प्रति जवाबदारी को कैरियर के लिये मुफीद मानते हैं। नेता और अफसर का ये गठजो़ड़ ईमानदार अफसरों के मनोबल को तोड़ता है और जिन्हें डीजीपी बनना चाहिये वे किसी ट्रेनिंग कॉलेज के प्रिंसिपल बन के फ्रस्टेट होते रहते हैं। पुलिस का ये राजनीतिकरण आतंकवाद से लड़ने में बड़ी रुकावट है।

ये इसी राजनीतिकरण का नतीजा है कि किसी भी राज्य में सत्ता बदलते ही अपनी पार्टी य़ा अपने वोट बैंक के हिसाब से अपराधियों को बचाने या उनके खिलाफ मुकदमे वापस लेने का खेल शुरू हो जाता है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार बनते ही पुलिस को साफ संदेश दे दिये गये कि अल्पसंख्यक तबके से जुड़े अपराधियों से जरा संजीदगी से निपटा जाए। पुलिस अफसर जानते हैं कि अल्पसंख्यक तबका मुलायम सिंह यादव का वोट बैंक है इसलिय़े वो इस तबके से जुड़े मामलों मे ढिलाई बरतने लगता है। यही हाल बीजेपी और कांग्रेस शासित राज्यों का भी है। दिग्विजय सिंह को क्यों बटला हाउस कांड पर दर्द होता है और आजमगढ़ जाकर बताने की कोशिश करते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय के साथ गलत हो रहा है? बीजेपी के नेताओ को प्रज्ञा सिंह से प्रेम हो जाता है। और उससे मिलने जेल क्यों जाते हैं? इस सवाल का जवाब खोजेंगे तो आतंकवाद से ल़ड़ने में अपनी कारयता सामने आ जायेगी।

आतंकवादी घटनाओं पर केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को क्षेत्रीय पार्टियां गाली देती हैं। लेकिन 1993 के बम धमाकों के आरोपी भुल्लर की मौत की सजा के खिलाफ पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को प्रधानमंत्री को पत्र लिखने में संकोच नहीं होता है और न ही बेअंत सिंह के हत्यारे राजोआना की फांसी माफी के लिये राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मुलाकात करने पर अफसोस। इसी तरह अगस्त 2011 में तमिलनाडु विधानसभा सर्वसम्मति से राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी से बचाने के लिये प्रस्ताव पास करने से पीछे नहीं रहती। अफजल गुरु के मसले पर भी जम्मू-कश्मीर में प्रस्ताव लाने का विचार रखा गया। अफजल गुरु की फांसी के लिए बीजेपी दबाव बनाती है लेकिन मालेगांव, मक्का मस्जिद, समझौता और अजमेर ब्लास्ट में किसी भी हिंदू का नाम आने पर जांच पर ही सवाल खड़े कर देती है। जबतक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को धर्म, जाति, कौम, प्रांत की नजर से देखा जायेगा तब तक आतंकवाद का सामना हम कैसे कर पाएंगे? राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं का दोगलापन सबसे बड़ा संकट है न कि खुफिया एजेंसियों की नाकामी।

अमेरिका में 9/11 होने के बाद रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों में आम राय थी कि चाहे कुछ भी हो हमें आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देना होगा और ये सुनिश्चित करना होगा कि फिर कभी अमेरिका में आतंकवादी हादसा न हो। आनन फानन में 22 एजेंसिय़ों को एकसूत्र में पिरोकर होमलैंड सिक्योरिटी का गठन कर दिया गया। उसके बाद अमेरिका में आतंकवादी हमला नहीं हुआ। हमारे यहां हर नेता कहता है कि पुलिस को पेशेवर बनाइए लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आजतक पुलिस सुधार लागू नहीं किए जा सके। जस्टिस वर्मा ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि पुलिस को राजनेताओं के चंगुल से छुड़ाना होगा तभी कानून व्यवस्था में गुणात्मक सुधार होगा लेकिन इस ओर कदम उठाती न तो सरकार दिखेगी और न विपक्षी दल इसको मुद्दा बनाएंगे। हमारे नेताओं का हाल ये है कि अगर किसी नेता को किसी पुलिस वाले ने सुरक्षा कारणों से रोक लिया तो सामंती नेता उस अफसर की नौकरी ले कर ही मानेगा। हमारे यहां गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी का अपहरण होता है तो वो ये नहीं कहते कि रुबइआ सईद को देश के नाम कुरबान कर दो लेकिन आतंकवादी मत छोड़ो। कंधार हाईजैकिग में आतंकवादी मौलाना अजहर को छोड़ने के लिए खुद जसवंत सिंह जाते हैं, वहीं मौलाना अजहर जिसने आगे चलकर जैश ए मोहम्मद बनाया जिसने संसद पर हमले की साजिश रची। सवाल वही जब तब देशहित पर आत्महित भारी रहेगा तबतक आतंकवाद से नहीं लड़ सकते। नेताओं के अंदर बैठे आत्मघाती दस्ते को तो खत्म करना ही होगा।

IBN7IBN7

Previous Comments

IBN7IBN7
IBN7IBN7

आशुतोष के बारे में कुछ और

आशुतोष आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। वह IBN7 में मैनेजिंग एडिटर के पद पर रह चुके हैं। आईबीएन7 से जुड़ने से पहले आशुतोष एक प्रमुख खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे। वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे। ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही। वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं।
IBN7IBN7

IBN7IBN7

पिछली पोस्ट

आर्काइव्स

IBN7IBN7