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आलोक वर्मा
Monday , March 15, 2010 at 13 : 30

इस पुलिसवाले का हाल तो पूछो...


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एक खबर है-तीन साल में दिल्ली के 500 पुलिसवाले गिरफ्तार हुए विभिन्न अपराधों में। खबर के आगे इसका ब्रेकअप भी है 2007 में 116, 2008 में 251 और 2009 में 133...। ये खबर किसी रिपोर्टर या किसी मीडिया की नहीं बल्कि राज्यसभा में दिए गए पुलिस के ही आंकड़े हैं। बड़ी बात ये कि विभिन्न अपराधों में गिरफ्तार हुए पुलिसवालों के इस आंकड़े में करप्शन में गिरफ्तार होने वाले पुलिसवालों की संख्या 205 है यानी आधे से भी कम। एक और बात ये सभी निचले स्तर के पुलिसवाले हैं यानी इंस्पेक्टर स्तर तक के।

इस खबर ने दो सवाल खड़े किए हैं पहला क्या क्राइम में लिप्त पुलिसवालों की संख्या बढ़ रही है। दूसरा ये कि क्या करप्शन से ज्यादा पुलिसवाले क्राइम में रूचि ले रहे हैं। इस खबर और इन सवालों का मंथन करने से पहले एक बात याद आ रही है लंदन के एक पूर्व पुलिस कमिश्नर की जिनका नाम याद नहीं मगर उनकी बात बखूबी याद है उन्होंने कहा था कि पुलिस समाज का सर्वोच्च प्रतिबिंब है जैसा समाज होगा पुलिस भी वैसी ही होगी। तो क्या हमारे समाज में कोई खराबी आ रही है इसीलिए इतनी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी अपराध की तरफ जा रहे हैं। इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की जाएगी मगर इसके पहले कुछ ऐसी सच्चाईयों से अवगत हो जाते हैं जिससे इस सवाल का जवाब तलाशनें में मदद मिलेगी।

पहला सच-1995 में बैंगलुरू के विमहांस का सर्वे। इस सर्वे के मुताबिक दिल्ली के 52 फीसदी पुलिसवाले मनोरोग के शिकार हैं। 47 फीसदी शारीरिक बीमारियों के शिकार हैं और इनमें से सिर्फ 17 प्रतिशत पुलिसवालों को ही अपने रोगों की जानकारी है। इनमें से सिर्फ दो प्रतिशत डॉक्टर के पास जाते हैं। दूसरा सच- जस्टिस जेडी खोसला कमेटी कि पुलिस पर की गई विस्तृत सर्वेक्षण के बाद दिल्ली में 1 जुलाई 1978 को कमिश्नरी की स्थापना हुई।

ये दोनों सच 15 साल बाद और बत्तीस साल बाद आज भी कमोबेश वैसे ही है। खोसला कमेटी ने कहा था कि पुलिसवाले गैरइंसानी माहौल में काम करते हैं इसीलिए उनका व्यवहार वैसा ही हो जाता है। सच भी है मै एक ऐसे पुलिसकर्मी को जानता हूं जो 1964 से पुलिस में एसोशिएसन बनाने की लड़ाई लड़ रहा है। छिद्दा सिंह रावत नाम के इस शख्स ने इस लड़ाई में अपनी नौकरी गंवा दी। सुप्रीम कोर्ट तक गया और पिछले साल अगस्त में उसकी बात पर कोर्ट काफी हद तक राजी भी हुआ मगर हालात में कोई बदलाव नहीं है।

कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी हम जरूर कर रहे हैं मगर पुलिस को आज भी सौ रूपये प्रति माह मेडिकल के लिए मिलते हैं। आज भी उन्हें साइकिल अलाउंस दिया जाता है। जनता से दोस्ती के कोर्स जरूर कराए जाते हैं मगर हकीकत में काम करते वक्त उन्हें दोस्ती जैसी बात का मतलब सोचने का वक्त भी नहीं मिलता। किसी परिवार का कोई आदमी पुलिस की वर्दी पहनकर जिस दिन घर आता है उससे उपरी कमाई का हिसाब पूछा जाता है।

इन सभी बातों के बाद ये तो तय है कि पुलिस को मित्रता का दायित्व तो निभाना ही चाहिए। मगर वो ऐसा नहीं कर पाती इसलिए क्योंकि डरे सहमे हुजूम को अपनी कमी छिपाने का एक ही रास्ता होता है वो ये कि सामने वाले को कमजोर साबित कर दे। पुलिस यही करती है यानी समाज को अपना रोब दिखाकर अपनी कमी छिपाने का काम। मगर पुलिस के बड़े अधिकारी पुलिस की भूमिका तय कर इस हालात को बदल सकते हैं। तब संसद में पुलिस की अच्छाइयों के आंकड़े भी सवाल के रूप में आएंगे।

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आलोक वर्मा के बारे में कुछ और

जन्म- 31 दिसंबर 1969 बिहार के आरा में। ग्रेजुएशन दर्शन शास्त्र, जाकिर हुसैन कालेज दिल्ली विश्वविधालय से। पब्लिक एशिया से 1993 में कैरियर की शुरुआत, करंट न्यूज में चीफ रिपोर्टर रहे। उसके बाद दैनिक जागरण मे अपराध बीट पर काम करने का अवसर मिला। इस दौरान सन 2000 में भारत सरकार के राजभाषा अनुभाग से हिंदी सेवी सम्मान मिला। टीवी की दुनिया में पहली बार 2004 में बीएजी फिल्मस में आया। वापस दैनिक जागरण चला गया।मगर फिर 2006 में वापस बीएजी पहुंचा जहां दिल्ली टीम को नेतृत्व करने का मौका मिला। 2007 के मई से आईबीएन7 में कार्यरत।
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