जनवरी, 2009
एक आधुनिक और सभ्य समाज में विचारों की आजादी से बड़ा दूसरा कोई मूल्य नहीं। ये लोकतंत्र की बुनियाद है। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में न्यूज चैनलों से इस आजादी को छीन लेने की कोशिश हुई तो लोगों को कोई खास फर्क नहीं पड़ा। केबल नेटवर्क रेग्युलेशन एक्ट में संशोधन की कोशिश ने चैनलों को चाहे जितना परेशान किया हो, भारतीय समाज में कोई आलोड़न नहीं हुआ। किसी को नहीं लगा कि इमरजेंसी लगने वाली है या फिर वैसा खतरा सामने है जैसा बिहार प्रेस बिल के आने पर दो दशक पहले महसूस किया गया था। वैसे मीडिया की नकेल कसने की चाहत तो कम-ज्यादा सभी रंग की सरकारों में होती है। और न्यूज चैनलों ने तो नाक में दम ही कर रखा है। उनकी वजह से ही लोगों ने देश की एक बड़ी पार्टी के मुखिया को रिश्वत लेते देखा, घूस लेकर सांसदों को सवाल....









