मार्च, 2010
मकबूल फिदा हुसैन द्वारा भारतमाता के नाम से बनाए गए चित्र पर काफी हल्ला मचाया गया था। उनके खिलाफ़ अश्लीलता और अपमान के आरोपों वाली तीन याचिकाओं ( 114/2007, 280/2007 और 282/2007) जिनमें कि बहुउल्लेखित और चर्चित भारतमाता वाले चित्र वाली याचिका भी शामिल है, पर दिल्ली हाईकोर्ट ने 8 मई 2008 को फ़ैसला सुनाते हुए, खारिज कर दिया था। इस फ़ैसले में न सिर्फ़ कला पर वरन और भी कई मानसिकताओं पर पुरजोर टिप्पणियां की गई हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय किशन कौल द्वारा, कला की गहराइयों, कलाकार के नज़रिये, अन्य देशों के कानूनों और न्यायिक मतों, भारत में ही पूर्व मामलों, कलात्मक स्वतंत्रता और अश्लीलता, सामयिक मापदंडों, सौन्दर्यबोध अथवा कलात्मक प्रवृति, साहित्यकारों/कलाविदों की राय, अभिव्यक्ति की आज़ादी, आम आदमी की कसौटी, सामाजिक उद्देश्य या मुनाफ़ा, और दायित्वों की कड़ी कसौटी के मापदंड़ों पर इस मामले को कसते हुए, दिये इस फ़ैसले के कुछ उद्धरणों और चित्र....
बेहतर होता कि एम. एफ. हुसैन भारत में रहते हुए अपने साथ हो रहे अन्याय का प्रतिकार करते। लेकिन 95 साल की उम्र में जब पेंशन के लिए डाकखाने जाना भी दुश्वार हो जाता है, तब हुसैन अदालतों का चक्कर काटें, ये उम्मीद भी ज्यादती ही है। कोई भी समझ सकता है कि हुसैन के पास वक्त कितना कम है। उन्हें इस उम्र में सुकून से रहने का पूरा हक है, ताकि कला के शिखर पर पहुंच चुके अपने घोड़ों का रंग थोड़ा और गाढ़ा कर सकें। इसलिए बिना आवेदन किए कतर की सरकार से मिल रहे नागरिकता के सम्मान स्वीकार कर वे कोई अपराध नहीं कर रहे हैं। रही बात भारत और भारतीयता की, तो इसे हुसैन भी हुसैन से जुदा नहीं कर सकते। दरअसल, ये पूरा किस्सा सभ्यता की गाड़ी को उलटी दिशा में हांकने की कोशिश से जुड़ा है। हुसैन पर आरोप है कि उन्होंने....









