एक हंगामाखेज़ संसद सत्र का इससे सनसनीखेज़ अंत और क्या हो सकता था। लोकपाल बिल की जिस मुहिम ने सरकारी हेकड़ी की हवा निकाल दी उसी बिल के पुर्जे हवा में उड़ते नज़र आए और लोकसभा से किसी तरह अपनी इज्ज़त बचा कर निकले लोकपाल बिल का राज्यसभा में 'चीरहरण' हो गया। शासन की साज़िश की ये वो संगीन मिसाल थी जिसमें लोकतांत्रिक नियम कायदों की औकात उस झंड़े की सी हो गई जिसे किसी मौकापरस्त ने, अपना नंगापन छुपाने के लिए, शरीर के खास हिस्सों के इर्द-गिर्द लपेट लिया हो।
29 दिसंबर सुबह करीब 11.30 बजे 'लोकपाल और लोकायुक्त बिल 2011' पर राज्यसभा में बहस शुरू हुई। विपक्ष के नेता अरुण जेटली और कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दिलचस्प अदालती जिरह सुनने के बाद मैं प्रणब मुखर्जी के कमरे की तरफ निकल गया। शतरंज की असली बाज़ी वहीं चल रही थी। सदाबहार संकटमोचक की अपनी भूमिका निभाते हुए प्रणब मुखर्जी मुलायम सिंह.. लालू यादव.. सतीश चंद्र मिश्रा सरीखों के साथ बंद कमरे की सौदेबाज़ियों में जुटे थे। इस दौरान ये सवाल माहौल में घिर चुका था कि बहस अगर रात 12 बजे तक जारी रही तो क्या होगा.. वोटिंग फिर कब होगी..। दरअसल संसद का सत्र 29 तारीख तक था और 12 बजते ही अंग्रेजी कैलेंडर की तरीख बदल जाने वाली थी।
शाम करीब 6 बजे प्रणब मुखर्जी के कमरे से निकले केंद्रीय मंत्री नारायणसामी से रिपोर्टरों ने पूछा कि 12 बजे के बाद क्या होगा। 'कोलावरी डी' सरीखी अपनी अंग्रेज़ी में सामी का जवाब था- 'Chair has the power to continue the house..' शायद तब तक पटकथा का क्लाइमेक्स नहीं लिखा गया था और सामी भूल गए थे कि ऐसे नाज़ुक वक्त में 'जनता के जासूसों' से ज्यादा बतियाना समझदारी नहीं।
इसके कुछ देर बाद लोकसभा के गलियारे से निकलते प्रणब मुखर्जी ने बताया कि गले में 'ख़राश' के चलते राज्यसभा में बहस का जवाब वो खुद नहीं नारायणसामी देंगे। ये सदन में होने वाले नाटक की तरफ बड़ा इशारा था। आखिर लोकसभा में बहस का जवाब प्रणब मुखर्जी ने दिया था और राज्यसभा में भी इसकी उम्मीद उन्हीं से की जा रही थी।
इस बीच 12 बजे का सस्पेंस बढ़ता जा रही था। शाम करीब 8.30 बजे सांसदों और मीडिया के साझे डिनर में कांग्रेस के एक असरदार नेता ने कहा- '12 बजे के बाद सदन नहीं चल सकता.. राष्ट्रपति से इजाज़त लेनी होगी।' ये संस्पेंस पर कनफ्यूज़न की शुरुआत थी। करीब 10.30 बजे पूर्व संसदीय कार्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने रिपोर्टरों को बताया- 'चेयर को फैसला लेने का हक़ है.. वो चाहे तो सदन की इजाज़ से कार्यवाही जारी रख सकती है।' कुछ देर बाद पहेली को और उलझाते हुए राजीव शुक्ला ने उम्मीद जताई- 'सदन की कार्यवाही 12 बजे से पहले खत्म हो जाएगी।' कपिल सिब्बल 'मुझे सब मालूम है पर बताऊंगा नहीं' के अंदाज़ में मुस्काते हुए निकल गए।
