नीरज गुप्ता
Monday , March 02, 2009 at 20 : 35

अभिनेता था.. अभी नेता हूं...


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संजू बाबा टिकट लेकर मचल रहे हैं.. बिहारी बाबू टिकट के लिए पार्टी बदल रहे हैं.. गजोधर भइया टिकट की चाहत में उछल रहे हैं.. तिवरिया और किशनिया टिकट पाकर निखर रहे हैं.. नग्मा चुनावी राग गा रही हैं.. राग की धुन बसंती यानी हेमा के भी करीब आ रही है.. अमिताभ पूरे परिवार के साथ अमर सिंह से सटते हैं.. तो गोविंदा, शाहरुख सोनिया की चौखट पर सिर पटकते हैं.. अरे भइया चुनाव है कि मल्टीस्टारर फिल्म.. ?? ??

आप पूछते रहिये- लेकिन ये तो हो रहा है। लगता है कि पूरा बॉलीवुड लोकतंत्र की भैंस पर सवार होकर चुनावी तालाब में नहाने निकल पड़ा है। बहुत हो चुकी पर्दे पर एक्टिंग। अब असल ज़िंदगी में करनी है। लेकिन रुकिये.. शक भरी निगाह से सिर्फ बॉलीवुड को ना देखिये.. टॉलीवुड भी कुछ कम नहीं..।

इन दिनों आंध्र प्रदेश चुनाव आयोग एक दिलचस्प मुसीबत में है। आयोग चाहता है कि वोट डालने को लेकर लोगों को जागरूक बनाने के लिए एजुकेशनल टीवी एड बनाए जाएं। लोग विज्ञापन देखकर वाकई जागरूक बनें इसके लिए आयोग को दरकार है टॉलीवुड सुपरस्टारों की।

सुपरस्टार ऐसे जिनके कोई राजनीतिक माई-बाप ना हो। मगर भइया बिना माई-बाप का तो कोई है ही नहीं। चिरंजीवी तो बाकायदा नई पार्टी बनाकर खुद ही अपने माई-बाप बन चुके हैं। नागार्जुन, बालकृष्णा, जूनियर एनटीआर, महेश बाबू, तरुण वगैरह वगैरह.. तमाम सितारों की मूंछों पर भी किसी ना किसी पार्टी का रंग लग चुका है। अब ढूंढते रहिए न्यूट्रल सितारा.. ना न्यूट्रल सितारा होगा, ना आयोग का एड बनेगा।

पिछले दिनों कहीं पढ़ रहा था- 'स्टार पावर का पहला शिकार बने थे अटल जी'..। अटल जी यानी अटल बिहारी वाजपेयी.. भारतीय राजनीति का एक पूरा अध्याय.. अध्याय ही नहीं पूरा ग्रंथ.. और अटल जी के खिलाफ ये दांव खेला था.. किसी और ने नहीं.. बल्कि आदर्शवादी राजनीति के झंडाबरदार और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने।

1962 में यूपी की बलरामपुर सीट पर दिल्ली की एक साधारण सी महिला सुभद्रा जोशी के प्रचार के लिए उन्होंने उस वक्त के सुपर स्टार बलराज साहनी को प्रचार में उतारा और अटल जी को चित्त कर डाला।

तो क्या वाकई सितारों की डेकोरेटेड लाइट्स के सामने तजुर्बे की लालटेन मद्धम पड़ जाती है.. ????

यूपी का पिछला चुनाव याद है आपको। हो सकता है याद हो लेकिन वो पार्टी तो याद कतई नहीं होगी। भारत पुनर्निर्माण दल नाम की एक अनजान सी पार्टी ने पढ़े-लिखे उम्मीद्वार मैदान में उतारे। ज्यादातर आईआईटी के इंजीनियर। साथ ही कोई डॉक्टर.. कोई टीचर...। लेकिन नतीजों के बाद सब फटीचर हो गए। ज़मानत तक ज़ब्त हो गई। इंटेलेक्चुएलिज्म के सर्टिफिकेट्स माथे पर चिपकाए जब वो वोट मांगने जाते तो लोग पूछते- 'छह महीना पहले दारू पीकर बवाल मचाने के चक्कर में चाचा पकड़ा गए थे.. छुड़ाने आए थे.. नहीं ना.. हाथी वाले सिंह साहब आए थे.. उन्हीं को वोट देंगे'.. 'पिछले महीने दारू पीने को पैसे नहीं थे.. देने आए थे.. नहीं ना.. साइकिल वाले यादव जी आए थे.. उन्हीं को वोट देंगे'.. 'तब नहीं आए, तो अब क्यों आए हो.. चुनाव जीतकर भविष्य सुधारने की बात करनी है तो जाओ भाड़ में.. मुझे तो अतीत का हिसाब चाहिए.. और अगर उस हिसाब की किताब आपके पास नहीं तो जाइये- वोट मिलेगा.. मेरे ठेंगे से'..।

