लोकपाल पर बहस की चिल्ल-पौं के बीच संसद भवन के गेट नंबर 12 पर खड़ा में सोच रहा था- 'पिछले करीब 6 साल में इस गेट से कितने सांसद आए, कितने गए..दफ्तरी ज़रूरत के मुताबिक भाग-भाग कर उन्हें 'पकड़ने' से ज़्यादा कोई हिसाब मैंने कभी नहीं रखा। लेकिन संसद के इस हाई प्रोफाइल गेट की तरफ दौड़ कर जाने की एक अहम वजह अब कम हो गई।'
श्याम बेनेगल....एक कालजयी फिल्मकार और सौम्यता में लिपटा एक विनम्र, बेहतरीन इंसान। अपनी ग्रे रंग की सैंट्रो कार से संसद आना और लपकते कैमरों और हड़बड़ाए रिपोर्टरों पर निरपेक्ष नज़र फ़ेरते हुए अंदर चले जाना.. यही उनका अंदाज़ रहा। शुरू-शुरू में तो मुझे लगता था कि उनकी फाइल से किसी फिल्म का कोई नया सीन गिरेगा, जो उन्होंने सदन में बैठे-बैठे शायद कुछ देर पहले ही लिखा होगा।
फरवरी 2006 में मनोनीत सदस्य के तौर पर राज्यसभा की शपथ लेने के बाद, ज्यादातर सांसदों से उलट, बेनेगल उसे हूबहू निभाने में लग गए। संसद में अपनी मौजूदगी को लेकर किसी खांटी पार्लियमेंटेरियन से भी ज़्यादा संजीदा.. हमेशा हाज़िर। हालांकि मैंने उन्हें सदन में सवाल पूछते या मुद्दा उठाते ज़्यादा नहीं देखा..लेकिन फिर भी संसद की कार्यवाही के वक्त वो भीतर ही मिलते। शायद सांसदों की हर छोटी-बड़ी हरकत को किसी अदृश्य कैमरे में कैद करने के लिए। कोई 'निजी' सियासी दिलचस्पी ना होने के बावजूद संसद ठप होने पर उनके चेहरे पर वही अफसोस होता जो किसी अहम शूटिंग के वक्त आई बारिश के चलते 'पैकअप' कहने में भी नहीं होता होगा- 'एक और कीमती दिन बरबाद हो गया।' बेफिक्र, बेदर्द और बेअंदाज़ फिल्मी दुनिया में भी बेहद अनुशासित 40 साल बिता चुके श्याम बेनेगल को उच्च सदन के तथाकथित 'माननीयों' का वो बेढंग रवैया रास आता भी तो आखिर कैसे। उनके लिए तो संसद आना जैसे एक कोर्स था जिसके हर लम्हे का वो तसल्लीबख़्श इस्तेमाल चाहते थे।
गेट नंबर 12 से उनके बाहर निकलने के बाद गाड़ी के इंतज़ार तक का वक्त मेरे लिए संसद कवरेज का मुफ्तिया तोहफा था। कभी अकेले तो कभी अपने मित्रों हृदयेश और बालकृष्ण के साथ मैं दौड़कर श्याम बेनेगल की तरफ जाता तो हमेशा एक ज़िंदादिल मुस्कान स्वागत में खड़ी मिलती। हमारे बेतकल्लुफ और बचकाने सवालों पर उन्होंने कभी नज़रें नहीं तरेरीं। 'सर आपने 'रॉकस्टार' देखी'- हाल ही में मैंने उनसे पूछा तो बेनेगल हमेशा की तरह जवाब के साथ हाज़िर थे। डेविड लीन के सदाबहार रोमेंटिक ड्रामा- 'ब्रीफ एनकाउंटर' से शुरू करते हुए प्रेम कहानियों के तमाम आयामों की वो रुपहली तस्वीर उन्होंने खींची, मुझे लगा कि विश्व सिनेमा की किसी मोटी किताब के कई पन्ने मैने चंद मिनटों में ही पलट डाले।
