फरवरी, 2009
चुनाव की चर्चा शुरू होते ही बाहुबली नेताओं का लेखा जोखा शुरू हो गया है। बाहुबली, यानी वो लोग जिन पर हत्या से लेकर अपहरण तक तमाम संगीन आरोप हैं, फिर भी वे विधानसभा से लेकर लोकसभा पहुंचने में कामयाब होते हैं। चुनाव दर चुनाव उन्हें लेकर स्यापा बढ़ता जा रहा है, और इसी अनुपात में उनकी सफलता का ग्राफ भी। 1996 में लोकसभा में ऐसे दागियों की तादाद 40 के करीब थी जो 14वीं लोकसभा में बढ़कर सौ हो गई1 आखिर क्यों? ये एक फिल्मी ख्याल से ज्यादा कुछ नहीं कि बाहुबली लोगों को डरा-धमकाकर वोट लेते हैं। सच्चाई ये है कि टी.वी. के एसएमएस पोल में लोग कैसी भी राय जाहिर करें, उन्हें आपराधिक रिकार्ड वाले व्यक्ति को चुनने में कोई परेशानी नहीं होती। तो क्या जनता दोषी है? दरअसल, उम्मीद की तमाम मीनारों को नेस्तोनाबूद होते देख जनता के बड़े हिस्से ने समाज ने....









