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आलोक वर्मा
Tuesday , December 18, 2012 at 19 : 06

...यूं ही नहीं रुकेंगे रेप!


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वसंत विहार चलती बस में गैंग रेप के मामले ने दिल्ली ही नहीं देश भर को हिला दिया है। मामला है भी इतना सनसनीखेज जिसकी गर्माहट धीरे-धीरे मगर जोरदार चढ़ी। केस दर्ज हुआ और आरोपी पकडे़ भी गए। बड़ी हस्तियों ने चैनलों पर और बाहर अपना ज्ञान भी दिया। सबने यहां तक कहा और दिल्ली के पुलिस कमिश्नर तक ने डिमांड रखी कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो। एक डिमांड ये भी कि बलात्कार के लिए कड़ा कानून बने। बिल्कुल सही बात है ऐसे मामलों की सुनवाई जल्द से जल्द होनी चाहिए और कानून भी कड़े बनने चाहिए लेकिन इन सबके बीच आज जो सबसे अहम बात की कमी खल रही थी वो ये कि कोई भी ऐसी घटनाएं दिल्ली या देश में ना हो इसके उपायों पर बात नहीं कर रहा था।

कानून की सख्ती का डर निश्चित रूप से होता है मगर इतना नहीं कि ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति ना हो। बचाव से बड़ा कोई उपाय नहीं है और आश्चर्य ये कि पुलिस कमिश्नर भी प्रेस कांफ्रेंस में इस तरह के मामले ना हों इसके लिए कोई कारगर उपाय नहीं बता रहे थे, ना उनसे कोई पूछ रहा था। पुलिस कमिश्नर ने ये तक कहा कि हर गाड़ी को चेक करना नामुमकिन है जब तक कि संदेह की सूचना ना हो। कमाल है इतने साल से मैं यही देखता रहा हूं कि पिकेट पर बाइक के सिवा किसी वाहन की चैकिंग नहीं होती और हर हादसे के बाद पिकेट की संख्या बढ़ाने के सिवा और किसी कारगर उपाय की बात ही नहीं होती। आखिर संदेह का आधार क्या होगा। क्या आतंक और अपराधियों के निशाने पर हमेशा रही दिल्ली के वसंत विहार जैसे इलाके में रात को काले शीशे वाली बस का चलना संदेह पैदा नहीं करता।

आप इस बात से सहमत होंगे कि देश के अन्य महानगरों की तुलना में 30 से 60 प्रतिशत अधिक आपराधिक वारदात की गवाह बनने वाली दिल्ली, नहीं-नहीं ग्रेटर दिल्ली के सुरक्षा प्रबंधों की तफ्तीश का वक्त आ चुका है। शुरुआत राजधानी और आसपास चलने वाले अवैध पब्लिक ट्रांसपोर्ट से। दिल्ली से लेकर नोएडा, गाजियाबाद और आसपास से सभी शहरों में गैरकानूनी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का जबरदस्त ट्रेंड है। केवल दिल्ली में ही तीन दर्जन ऐसी जगहें हैं जहां से गैरकानूनी तरीके की टैक्सियां चलती हैं। तर्क ये कि कई बार ये आम आदमी की जरूरत पर काम आती हैं। हर इलाके की पुलिस को ये मालूम होता है कि ये टैक्सियां अवैध रूप से चल रही हैं मगर इनको रोकने की बात तो दूर पुलिस का एक जवान वहां खड़ा हो जाए इसकी जहमत भी नहीं उठाई जाती। हो भी कैसे अगर पुलिस खड़ी होगी तो उसकी अतिरिक्त आय का क्या होगा।

अब इसी तरह का दूसरा मामला देर रात तक खुलने वाली दुकानों का है। हर थाना इलाके में कुछ दुकान देर रात या रात भर खुली होती हैं। दुकानदारों के इस तर्क के साथ कि मजदूर से लेकर साहब तक जो देर रात घर पहुंचते हैं उन्हें पान सिगरेट से लेकर छोटी-मोटी जरूरत की हर चीज यहीं से मिलती है। मगर ये कड़वा सच भी है कि इन दुकानों पर अक्सर ऐसे लोगों का जमावड़ा देखा जा सकता है जिनकी नीयत कभी भी आपराधिक हो सकती है। मगर पुलिस को इससे मतलब नहीं, हो भी कैसे अतिरिक्त आय का मामला बाकि सारे सवालों को गौण कर देता है और फिर कुछ हो जाए तो दुकानदार के साथ-साथ कुछ गरीब लोगों की पिटाई का हथियार तो पुलिस के पास हमेशा रहा है।