22 फरवरी 2009 की वो शाम मुझे भुलाए नहीं भूलती। ऑफिस से फोन आया कि क्या श्याम बेनेगल कल सुबह हमें 'लाइव' पर मिल सकते हैं। दरअसल उसी रात केलिफोर्निया में ऑस्कर पुरस्कारों का एलान होना था। स्लमडॉग मिलिनेयर भारी चर्चा के साथ दौड़ में थी और टीवी चैनल भारी तामझाम के साथ तैयारी में। बेनेगल उस वक्त हैदराबाद से काफी दूर एक गांव में 'वेल डन अब्बा' की शूटिंग कर रहे थे। 'ओबी वेन' का भी पहुंचना मुश्किल था लिहाज़ा उन्होंने खेद जता दिया। फोन काटते-काटते मैने पूछा- 'सर.. क्या लगता है आपको..?' बेनेगल का जवाब था- '7 से 8 अवार्ड जीतेगी ये फिल्म।' अगली सुबह मैं उठा तो टीवी पर खबर थी- 'ऑस्कर में स्लमडॉग मिलिनेयर की धूम, 8 अवार्ड जीते।' ये वो तजुर्बा है जिसके लिए दाढ़ी के सफेद बाल ही काफी नहीं होते.. उसके लिए श्याम बेनेगल बनना पड़ता है।
बेनेगल की तकरीबन हर फिल्म में काम कर चुके अमरीश पुरी ने अपनी आत्मकथा 'एक्ट ऑफ लाइफ' में लिखा है- 'श्याम एक चलता फिरता विश्वकोश हैं। वो इस धरती पर किसी भी विषय पर चर्चा कर सकते हैं। उनसे दुनिया के किसी भी हिस्से में सबसे बढ़िया और चुनिंदा रेस्टोरेंट के बारे में पूछ लो और वो आपके सामने फौरन एक फेहरिस्त रख देंगे जहां उन्होंने खाना खाया हो.. हर विषय पर जानकारी रख्ना एक अद्भुत गुण है और श्याम ने हर बार इसे साबित किया है।'
अमरीश पुरी साहब के दावे की निजी पड़ताल का दुस्साहस मैंने कभी नहीं किया क्योंकि श्याम बेनेगल से बात करने भर से ही तबियत तृप्त हो जाती है। वैसे भी उनके साथ बने भुरभुरे रिश्ते को मैं अपने पेशेवर लालच से दूर रखना चाहता था लिहाज़ा 'कम पूछना- ज़्यादा सुनना' का फलसफा ही निभाता रहा।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बेनेगल को मिली तारीफों और पुरस्कारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है जितना किसी हिंदी फिल्म का क्रेडिट रोल भी नहीं होता। भारतीय सिनेमा का ऑस्कर यानी दादासाहेब फाल्के अवार्ड.. सात बार सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार.. पद्मश्री.. पद्म भूषण। बर्लिन, मॉस्को, कान्स जैसे प्रतिष्ठित सिनेमा समारोहों में उनकी फिल्मों का आना-जाना जैसे होता है, वैसे आपका और हमारा सिनेमा घरों में भी नहीं होता। 1000 से ज़्यादा एडवरटाइज़मेंट बना चुके श्याम बेनेगल ने सिनेमा को गुदड़ी के वो लाल दिए जिनके लिए ना सिर्फ हिंदुस्तानी बल्कि विश्व सिनेमा भी उनका कर्ज़दार रहेगा। नसीरऊद्दीन शाह.. ओम पुरी.. अमरीश पुरी.. अनंत नाग.. शबाना आज़मी.. स्मिता पाटिल.. और.. उनके पसंदीदा सिनेमेटोग्राफर गोविंद निहलानी।
फ्रांसीसी फिल्मकार ज्यां ल्युक गोदार ने कहा था- 'सिनेमा जिंदगी को फिल्माने की कला नहीं है.. वो तो ज़िंदगी और कला के बीच का 'कुछ' है।' और.. श्याम बेनेगल ने तो अंकुर.. निशांत.. मंथन.. भूमिका.. जुनून.. आरोहन.. त्रिकाल.. सूरज का सातवां घोड़ा.. द मेकिंग ऑफ महात्मा.. सरदारी बेगम और जुबैदा इत्यादी की शक्ल में 'इतना कुछ' दिया है जिसे देख-देख कर आज भी सिनेमा के छात्र ऑस्कर जीतने का ख्वाब पुचकारते हैं। और... इतिहास के 'ऐतिहासिक' कायापलट की नायाब मिसाल- 'भारत एक खोज'.. उसे भला कोई कैसे भूल सकता है।
