नौकरों द्वारा किए जाने वाली वारदातों का सिलसिला जोरों पर है। साथ ही जोर पर है उनके वेरीफिकेशन करवाने की सीख देने का काम भी।
मगर वेरीफकेशन एक मनोवैग्यानिक दबाव के सिवा कुछ नही। दरअसल वेरीफिकेशन फार्म भरने या पुलिस में उसे जमा करवा लेने भर से ही आपराधिक मानसिकता के नौकरों पर काबू नही पाया जा सकता। क्योंकि सही मायने में इन फार्म का पुलिस वैरीफिकेशन होता ही नहीं।
दिल्ली में सिर्फ 2 या 3 फीसदी ही वेरीफिकेशन फार्म का जवाब आता है। बाकी सारे फार्म संबधित थानों में पेंडिंग पड़े रहते हैं। दरअसल इसकी प्रक्रिया ही ऐसी है।
वैरीफिकेशन फार्म में भरे हुए पत्ते के थाने से पुलिस संबंधित नौकर के बारे में जानकारी मांगती है। मगर बिहार, पंजाब, यूपी या नेपाल भी जवाब देने की जरूरत नही समझता।
फिर अगर जिस आदमी के बारे में जानकारी ली जा रही है अगर उसने काफी साल पहले उस जगह को छोड़ दिया हो तो इस वैरीफिकेशन का कोई मतलब नहीं रह जाता।
दरअसल देश में अब तक कोई भी क्राइम का डाटा बेस नहीं है। जिससे पलक झपकते ही फिंगर प्रिंट से ये पता लग सके कि जिसका वैरीफिकेशन की जा रही है वो कभी किसी आपराधिक गतिविधि में लिप्त रहा है या नही।
इसलिए आपराधिक मानसिकता के नौकरों से खुद को बचाने के लिए सिर्फ दो उपाय हैं पहला उसके भूतकाल की पूरी जानकारी और दूसरी उससे थोड़ी दूरी। सामाजिक स्तर पर तब तक इन्हीं उपाय से काम चलाना होगा जब तक कि सरकारी स्तर पर कोइ सेंट्रल डाटा का प्रावधान ना हो।














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