घूम फिर कर वही एफआईआर फिर से कुछ लिखने के लिए मजबूर कर रही है। शायद जिसके सहारे अब तक सब कुछ चल रहा है। एक क्राइम रिपोर्टर की जिंदगी में इससे ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ है भी नहीं। अपने लोगों में अपनी वैल्यू बनाए रखने और अपनी नौकरी में खबर पाने के लिए एफआईआर का महत्व तो कोई क्राइम रिपोर्टर से पूछे।
जी हां, एफआईआर। एफआईआर जिसकी महत्ता सिर्फ क्राइम रिपोर्टर के लिए ही नहीं, हर उस शख्स के लिए अहम है जो किसी हादसे का शिकार हुआ हो। अहम ये पुलिस के लिए भी है तभी तो कोई पुलिस एफआईआर जल्द से दर्ज नहीं करना चाहती और हादसों के शिकार हुए लोगों को हमारे जैसे लोगों से सिफारिश करवानी पड़ती है। भगवान न करे मगर इसे पढ़ने वाले जिन-जिन लोगों का सामना किसी हादसे से हुआ हो उनमें से अधिकांश लोग इस एफआईआर का भाव भी अच्छी तरह जानते होंगे।
खैर, मुझे ये सब लिखने की जरूरत क्यों पड़ी सबसे पहले इस बात की जानकारी आपको दे दूं। करीब डेढ़ साल पहले दिल्ली के एक इलाके में रहने वाले एक परीचित के साथ हादसा हो गया। हादसा ये कि उनके छोटे से बच्चे को स्कूल जाते समय रास्ते में एक साधु मिला पता नहीं उसने उसे क्या पट्टी पढ़ाई कि बच्चे ने घर में रखे सारे कीमती सामान उस साधु को लाकर दे दिए।
घर वालों को जानकारी हुई और जाहिर सी बात है पुलिस भी आई। फिर शुरू हुआ पुलिसिया शैली में मामले की जांच। बात मेरे पास भी पहुंची और दखलअंदाजी के बात एफआईआर दर्ज भी हो गई। मगर पुलिस ने ठग साधु की तलाश करने की बजाय आठ साल से बच्चे से वो पूछताछ की वो कि बच्चा क्या मां पिता भी सिर पर हाथ धरे रह गए। फिर मैंने दखल दिया और मामले की जांच इलाके की स्पेशल यूनिट को दे दी गई।
शुरुआत में लगा जैसे ठग पकड़ा जाएगा और सिर्फ मेरे परिचित ही नहीं कई और के सामान मिल जाएंगे। मगर हुआ कुछ नहीं दो तीन महीने बाद ही मामले के जांच अधिकारी ने मेरे परिचित पर दबाव बनाना शुरू कर दिया दबाव ये कि उसे मामले को बंद करने की लिखित इजाजत दे दी जाए। ताकि आला अधिकारियों के बार-बार की पूछताछ से वो बच सके और एफआईआर भी कैंसिल हो जाए।
मैने फिर दखल दिया और दबाव बनाने वाले अधिकारी ने उनके घर जाना छोड़ दिया। मगर एक साल बाद कुछ दिन पहले वही अधिकारी उनके पास कोर्ट का समन लेकर पहुंचा। मजिस्ट्रेट का हुक्म था कि सुबह 10 बजे शिकायतकर्ता कोर्ट में पहुंचे। जीवन भर मामूली नौकरी कर हर हील हुज्जत से दूर रहने वाले मेरे परिचित को काटो तो खून नहीं। फोन पर उनकी आवाज थर्रा रही थी।
मैंने उन्हें समझाया कि घबराने की कोई बात नहीं ऐसा इसलिए हैं क्योंकि कोर्ट ये जानना चाहता है कि शिकायतकर्ता क्या चाहता है-अगर आपने कह दिया कि कोई कार्रवाई नहीं चाहिए तो एफआईआऱ की बाबत नो ट्रेस की फाइल बन जाएगी औऱ जांच अधिकारी का पल्ला छूट जाएगा।
और अगर वो चाहते हैं कि कार्रवाई चलती रहे तो चलेगी। दूसरे वाले विकल्प के लिए वो बिल्कुल तैयार नहीं थे उन्हें इस बात का अच्छी तरह अहसास हो चुका था कि पुलिस की बात ना मानने का नतीजा होगा फिर रोज रोज जांच अधिकारी का घर में पहुंचकर उल-जुलूल सवाल करने का सिलसिला। जीवन भर किसी भी तरह के विवादित मामले से बच कर निकलने वाले इंसान जिसके कीमती गहने घर से गायब हो गए हों जिसके आठ साल का बच्चा आज भी हादसे की याद कर सहमा-सहमा रहता तो। उसके साथ हादसे के बाद क्या क्या गुजरी ये जानकर शायद ही कोई एफआईआर कराना चाहेगा।
ये बातें मैं सिर्फ इसलिए लिख रहा हूं कि अभी 8 अगस्त को किसी की मोटरसाइकिल चोरी हो गई दिल्ली के एक इलाके से। पहले तो वो थाने दौड़ते रहे मगर जब एक सप्ताह बाद भी सुनवाई नहीं हुई तो किसी दूसरे इलाके के एसएचओ के माध्यम से वो मुझ तक पहुंचे ताकि किसी बड़े अधिकारी से सिफारिश कराई जा सके।
करीब 20 दिन पहले हुई मोटरसाइकिल चोरी का एफआईआऱ दर्ज करने की सिफारिश तो मैंने कर दी है। हो सकता है एफआईआऱ दर्ज भी हो गया हो। मगर क्या एक साल बाद ये जनाब भी मेरे पुराने उसी परिचित की तरह अफसोस नहीं करेंगे जिसे पुलिस से लेकर कोर्ट तक के चक्कर लगाने पड़े सिर्फ इसलिए लगाने पड़े क्योंकि वो एक हादसे का शिकार हो गया था जिसमे उसके सारे कीमती गहने चले गए।














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