पिछले दिनों श्याम बेनेगल के बारे में अखबार में पढ़ा एक किस्सा मैंने उन्हीं को सुनाया तो वो ठहाका मार कर हंस पड़े। किस्सा यूं कि- ' एक दफा बेनेगल एक टैक्सी में बैठे तो ड्राइवर शीशे में देखकर चहका- 'आप तो बेनेगल साहेब हैं न?' बेनेगल बोले- 'हां भई, तुम जानते हो मुझे ?' टैक्सी ड्राइवर ने जवाब दिया- 'हां.. हां, मैंने आपकी कई फिल्में देखी हैं और अखबार में फोटो भी।' बेनेगल साहब ने बात आगे बढ़ाई- '..तो कैसी लगती हैं तुम्हें मेरी फिल्में?' टैक्सी ड्राइवर बोला- 'बहुत मस्त साहब.. पर आम लोगों को आपकी फिल्में ज्यादा समझ नहीं आतीं। कभी उनके लिए भी फिल्म बनाओ ना।' बेनेगल ने थोड़ा उलझते हुए सवाल किया- '..पर तुमको तो मेरी फिल्में समझ में आती हैं न?' टैक्सी ड्राइवर ने दोहराया - 'हां, साहब.. मुझे तो ठीक है पर आम आदमी....।'
1970 में शुरू हुए प्रयोगात्मक फिल्म आंदोलन के शुरुआती नारेबाज़ हैं श्याम बेनेगल। कला फिल्में कहलाने वाली उनकी फिल्में दरअसल कलात्मक फिल्में हैं जो आपके कंधे झंझोड़ कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाने में यकीन नहीं रखती। बल्कि एक अनुभवी उपदेशक की तरह अपना संदेश आपकी रगों तक पहुंचाती हैं ताकि वो देर तक आपके ज़हन में पिघलता रहे। वैसे 'वेलकम टु सज्जनपुर' और 'वेल डन अब्बा' की शक्ल में बेनेगल ने हल्की-फुल्की फिल्में भी बनाईं जिनके निर्माताओं ने बॉक्स ऑफिस पर मोटा माल भी बटोरा।
बेनेगल साहब महान फिल्मकार गुरुदत्त के रिश्तेदार हैं। एक बार मैंने उनसे गुरुदत्त की फिल्मों का ज़िक्र किया तो उनका जवाब अप्रत्याशित था- 'खुद पर तरस खाने की उनकी अदा ज़रूरत से ज़्यादा उनकी फिल्मों में दिखने लगी थी। कागज़ के फूल जैसी फिल्म के फ्लॉप होने की यही वजह रही।' फिल्म इंडस्ट्री के उस माहौल में जहां गुरुदत्त की तारीफ एक फैशन है, वहां बेनेगल का जवाब उनकी शख्सियत की साफगोही साबित करता है।
2012 के अगले संसद सत्र में श्याम बेनेगल से मुलाकात नहीं होगी। हाल में 'डर्टी पिक्चर' के ज़िक्र पर उन्होंने कहा था कि वो उस फिल्म को फिल्म के लिए नहीं बल्कि विद्या बालन के लिए देखेंगे। बेनेगल विद्या बालन के साथ एक स्पेनिश कहानी पर फिल्म बनाने की सोच रहे हैं। वो फिल्म जब भी बने, पर मुझे पक्का यकीन है कि पहले वो सियासतदानों की बखियां उधेड़ती अपनी एक नई फिल्म के साथ हाज़िर होंगे, जिसमें देश की उस सबसे बड़ी पंचायत के कई मुकदमों का कच्चा चिट्ठा होगा जिसकी 'खोज' में उन्होंने 6 साल बिताए।














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