लेकिन भइया.. चाचा को छुड़ाने या आपको दारू पिलाने तो धर्मेंद्र या गोविंदा भी नहीं आए थे। फिर उनको भाड़ में काहे नहीं भेज दिए। उनके नाम का बटन काहे दगादग दबा दिए।

'हम्म्म्म.. माफ कीजिएगा.. हिंदुस्तानी होने के नाते किसी की शख्सियत.. किसी की हस्ती.. किसी के हीरोइज्म या फिर किसी के स्टारडम से प्रभावित होना मेरी कुदरती मजबूरी है.. औऱ मैं अपनी इस मजबूरी का भरपूर आनंद उठाना चाहता हूं...।'

अब सवाल है उन हस्तियों का जो अपना जमा-जमाया धंधा छोड़कर इस जोखिम भरे पंगे में आना चाहती हैं। अरे संजू बाबा.. क्या आप नहीं समझते कि मान्यता भाभी के साथ शादी की जितनी तस्वीरें टीवी पर चलीं उसकी छंटाक बराबर भी चुनावी रैली की नहीं चलेंगी। शुरू में चल भी जाएं.. बाद में तो कतई नहीं। गजोधर भइया.. चुटकले सुनाकर जोकरई करने पर ही प्राइम टाइम मिलता है.. चुनावी भाषण देने से नहीं। शुरू में मिल भी जाए.. बाद में तो कतई नहीं..।

लेकिन नहीं.. ये नहीं मानेंगे। ये समझ चुके हैं.. 'राजनीति' में 'पॉलिटिक्स' भले ही हो लेकिन शायद यही वो धंधा है जो कभी मंदा नहीं पड़ता। इसके आगे मंदी की मार भी मर जाती है। ये वो फिल्म है जिसके फ्लॉप होने का कोई स्कोप नहीं। बुढ़ापे के फाकों से बचना है तो यही फिल्म साइन करनी होगी। चुनाव जीत गए तो ज़िंदगी भर की बेफिक्री। ना भी जीते तो पार्टी के प्रचार की दुकानदारी तो चल ही जाएगी। यानी चित्त भी मेरी, पट भी मेरी, अठन्नी मेरे बाप की। और हां.. मुद्दे की बात- अरे इस बहाने देश- समाज की सेवा भी तो हो जाती है... होने को ना भी हो.. कहने को तो हो ही जाती है।

तो अपने 'अभी' नेताओं के हवाले से मेरी विनम्र गुज़ारिश है- बहनो, भाइयो.. बच्चो.. बुज़ुर्गो... चुनाव के दिन घर से ज़रूर निकलना.. अपने आशीर्वाद की उंगली से इनकी किस्मत का बटन ज़रूर दबाना.. तभी तो ये कह पाएंगे- अभिनेता था.. अभी नेता हूं..।

लेकिन ये नेता देश कैसे चलाएगा..???

अरे छोड़िये .. इसकी चिंता ना कभी आपने की है और ना ही इस नेता को करनी है......!!!!

जय हिंद.. वंदे मातरम..!!!!!!!!

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नीरज गुप्ता के बारे में कुछ और

मास कम्यूनिकेशन्स में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद हरियाणा के हिसार शहर से 13 साल पहले दिल्ली का रुख किया। सहारा न्यूज में करीब तीन साल लगाने के बाद आज तक चैनल में मौका मिला। आज तक में क्राइम रिपोर्टिंग के साथ 'वारदात' और 'हत्यारा कौन' नाम के दो लोकप्रिय टीवी शोज़ की नियमित एंकरिंग की। पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में हाथ आज़माने के इरादे से आईबीएन7 का रास्ता पकड़ा और तमाम राज्यों में घूम-घूम कर चुनावी रिपोर्टिंग का लुत्फ उठाया। मुंबई ब्लास्ट हो या अजमेर शरीफ धमाका, गुर्जरों का हिंसक आंदोलन हो या फिर बिहार बाढ़ की मार्मिक त्रासदी, तिलंगाना की आग हो या नक्सलियों का मसला- खबरों की पतीली में उबलने वाले तमाम मुद्दों की गरमाहट का उनके बीच जाकर तजुर्बा किया।
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