मार्च, 2009
इन दिनों जारी राजनीतिक गहमा-गहमी के बीच तमाम लोग एक अजब समस्या से जूझ रहे हैं। उन्हें डर है कि अगली लोकसभा के त्रिशंकु होने पर कहीं जोड़-तोड़ करके मायावती प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ना पहुंच जाएं। ऐसा सोचने वालों में सिर्फ राजनीतिज्ञ नहीं, बुद्धिजीवी, पत्रकार और जनता का एक मुखर भी हिस्सा है। हाल ये है कि एक सर्वे के जरिये ये भी बता दिया गया है कि देश की 74 फीसदी से ज्यादा लोगों को मायावती का प्रधानमंत्री बनना पसंद नहीं। उन्हें लगता है कि इससे देश की प्रतिष्ठा घटेगी। ये अलग बात है कि हिंदुस्तान अमेरिका नहीं कि 622 लोगों के बीच हुए ऐसे सर्वेक्षणों के जरिये जमीनी हकीकत का ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जा सके। बहरहाल चिंता में दुबले हो रहे इन लोगों की समस्या के निदान के लिए जरूरी है कि मायावती के गुनाह और खतरे को समझा जाए। मायावती को लेकर पहली चिंता....
जिनके पास सामान्य ज्ञान बढ़ाने का एकमात्र जरिया समाचार चैनल रह गए हैं, उनका हैरान होना लाजिमी है। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि ये कैसा पाकिस्तान है। सड़कों पर लाखों की भीड़। हवा में जम्हूरियत और आजादी के तराने। स्वात में शरिया लागू होने की गरमा-गरम खबरों की बीच अचानक आजाद न्यायप्रणाली के पक्ष में ये तूफान कैसे उठ गया! बिना खड्ग-बिना ढाल, बस जुल्फें लहराकर काले कोट वालों ने ये कैसा कमाल कर दिया। सेना खामोश रही। पुलिस भी कभी-कभार ही चिंहुकी...और इफ्तेखार चौधरी चीफ जस्टिस के पद पर बहाल हो गए! पाकिस्तान के इतिहास को देखते हुए ये वाकई चमत्कार से कम नहीं। आम भारतीयों को इस आंदोलन की कामयाबी की जरा भी उम्मीद नहीं थी। सबको लग रहा था कि लॉंग मार्च बीच में ही दम तोड़ देगा। जरदारी जब चाहेंगे आंदोलनकारियों को जेल में ठूंस देंगे। 16 मार्च को इस्लामाबाद पहुंचना नामुमकिन होगा।....
देश ने राहत की सांस ली। जीवन भर शराब के खिलाफ उपदेश देने वाले बापू की निजी चीजें एक शराब कारोबारी के जरिये देश को वापस मिल रही हैं। उनका चश्मा, उनकी घड़ी, चप्पल और थाली-कटोरा देश में वापस आ जाएंगे। ये अलग बात है कि किसी को ठीक-ठाक पता नहीं कि ये चीजें देश से बाहर कब गईं और कैसे गईं। ऐसी तमाम चीजें भारत के संग्रहालयों में पहले से हैं, और उनसे देश या देशवासी कैसे प्रेरणा ले रहे हैं, ये शोध का विषय है। फिर इतना हो-हल्ला क्यों मचा। क्या गांधी के चश्मे से दुनिया देखने की कोई ललक है। क्या उनकी चप्पल में पांव डालकर कोई राजनेता गांव-गांव घूमना चाहता है। या उनकी ठहरी हुई घड़ी में किसी को चाबी भरने की बेकरारी है..या उनके खाली कटोरे को देखकर किसी को ये याद आ गया है कि देश में करोड़ो लोग आज भी दो जून....









