ये डाबड़ी चौक था। लाल बत्ती हो चुकी थी लिहाजा मुझे गाड़ी रोकनी पड़ी। कुछ ही पल बीते थे कि दो हाथ कार के शीशे पर फैल गए। नन्हे हाथ कुछ मांग रहे थे, कुछ सोचता इसके पहले ही बत्ती हरी हो गई और मुझे वहां से चल देना पड़ा। मगर रास्ते भर वो दो नन्हे हाथ मेरी आंखों के आगे नाचते रहे।
मीडिया में होने के बावजूद मेरे लिए यह खबर नहीं क्योंकि यह बिकेगी नहीं। खबर बेचने की परिपाटी जब से चल पड़ी है तब से ये खबरें नहीं की जातीं। बहरहाल मेरा मन और दिमाग दोनों में वो दो नन्हे हाथ छाए हुए थे और तब तक सागरपुर का चौक आ गया। वहां भी कई नन्हे बच्चे बच्चियों के हाथ कार के चालक सीसे पर फैले हुए थे कुछ लोग उन हाथों पर कुछ रख भी रहे थे।
मेरी सोच जिंदगी के रफ्तार से कहीं तेज चलने लगी इस विचार के साथ कि ये बच्चे कौन हैं, किसके हैं और सबसे बड़ा सवाल ये कि इनका भविष्य क्या है। मुझे याद आई एक एनजीओ की स्टडी- दिल्ली में डेढ़ लाख बच्चे विभिन्न चौराहों पर भीख मांगते हैं।
जाहिर है भीख मांगते होंगे तो उनके हाथ पर कुछ ना कुछ मिलता भी होगा मगर मैं तो ये सोच रहा था कि भीख मांगने वाले ये हाथ जब नन्हें नहीं रहेंगे तो क्या होगा। ये हाथ बड़े होकर क्या करेंगे। दिमाग कहने लगा जब भीख नहीं मिलेगी तो यही हाथ छीना झपटी करेंगे। तो क्या ये अपराधियों की एक बड़ी फौज तैयार नहीं हो रही। वह फौज जिसकी किसीको चिंता नहीं।
पुलिस चौथ की कुछ रकम लेकर खामोश है और इनके पुनर्वास के लिए जिम्मेवार समाज कल्याण विभाग के पास जगह नहीं होने का बहाना है। इसी तरह भीख मांगने वाली बच्चियों का भविष्य शरीर बेचने वाली कॉलगर्ल नहीं तो क्या हैं। सब जानते हैं या कहते भी हैं कि भीख मांगने का ये रैकेट पूरी तरह संगठित हो चुका है।
सवाल है कि फिर इसके लिए कोई कुछ कर क्यों नही रहा। जवाब था मुर्खता भरी बातों में दिन ना गवांना ही बेहतर है क्योंकि ये ना तो कोई खबर है ना स्टोरी और ना ही टीआरपी। दफ्तर आ चुका था सो मैंने भी रोज की रुटीन में व्यस्त हो गया। मगर दो नन्हे हाथ अभी भी दिलो दिमाग पर हैं इस सोच के साथ कि ये कहां जा रहे हैं।














कमेंट्स
10