लिखना तो नहीं चाहता था मगर लिखना अब जरूरी सा लगता है। हाई कोर्ट धमाके की जांच के लिए दिल्ली पुलिस ने स्पेशल टीम बनाई है। टीम में उन अफसरों को शामिल किया गया है जो एक समय में टेरर संबंधी मामलों को सुलझाने के लिए सुपर कॉप कहे जाते थे। इस टीम के बनने के बाद एक बात जो सबसे पहले याद आती है या यूं कहें कि जेहन में जो सवाल उभरता है वो 8 साल पहले का है। तब दिल्ली के पुलिस कमिश्नर होते थे आर एस गुप्ता और 14 अक्टूबर 2003 को एक सनसनीखेज कांड हुआ था। लोग इसे सीरीफोर्ट रेप कांड के नाम से जानते हैं। इसी केस से दिल्ली में स्केच बनाने की प्रैक्टिस भी शुरू हुई थी।
उस समय वर्तमान दिल्ली पुलिस कमिश्नर बी के गुप्ता दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट सीपी थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि पूरी कोशिश के बाद भी जब 16 दिन तक ये मामला नहीं सुलझा तो 30 नवंबर को 20 सुपर कॉप कहे जाने वाले पुलिस अफसरों की स्पेशल टीम बनाई गई। इस टीम में सैकड़ों वो छोटे पुलिस अफसर भी शामिल थे जिन्हें अपने फील्ड में नाम और काम के लिए जाना जाता था मगर इस टीम की सबसे बड़ी कमी थी आपसी क्लेश और कार्डिनेशन की कमी। जाहिर है प्रोफेशनल अप्रोच की जगह जब पर्सनल इगो ले ले तो रिजल्ट वही होता है जो इस मामले का हुआ। 4 साल होने जा रहा है ये मामला आज तक नहीं सुलझा।
इस मामले ने दिल्ली पुलिस की नाक सिर्फ देश में ही नहीं विदेश में भी नीची कर दी। आज फिर वैसी ही स्पेशल टीम बनाई गई है किसी का नाम ना लिया जाए तो भी दिल्ली पुलिस को जानने समझने वाले ये बखूबी समझ रहे होंगे कि वही कमी इस बार भी खलेगी जो सीरी फोर्ट रेप कांड में खली थी। ईश्वर करे ऐसा ना हो मगर पिछले तीन सालों से दिल्ली पुलिस का आतंक के मामले में जो रवैया रहा है उससे यही लगता है। अगर मैं कहूं कि ब्लास्ट मामले को केवल कुछ अफसरों के रवैये को या उन्हें बदलकर ही जांच बढ़िया से की जा सकती थी तो शायद मैं गलत नहीं हूं। वैसे तीन साल पहले हुए दिल्ली सीरीयल ब्लास्ट को याद कीजिए केवल 6 दिन लगे थे दिल्ली पुलिस को सीरियल ब्लास्ट को सुलझाने में।
13 सितंबर को ब्लास्ट हुए थे और 19 सितंबर की सुबह मामले को सुलझा लिया गया था। इस मामले पर देश भर में हुई राजनीति ने भी पुलिस के मोराल को तोड़ने में भूमिका निभाई क्योंकि पुलिस अफसर ये कहते नजर आए कि अपना आदमी खोकर बदनामी सहनी है तो ये काम किया क्यों जाए। मगर ये जवाब पुलिस के काम को जायज नहीं ठहरा सकता। अगर आप सही हैं तो अपनो मातहतों को काम करते रहने के लिए कहेंगे ना कि 1986 में आतंकी मामलों को सुलझाने के लिए स्थापित स्पेशल सेल को झपटमारों को पकड़ने में लगा देंगे।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने यही किया। महरौली, जामा मस्जिद, हाई कोर्ट में मई में हुए ब्लास्ट को सुलझाने के लिए काम करने की बजाय दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल लुटेरे, कार चोर और झपटमार पकड़ती रही। नतीजा सबके सामने है जब बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट में ब्लास्ट की साजिश रची जा रही होगी उस समय दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल झपटमार पकड़कर उसकी प्रेस कांफ्रेंस कर रही थी। खैर सवाल बुधवार को हुए दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर ब्लास्ट का है औऱ उसकी जांच के लिए बनी स्पेशल टीम का।














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