वसंत विहार रेप केस में गिरफ्तार मुलजिमों को मुनिरका के उस बस स्टैंड के बारे में बखूबी मालूम था कि रात में यहां सवारियां मिलती हैं। शुरू में उनकी नियत भी एक्स्ट्रा पैसे कमाने भर की थी। खैर जिन दो मुद्दों की बातें मैंने कीं उन दोनों मामलों में सुरक्षा का सवाल रामभरोसे छोड़ दिया जाता है। अब क्या सीपी साहब इस सवाल का जवाब देंगे कि दोनों ही मामले संदेह का आधार नहीं हैं क्या? फिर ऐसी जगहों की देखरेख के सवाल की उपेक्षा क्यों? पुलिस की कार्यप्रणाली को नजदीक से जानने-समझने वाले इस बात को भी अच्छी तरह जानते हैं कि पुलिस पहले ही सड़कों पर नहीं होती थी। अब तो आला अधिकारियों ने कागजी कार्रवाईयों की ऐसी लंबी फेहरिस्त बना ली है कि पुलिस सारे दिन उसी में उलझी रहती है।

एक सच और बता दूं कि राजधानी का शायद ही कोई ऐसा रिहायशी इलाका होगा जहां रात में पुलिस की गश्त होती हो। राजधानी ही क्यों, इसे एनसीआर में भी देख सकते हैं। इस सच के बावजूद कि साल भर में दर्ज होने वाले आपराधिक मामलों की अधिक संख्या रात में होने वाले मामलों की होती है। पुलिस के आला अफसरों के पास इसका पहला जवाब है-कि ये बात गलत है कि गश्त नहीं होती। उनका दूसरा जवाब है कि कानून और व्यवस्था से संबंधित इतने काम हैं और पुलिसकर्मी कम। सच भी है कि दो करोड़ की आबादी छूने जा रही दिल्ली में हर कदम पर पुलिसिया व्यवस्था करना नामुमकिन है। लेकिन क्या कसूर सिर्फ शहर का बढ़ती आबादी का है। भूलने की बात नहीं है ये कि वसंत विहार का मामला तब हुआ है जब पुलिस कमिश्नर चार माह पहले ही ये आदेश निकाल चुके हैं कि दिल्ली का कोई भी एसएचओ सप्ताह में घर नहीं जाएगा। अब बडे़ साहब को कौन समझाए कि एसएचओ के घर जाने से क्राइम का लेना-देना नहीं है बल्कि इसका लेना-देना अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही सुरक्षा व्यवस्था से है जिसे किसी पुलिस कमिश्नर ने विश्लेषण कर बदलने की जरूरत महसूस नहीं की।

दिन भर काम करने वाले पुलिसकर्मियों से रात्रि गश्त की बात करेंगे तो वो हुक्म तो बजाएंगे मगर उनके तामील करने का ढंग क्या होगा इसे कोई आम आदमी भी समझ सकता है। ड्यूटी में लापरवाही बरतने वाले सिपाही को थाने में संतरी की ड्यूटी देने की प्रथा है दिल्ली में। अब सवाल ये कि दंड के रूप में मिलने वाली ड्यूटी कैसे निभाई जाएगी ये सिपाही पर निर्भर करता है। शहर में पुलिसकर्मियों की सतर्कता जांच के लिए आज भी ब्रिटिश काल में बनी योजना जनरल गश्त का सहारा लिया जाता है। इसके तहत कोई एक बड़ा अधिकारी सुरक्षा का जायजा रात भर लेता है। मगर जांच करने के इस तरीके के दो पहलू हैं। पहला ये कि जायजा लेने वाला अधिकारी कई बार खुद ही कहीं सोना पसंद करता है।

दूसरा ये कि उसके आने की खबर उस थाने को पहले से होती है जहां उसे चेक करने जाना है। रात भर में एकाध घंटे की सतर्कता पुलिसकर्मी किसी तरह निकाल लेता है मगर अधिकारी के जाते ही फिर सुस्ती का दौर शुरू हो जाता है। दिन भर काम करने वाले पुलिसकर्मी से रात में गश्त करने का हुक्म देना सतर्कता से खिलवाड़ तो है ही। मोटीवेशन के लिए आला अधिकारियों की गैरमौजूदगी भी कम वजह नहीं है सुस्ती की। पुलिस का अब व्यावहारिक होने से ज्यादा जरूरी हो गया है कागजी होना और फिर कागजी शेर जंगल में क्या गुल खिलाएगा इसका अंदाजा दिन ब दिन बढ़ रही वारदातों से लगाना कोई मुश्किल काम नहीं।

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आलोक वर्मा के बारे में कुछ और

जन्म- 31 दिसंबर 1969 बिहार के आरा में। ग्रेजुएशन दर्शन शास्त्र, जाकिर हुसैन कालेज दिल्ली विश्वविधालय से। पब्लिक एशिया से 1993 में कैरियर की शुरुआत, करंट न्यूज में चीफ रिपोर्टर रहे। उसके बाद दैनिक जागरण मे अपराध बीट पर काम करने का अवसर मिला। इस दौरान सन 2000 में भारत सरकार के राजभाषा अनुभाग से हिंदी सेवी सम्मान मिला। टीवी की दुनिया में पहली बार 2004 में बीएजी फिल्मस में आया। वापस दैनिक जागरण चला गया।मगर फिर 2006 में वापस बीएजी पहुंचा जहां दिल्ली टीम को नेतृत्व करने का मौका मिला। 2007 के मई से आईबीएन7 में कार्यरत।
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