उधर, राज्यसभा में बहस कछुआ चाल से आगे बढ़ रही थी। शुरुआत में सदन के पास तमाम पार्टियों के 34 वक्ताओं की फ़ेहरिस्त आई। लेकिन बाद में उसमें बढ़ोतरी होती रही। कबिल-ए-गौर बात ये कि वक्त की बेहद किल्लत के बावजूद हर वक्ता इस अंदाज़ में था जैसे उसे भाषण देने का 'अनलिमिटेड कनेक्शन' मिला हो। अपनी पार्टी के अकेले सांसद रामविलास पासवान, जिन्हें 5 मिनट से ज्यादा का वक्त नहीं मिलना चाहिए था, 20 मिनट से ज्यादा बोले। पासवान की तैयारी का आलम ये था कि 'लोकपाल के Prosecution' को वो 'लोकपाल का Prostitution' बोल गए और प्रैस गैलरी में लगे ज़बरदस्त ठहाके के बावजूद उन्हें अपनी ज़ुबान की फिसलन का अहसास तक ना हुआ।
इस सारी कार्यवाही को राज्यसभा की दर्शक दीर्घा में बैठा एक ऐसा दर्शक देख रहा था जिसकी वहां मौजूदगी हैरानी, उत्सुकता और शक पैदा करने वाली थी। वो दर्शक था लालू प्रसाद यादव। लालू की लगातार मौजूदगी का सबब कुछ देर बाद नाटकीय ढंग से बेपर्दा हुआ।
राज्यसभा के चेयरमैन हामिद अंसारी की मौजूदगी में नारायणसामी लोकपाल बिल पर बहस का जवाब शुरू कर चुके थे। उनके बाईं ओर की पंक्ति के सबसे पहले बैंच पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी बैठे थे। रात 10 बजकर 57 मिनट मिनट.. लालू की पार्टी के सांसद राजनीति प्रसाद 'लोकपाल बिल पेश नहीं होने देंगे' का नारा उछालते हुए अचानक उठे और नारायणसामी की तरफ बढ़ने लगे। करीब पहुंच कर उन्होंने सामी से बिल की कॉपी छीन ली। राजनीति प्रसाद को रोकने के लिए मंत्री अश्विनी कुमार के अलावा कोई नहीं उठा। बीच-बचाव का अश्विनी कुमार का भी अंदाज़ उस किशोरी का सा था, जो आलिंगन करते अपने प्रेमी को 'ना-ना' में भी 'हां-हां' कह रही होती है। नतीजा ये कि लोकपाल बिल पुर्ज़े-पुर्ज़े होकर हवा में तैरता नज़र आया।
सदन में हंगामा मच चुका था लेकिन ना तो प्रणब मुखर्जी ने उठकर हालात संभालने की कोशिश की और ना ही प्रधानमंत्री ने। प्रधानमंत्री राज्यसभा में सदन के नेता हैं। वो खड़े होते तो सदन शर्तिया शांत हो जाता। लेकिन मनमोहन सिंह ने वैसा करने की ज़हमत नहीं उठाई।
मेरे ज़हन में 9 मार्च 2010 की वो तस्वीर तैर गई जब इसी सदन में महिला आरक्षण बिल पास करवाने के लिए इसी सरकार ने लालू, मुलायम और पासवान के करीब आधा दर्जन हुड़दंगी सांसदों को जबरन उठाकर बाहर फेंक दिया था। कहां तो वो हिटलरी रवैया.. कहां ये गांधी सी दरियादिली। सरकार की चाल.. सरकार ही समझे..।
खैर..राजनीति प्रसाद हटे.. नारायणसामी का जवाब जारी रहा। रात करीब 11 बजकर 20 मिनट.. घड़ी की भागती सुइयों के बीच सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने फिर सवाल उठाया कि 12 बजे के बाद क्या होगा। अंसारी साहब ने एक बार कहा- सदन की कार्यवाही जारी रहेगी। लेकिन फौरन पलटी मारी- अभी वक्त है सो इंतज़ार कीजिए। इसके बाद सवाल ने हंगामे कि शक्ल अख्तियार कर ली। वक्त भाग रहा था लेकिन एक हैरतअंगेज़ फैसला लेते हुए अंसारी साहब ने 15 मिनट के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी। इस फैसले ने सरकार की नीयत पर पड़ा झीना जाला भी उठा दिया। तय हो गया कि अब जो हो बिल आज पास नहीं होगा।
11 बजकर 45 मिनट... सदन दोबारा शुरू हुआ और संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल सफाई देने खड़े हुए। इसी वक्त मेज पर हाथ पटकते हुए अरुण जेटली ने कहा- 'अगर सरकार भ्रष्टाचार से निपटने को प्रतिबद्ध है तो हम पूरी रात बैठने को तैयार हैं।'
ये वो तुरुप का पत्ता था जिसने सरकार को बाज़ी छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
बंसल (11.48 बजे)- 'विपक्ष ने 187 संसोधनों के प्रस्ताव दिए हैं.. इन्हें समझने में कम से कम तीन दिन लगेंगे..'
जेटली (11.50 बजे)- 'नाउम्मीद सरकार सदन से भाग रही है..'
बंसल (11.51 बजे)- 'लोकसभा का बिल बिना संशोधनों के पास करा लीजिए..'
जेटली (11.53 बजे)- 'वोटिंग से दूर भागने वाली सरकार को राज करने का हक नहीं है..'
येचुरी (11.55 बजे)- 'सत्र को टालना मंज़ूर नहीं.. ज़रूरत हुई तो कल भी बैठेंगे..'
बंसल (11.56 बजे)- 'राष्ट्रपति के अभिभाषण से ही नए साल का सत्र शुरू होगा.. संवैधानिक नियम कायदे हम यहां बैठ कर तय नहीं कर सकते..'
राजनीति प्रसाद (11.58 बजे)- 'सत्र खत्म करो.. सत्र खत्म करो..'
11 बजकर 59 मिनट- राजनीति प्रसाद चेयरमैन अंसारी के आसन के नीचे जाकर बैठ गए।
हामिद अंसारी (12.00 बजे)- 'चेयर के पास कोई विकल्प नहीं है लिहाज़ा सत्र समाप्ती की घोषणा की जाती है।'
15 मिनट के हाई वोल्टेज ड्रामा और वंदे मातरम की धुन के बीच लोकपाल बिल को ठंडे बस्ते में डालकर सियात की उसी खूंटी पर टांग दिया गया जहां आसानी से हाथ नहीं पहुंचता।
बाबा नागार्जुन की एक कविता, हल्के से समकालीन बदलाव के साथ, हालात का माकूल बयान करती है-
बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने 'मनमोहन' मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
आम ज़िंदगी में बोले-पढ़े-लिखे शब्दों का भी कोई गूगल आंकड़ा होता तो साल 2011 का सरताज शर्तिया 'लोकपाल' होता। लेकिन हर पड़ाव पर शातिराना बर्ताव करने वाली यूपीए सरकार ने आखिरी कदम पर अपना असली चेहरा दिखा ही दिया। दरअसल फरवरी में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को पंजाब और उत्तराखंड में सत्ता वापसी की उम्मीद है। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी का धुआंधार प्रचार भी हांफती पार्टी को ऑक्सीजन तो नहीं दे पा रहा लेकिन वहां खोने को ज़्यादा कुछ नहीं। लिहाज़ा कांग्रेस को लगता है कि वोट की राजनीति में लोकपाल की सेंध अभी नहीं लगने वाली। लेकिन क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जंग की उम्र बस इतनी ही है। कांग्रेस के नेता क्या भूल रहे हैं कि ना तो ये संसद का आखिरी सत्र था और ना ही ये आखिरी चुनाव हैं।














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